Independence Day: राजस्थान की उस्ता कला, स्वतंत्रता दिवस पर महात्मा गांधी का अनूठा चरखा
Independence Day Rajasthan News: देश अपना 78 वां स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त को बड़ी धूमधाम से मनाने जा रहा है लेकिन वैसे तो में आजादी में हमारे कई स्वंतत्रता सैनानियों का अहम योगदान रहा है। लेकिन आज भी राजस्थान में कुछ ऐसे कलाकार है जो आजादी के जश्न को यादगार बनाने में कुछ अनूठा करने की धुन सवार किए बैठे है।
राजस्थान में बीकानेर के एक ऐसे ही कलाकार ने अपनी सुनहरी आर्ट से ऐसा चरखा बनाया है कि इसकी बारीकी देखकर आप भी दांतों तले अंगुली दबाने को मजबूर हो जाएंगे।
देश में 15 अगस्त को भारत अपना 78 वां स्वतंत्रता दिवस मनाने जा रहा है। इसके लिए स्कूलों से लेकर दफ्तरों तक में स्वतंत्रता दिवस का जश्न देखने को मिलेगा।

आजादी की बात हो और महात्मा गांधी की यादें ताजा ना हो, ऐसा हो नहीं सकता है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का चरखा आजादी की लड़ाई में बहुत से लोगों का हथियार बना। जहां इसने आत्मनिर्भर होने का भाव जगाया, वहीं विदेश में भी अब यह लोगों की जिंदगी में मेडिटेशन (चिंतन) का एक अहम हिस्सा बन चुका है।
महात्मा गांधी का चरखा सदा उनके एक पहचान के रूप में रहा है। बीकानेर में एक शख्स ने गांधी के इसी प्रिय चरखे को अपनी नवाचार से कुछ इस तरह से बनाया कि पूरा विविधताओं से भरा भारत मानो एक चरखे में समा गया हो।
राजस्थान के पश्चिमी हिस्से में बसा बीकानेर अपने नमकीन के तीखेपन और रसगुल्लों की मिठास के लिए देश ही नहीं विदेशों तक विख्यात है। शहर अपनी सांस्कृतिक विरासत के साथ आज विकास के न ए आयाम छू रहा है। आगे बढ़ रहा है।बात बीकानेर की हो और उस्ता कला की बात न हो तो बीकानेर की बात करना बेमानी होगी।
बीकानेर सुनहरी कलम से बारीक नक्काशी की कलाकारी के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। अपनी इस प्राचीन कला के साथ नवाचार करते हुए बीकानेर के कलाकार विश्व पटल पर अपनी छाप छोड़ रहे है। इसी कला के साथ बीकानेर के उस्ता कलाकार ने महात्मा गांधी के प्रिय चरखे में पूरे देश को पिरोने का प्रयास किया है।
महात्मा गांधी की बदौलत चरखा देश के आर्थिक स्वावलंबन और आत्मनिर्भरता का प्रतीक बना था। चरखे जैसी सामान्य चीज महात्मा गांधी के हाथों में आते ही सोए हुए भारत में नई जान फूंक कर अंग्रेजी साम्राज्य की नींव तक हिला दी थी।
बीकानेर के उस्ता कला के आर्टिस्ट रामकुमार भादानी ने बताया कि उनके मन में एक विचार आया कि कुछ ऐसा बनाया जाए जो एकता और भारत की एकरूपता और अखंडता के प्रतिकात्मक रूप में प्रदर्शित किया जाए। प्रतीक कुछ ऐसा लगे कि एक जगह पूरा ही पूरा भारत दिखे।
भादाणी के इस विचार में महात्मा गांधी में मुख्य केंद्र बिंदु थे, क्योंकि देश के स्वाधीनता संग्राम में महात्मा गांधी को भुलाया नहीं जा सकता और गांधी जी के जीवन में चरखे के महत्व को देखते हुए उन्होंने चरखे को बनाया, जिसमें भारत के सभी राष्ट्रीय चिन्ह, राष्ट्रभाषा, महात्मा गांधी के तीन बंदर उनका चश्मा उनकी घड़ी सहित भारतीय प्रतीक चिन्हों को इस चरखे में समाहित किया।
उन्होंने बताया कि सत्यमेव जयते हमारा परम वाक्य है। इसको शामिल करते हुए अशोक चक्र की 24 तीलियों और उनके नाम का उल्लेख भी इस चरखे में किया गया है। ताकि इस चरखे को देखकर भारतीय अपने संविधान से रूबरू हो सके।
तीन साल में तैयार हुआ यह अनूठा चरखा
उन्होंने बताया कि इस चरखे को बनाने का ख्याल जब मन में आया और तब पता नहीं था कि यह कैसा बनेगा, लेकिन 3 साल बाद में मेहनत रंग लाई और कई गणमान्य लोगों ने इस चरखे को देखकर उनकी कलाकारी को सराहा है।
रामकुमार कहते हैं कि उनकी इच्छा है कि यह चरखा भारत की महामहिम या फिर प्रधानमंत्री को वो भेंट करें और यह चरखा भारत की संसद में स्थापित हो ताकि लोग इस चरखे को देखकर हमारी देश की संस्कृति को समझें और बीकानेर की यह कला भी एक मंच पर स्थान पा सके।
जानिए उस्ता कला के बारे में
नाम सुनते ही जेहन में आता है स्वर्ण नक्काशी वाला खूबसूरत फोटो फ्रेम, सुराही, नाइट लैंप या ऐसी ही बीसियों कलाकृतियां जिन्हें देखने के बाद नजर हटाना काफी मुश्किल होता है। इन्हें बनाने वाले कलाकारों की बात हो तो ध्यान में आते हैं वो शख्स जो गर्दन झुकाए तल्लीन होकर महीन कलम से एक-एक सेंटीमेटर में कला का नया रंग भर देता है।
काम कितना बारीक है इसका अनुमान इसी से लगा सकते हैं कि कई बार यह कलाकार एक पूरे दिन में कुछ इंच तक ही कलम चलाते रहते हैं।
कीमत का जिक्र ही बेमानी क्योंकि मूल उस्ता आर्ट शुद्ध सोने के वर्क से ही होती है। हालांकि अब महंगाई के दौर में सस्ते विकल्प भी सामने आए हैं। पहचान यह है कि राज दरबार से शुरू हुआ कलम का सफर मंदिरों, हवेलियों में होता हुआ अब देश के सैकड़ों वीआईपी ड्राइंग रूम की शोभा बन चुका है।












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