बिहार चुनाव से पहले नीतीश कुमार का कॉमेडी शो
पटना। नीतीश कुमार एक बार फिर से मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं। वो भी तीसरी बार। सबसे ज्यादा मजेदार बात यह है कि नीतीश चुनाव से ठीक पहले मुख्यमंत्री पद संभालने जा रहे हैं। वैसे बिहार का राजनीतिक घटनाक्रम नीतीश के कॉमेडी शो से कम नहीं और इस शो का बड़ा हर्जाना उन्हें भुगतना पड़ सकता है।
जीतन राम मांझी के साथ जिस प्रकार की दुश्मनी नीतीश ने मोल ली है, वो उनके इस्तीफे के साथ खत्म नहीं हुई है। राज्य में विधानसभा चुनाव के दौरान उन्हें बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। जिस प्रकार से महादलित मांझी को किनारे किया गया है, उससे साफ है कि बिहार में बड़ा राजनीतिक फेरबदल चुनाव के वक्त दिखाई देगा।
क्या है यह महादलित फैक्टर
बिहार की करीब 23 जनजातियां हैं, जो महादलित श्रेणी में आती हैं। नीतीश को 2010 में जीत दिलाने में जीतन राम मांझी की बड़ा हाथ था, क्योंकि उन्हीं की वजह से इन जनजातियों के वोट नीतीश को मिले थे और वो दूसरी बार लगातार मुख्यमंत्री बन पाये थे।
अभी तक राम विलास पासवान के हाथ में बड़ा वोट बैंक हुआ करता था, अब मांझी भी उनके लगभग बराबर के कद के हो गये हैं। पासवान पहले ही एनडीए में शामिल हो चुके हैा, वहीं मांझी का हाथ थामने के लिये राजनाथ सिंह ने पहले ही हाथ बढ़ा दिया है। ऐसे में ओबीसी और महादलित वोट बैंक नीतीश के हाथ से फिसल चुका है।
किसे मिलेगा फायदा
नीतीश-मांझी के झगड़े का जबर्दस्त फायदा भाजपा को मिलने वाला है। क्योंकि 243 में से 60 सीटें आरक्षित हैं। लेकिन भाजपा को इस बात का ध्यान रखना होगा कि कार्यकर्ता नरेंद्र मोदी पर निर्भर न रह जायें, अन्यथा जो हाल दिल्ली में भाजपा का हुआ है, वही बिहार में भी हो सकता है।
अब इस बीच क्या करेंगे नीतीश
जदयू सरकार की हालत इतनी खराब हो चुकी है, कि तमाम विकास कार्य थम से गये हैं। नीतीश के पास आठ से दस महीने का ही समय बचा है। अब नीतीश के लिये सबसे बड़ी चुनौती होगी कि वो कुछ करके दिखायें, क्योंकि बिना कुछ किये जनता का विश्वास हासिल नहीं हो सकता। वैसे राजनीतिक जानकारों का मानना है कि चुनाव तक नीतीश हर बिगड़े काम के लिये मांझी पर ठीकरा फोड़ेंगे। और वो किसी कॉमेडी से कम नहीं होगा।













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