वर्ष 2006 में पीओके पर जारी दरिंदगी पर आई थी एक रिपोर्ट
इस्लामाबाद। पीओके में जो कुछ चल रहा है, उसे पूरी दुनिया देख रही है। वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान में सियासत के आका आंख मूंदकर बैठे हैं। वह यूएन में भारत को इसके लिए जिम्मेदार बता रहे हैं। वैसे यह पहली बार नहीं है जब पीओक में इस तरह से पाक सेना और पुलिस की ओर से की जा रही बर्बरता के बाद पाक के रवैये पर सवाल उठ रहे हैं। वर्ष 2006 में भी कुछ ऐसी ही खबरें आई थीं।

उस समय एक एनजीओ ह्यूमन राइट्स वॉच ने एक रिपोर्ट तैयार की थी। इस रिपोर्ट में कहा गया था कि पीओके, जहां की सत्ता प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष तौर पर पाक सेना के हाथ में हैं, वहां लोगों को न तो कुछ बोलने की आजादी है और न ही वह अपनी मर्जी से कुछ कर सकते हैं। इस रिपोर्ट को वर्ष 2005 में आए भूकंप के बाद तैयार किया गया था।
रिपोर्ट के आने के बाद अंतराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान पाक की ओर गया भी था। इस रिपोर्ट में बताया गया था कि किस कदर पीओके में सेना और पुलिस की ओर से मानवाधिकारों का हनन हो रहा है।
रिपोर्ट में लिखा था, 'जम्मू और कश्मीर में आतंकवाद की शुरुआत होने से पहले इसे एक अहम पर्यटन स्थल माना जाता था। एलओसी के आने के बाद इसके दूसरी ओर इस तरह का कोई नजारा नहीं था।'
रिपोर्ट में साफ-साफ कहा था कि इन हालातों का प्रयोग पाकिस्तान इस क्षेत्र पर अपना नियंत्रण स्थापित करने के लिए कर रहा है।
एनजीओ की रिपोर्ट में पीओके को आजाद कश्मीर बताया गया था और कहा गया था कि कानूनी तौर पर गलत है। पाक में स्थित संस्थाएं राजनीतिक जीवन के सभी पहलुओं पर अपना नियंत्रण करना चाहती हैं।
इस रिपोर्ट में मीडिया को दबाने, लोगों को गिरफ्तार करने और बिना बात के हिरासत में लेकर उन्हें यातनाएं देने का जिक्र किया गया था।
मार्च में जेनेवा में एक कार्यक्रम के दौरान पीओके के निर्वासित नेताओं ने इस बात पर चिंता जताई थी कि यहां पर मानवाधिकारों का हनन हो रहा है और हिरासत में लेकर लोगों को मारा जा रहा है।












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