दिल्ली चुनाव में दलबदलु नेताओं को भी आप ने दी पटखनी
नई दिल्ली (विवेक शुक्ला)। आम आदमी पार्टी को छोड़कर भाजपा का दामन थामने वाले विनोद कुमार बिन्नी पटपड़गंज से और एम.एस.धीर जंगपुरा से दिल्ली विधान सभा का चुनाव हार गए। धीर तो पिछली केजरीवाल की सरकार में स्पीकर थे। उधर कांग्रेस से भाजपा में गई पूर्व केन्द्रीय मंत्री कृष्णा तीरथ पटेल नगर से हारीं। इन सबको आप के उम्मीदवारों ने चुनावी रणभूमि में पानी पिलाया।
पछाड़ा भाजपा को
इस बीच, दिल्ली चुनाव परिणाम का पहला और सबसे बड़ा सच यह है कि आम आदमी पार्टी और अरविन्द केजरीवाल ने मुद्दों, वायदों, चेहरों, चुनाव प्रबंधन, अभियान, रणनीति सब स्तर पर भाजपा को पछ़ाड़ दिया। यह भाजपा की ही नहीं जनसंघ से लेकार आज तक की दिल्ली में सबसे बुरी पराजय है। ऐसी पराजय की कल्पना भजपा नेताओं ने दुःस्वप्नों में भी नहीं की होगी।
शर्मनाक प्रदर्शन
आखिर लोकसभा चुनाव में 60 विधानसभा क्षेत्रों पर बढ़त पाने वाली पार्टी केवल 3 सीट तक सिमट जाए और लोकसभा चुनाव में केवल 10 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त पाने वाली आआपा तीन चौथाई से भी ज्यादा 67 सीटों तक पहुंच जाय तो यह परिणाम असाधारण है। 50 प्रतिशत से ज्यादा मत एक पार्टी पा ले तो इसे क्या कहेंगे।
कांग्रेस के एकच्छत्र राज के दौर के अंत के बाद ऐसे परिणामों की संख्या गिनी चुनी ही होगी। वैसे भाजपा के संदर्भ में किसी चुनाव का मूल्यांकन हमें मोदी के अभ्युदय के बाद से ही करना चाहिए, क्योंकि यही से भाजपा के जीवन में नया दौर आया है।
इस आधार पर भाजपा की पराजय पार्टी के बढ़ते रथ पर ऐसा ब्रेक दिख रहा है जिसके हिचकोले से निकलने के लिए उसे संगठन, नीति, चेहरे और चाल में व्यापक बदलाव की जरुरत महसूस होनी चाहिए।
भाजपा हर स्तर पर अजीबोगरीब तरीके से पेश आती रही। नरेन्द्र मोदी का नाम उसकी पार्टी में एकता का कारण है और सबसे ज्यादा लोकप्रिय भी।
किरण बेदी का विरोध
किरण बेदी के उम्मीदवार बनते ही ऐसा असंतोष एवं विद्रोह कायम हुआ कि इसे संभालना नेतृत्व के वश की बात नहीं रही। इसी तरह बाहर से लाये तथा पार्टी के अंदर से भी केन्द्रीय नेताओं के दबाव में कुछ ऐसे चेहरे को उम्मीदवार बनाया गया जिसे स्थानीय कार्यकर्ता स्वीकार नहीं कर पाए।
दोहरी क्षति
इसका आभास होने के बाद अंतिम समय में भाजपा ने किरण बेदी को सबसे उपर रखने की जगह फिर नरेन्द्र मोदी को सामने लाया। हालांकि एक बार बेदी को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बनाने के बाद पार्टी को दोहरी क्षति हुई थी। एक ओर पार्टी के अंदर असंतोष एवं विद्रोह था, अनेक क्षेत्रों के नेता-कार्यकर्ता उदासीन हो गए थे तो दूसरी ओर केजरीवाल के बोलतोल के सामने बेदी कमजोर पड़ रहीं थीं।
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