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Rajasthan: केकड़ी का बावनमाता धाम, जहां 400 सालों से जल रही अखंड ज्योत, नवरात्रि में हर मनौति होती है पूरी ?

Rajasthan: देशभर में नवरात्रि पर घर-घर मां दूर्गा के विभिन्न रूपों की विशेष पूजा अर्चना हो रही है। वहीं गांव-गांव, शहर-शहर कई आस्था के धाम मां दूर्गा के मंदिरों पर भक्तो की भीड़ उमड़ रही है। हर कोई मां दूर्गा के दर्शन पर अपनी मनोकामनाएं मांग रहा है।

आज हम आपकों राजस्थान के केकड़ी जिले में स्थापित 400 साल पूरानी ऐतिहासिक बावनमाता धाम की यात्रा पर लेकर चलते है। जहां कहां जाता है कि केकड़ी जिले के सावर में करीब 400 साल पहले महाराणा प्रताप के वंशजों ने इस मंदिर की स्थापना की थी।

नवरात्रा में सावर स्थित बावनमाता मंदिर में पिछले 400 सालों से अखंड जोत आज भी प्रज्वलित है। जहां इस नवरात्रि में श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है।

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    केकड़ी का बावनमाता धाम, जहां 400 सालों से जल रही अखंड ज्योत, नवरात्रि में हर मनौति होती है पूरी

    मां आदिशक्ति के प्रतीक इस धाम पर पूरे नवरात्र में विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान के मंत्र गूंजते रहते है। शक्तावत वंश की कुलदेवी के रूप में विख्यात, आस्था व भक्ति के इस धाम पर सदैव अखंड ज्योत भी प्रज्ज्वलित रहती है।

    केकड़ी जिले के सावर कस्बे में स्थित बावनमाता मंदिर अपने पौराणिक अतीत व चमत्कारिक किवदंतियों के लिए विख्यात है। करीब 400 साल पहले महाराणा प्रताप के वंशज राजा गोकुलदासजी शक्तावत ने उदयपुर के भींडर से माता को यहां लाकर विराजमान किया था। तभी से यह स्थान बावनमाता के धाम के नाम से प्रसिद्ध है।

    बावनमाता शक्तावत वंश की कुलदेवी है। आज भी हर नवरात्र में सावर, चौसला, देवली, कोटा, टांकावास, देवखेड़ी, कुचलवाड़ा, जयपुर व पिपलाज सहित अन्य कई स्थानों से शक्तावत वंश के वंशज पूजा अर्चना के लिए यहां आते हैं।

    मंदिर के पुजारी ने बताया कि मंदिर में हमेशा अखंड ज्योत प्रज्वलित रहती है। मंदिर में 51 फीट ऊंचा त्रिशूल भी स्थापित किया गया है। पूर्व में यह स्थान बाणमाता के नाम से प्रसिद्ध था, जो धीरे-धीरे अपभ्रंश होकर बावनमाता के नाम से जाना जाने लगा है। उन्होनें बताया कि बावनमाता मंदिर परिसर में राजपूत और पांचाल समाज की दो सतीमाता भी विराजमान है।

    यहां ऐसे तो साल भर ही भक्तों के दर्शन करने आने का सिलसिला बना रहता है, पर शारदीय नवरात्रों में मंदिर परिसर भक्ति व आस्था की विशेष भावना से ओतप्रोत श्रद्धालुओं से भरा रहता है।

    नवरात्रा के दौरान सप्तमी तिथि को यहां 121 जलकलशों के साथ विशाल शोभायात्रा निकाली जाती हैं तथा अगले दिन अष्टमी पर यहां विशाल वार्षिक मेला भरता है। इससे पूर्व मंदिर प्रांगण में विशाल भजन संध्या आयोजित की जाती है, जिसमें ग्रामीणों की भारी भीड़ उमड़ती है।

    मंदिर के इतिहास को लेकर बताया गया कि मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप के छोटे भाई शक्तिसिंह के पोते गोकुलदास शक्तावत ने सन 1684 में सावर रियासत की गद्दी संभाली थी।

    उस समय उन्हें रियासत में कुल 2700 गांव उपहार स्वरूप मिले थे। तब गोकुलदासजी ने उदयपुर के भींडर से बाणमाता को लाकर सावर में विराजमान किया था। तभी से बाणमाता को सावर सत्ताइसा (सत्ताइस सौ) की कुलदेवी के नाम से पूजा जाता है। धीरे-धीरे गुजरते समय के साथ बाणमाता का नाम अपभ्रंश होकर बावनमाता हो गया।

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