महाराष्ट्र चुनाव में ऐसे मुद्दे जिन पर टिकी हार-जीत
मुंबई। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव इस बार कोई न कोई इतिहास गढ़ सकते हैं। यह इतिहास हार या जीत दोनों में हो सकता है। महाराष्ट्र में जब से शिवसेना-भाजपा और कांग्रेस एनसीपी का गठबंधन टूटा है मुकाबला पंचकोण में हो रहा है। एनसीपी औऱ शिवसेना पहले से ज्यादा मजबूत स्थिति में नजर आ रही हैं।
भाजपा के पास कोई मराठी और महाराष्ट्र रण क्षेत्र का दिग्गज चेहरा नहीं बचा है। फिर चाहे भाजपा यह चुनाव अपने हक में पहले से मानकर बैठी है। लेकिन संकेत तो इसी बात के हैं कि इस बार कई मुद्दे महाराष्ट्र चुनाव में काम कर रहे हैं। जिनसे विधानसभा चुनाव में पार्टियों की सोची समझी चाल भी उल्टी पड़ सकती है।

धर्म समुदाय
महाराष्ट्र जनसंख्या में मराठा समुदाय करीब 30 फीसदी है तो वहीं मुस्लिम समुदाय की जनसंख्या 10 फीसदी है। ऐसे में करीब 40 फीसदी मतदाता कांग्रेस-एनसीपी के लिए भावुक हो सकता है।

शिवाजी का नाम इस्तेमाल
इस बार भाजपा ने शिवसेना का शिवाजी महाराज का नारा हाईजेक कर लिया है। भाजपा अपनी रैलियों में भारत माता की जय के नारे के अलावा इस बार भाजपा शिवाजी के नारे लगा रही है।

शिवसेना की युवा चाल
शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने इस बार अपने चौबीस साल के बेटे आदित्य ठाकरे को प्रचार के लिए मैदान पर उतारा है। जाहिर है युवा मतदाता इससे प्रभावित होगा।

भाजपा और मोदी
गोपीनाथ मुंडे के बाद भाजपा के पास केंद्र में मोदी के चेहरा तो है जिससे वह जीत हासिल कर सकती है लेकिन महाराष्ट्र में कोई प्रमुख चेहरा उसके पास नहीं है। अगर मोदी से सहानुभूति नहीं दिखाई तो मतदाता वोट अन्य पार्टियों को दे सकता है।

होगा फायदा
कहते हैं जब दो लोगों के बीच लड़ाई हो तो तीसरा फायदा ले जाता है। वही महाराष्ट्र चुनाव में होने वाला है। राज ठाकरे ने इस फायदे को देखते हुए कांदीवली से एक उत्तर भारतीय उम्मीदवार को खड़ा कर दिया है। इससे फायदा तो होगा ही।

भीड़ औऱ भ्रम
एनसीपी, कांग्रेस, भाजपा हो या शिवसेना, एमएनएस। पार्टियों को लगता है कि भीड़ जुट जाने भर से वोट उनके हक में हो जाएंगे। क्योंकि महाराष्ट्र के मुंबई में उत्तर भारतीय लोगों की जनसंख्या काफी ज्यादा है। शिवसेना और एमएनएस तो पहले ही उत्तर भारतीय विरोधी पार्टी के तौर पर जानी गई है। ऐसे में इसमें फायदा एनसीपी, कांग्रेस को हो सकता है। भाजपा को इसलिए नहीं क्योंकि अप्रत्यक्ष तौर पर शिवसेना भाजपा से अभी भी जुड़ी है।

यह भी होगा मुद्दा
महाराष्ट्र चुनाव में इस बार अल्पसंख्यक मुद्दा भी काम कर सकता है। क्योंकि कांग्रेस में सरकार में रहते हुए मुस्लिम समुदाय को 16 फीसदी आरक्षण लागू किया। इससे सहानुभूति एक तरफा जाने की संभानाएं बन रही हैं।












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