उद्धव ठाकरे के करीबी मंत्री अनिल परब कौन हैं, जिनपर लगा है भ्रष्टाचार का इतना गंभीर आरोप ?
मुंबई: भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे महाराष्ट्र के गृहमंत्री अनिल देशमुख के इस्तीफे के बाद उद्धव ठाकरे सरकार के एक और बड़े मंत्री सीधे तौर पर करप्शन के गंभीर आरोपों में घिर गए हैं। ये हैं राज्य के ट्रांसपोर्ट मंत्री अनिल परब। लेकिन, जबरन उगाही में उनका नाम आना बहुत ही ज्यादा अहम इसीलिए है, क्योंकि वो सिर्फ शिवसेना के बहुत ही कद्दावर नेता ही नहीं हैं, बल्कि ठाकरे परिवार के बहुत ही ज्यादा भरोसेमंद भी हैं। उनका भ्रष्टाचार से सीधा नाता जुड़ना सीएम ठाकरे की छवि के लिए भी सही नहीं बताया जा रहा है। बड़ी बात ये है कि उनपर आरोप उस निलंबित पुलिस वाले ने लगाया है, जो एनआईए की कस्टडी में है और जिसकी कारगुजारियों के खुलासे के बाद पूरी महा विकास अघाड़ी सरकार हिली हुई है और एक गृहमंत्री की कुर्सी जा चुकी है और एक पुलिस कमिश्नर को भी हटाया जा चुका है।

अनिल परब कौन हैं ?
56 साल के अनिल परब तीन बार से महाराष्ट्र विधान परिषद के सदस्य हैं। उन्हें उद्धव ठाकरे ने 2019 के दिसंबर में अपनी कैबिनेट में मंत्री बनाया था और ट्रांसपोर्ट विभाग जैसा महत्वपूर्ण विभाग सौंपा था। पेशे से एडवोकेट परब के ओहदे का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वह ठाकरे परिवार के बहुत ही करीबी हैं और मातोश्री के अव्वल दरबारियों में उनका नाम है। शिवसेना को उनकी जरूरत इसीलिए रहती है कि उनकी आक्रामक राजनीति पार्टी की हर सियासी आवश्यकताओं को पूरा करती है। वह पार्टी के कानूनी मामलों को तो देखते ही हैं, बीएमसी चुनावों में वो पार्टी के लिए सबसे बड़े हथियार की भूमिका निभाते रहे हैं। जाहिर है कि शिवसेना की राजनीति का केंद्र इससे पहले तक बीएमसी ही रहा है और इससे परब की पार्टी में अहमियत का अनुमान भी लगाया जा सकता है। यही वजह है कि पार्टी ने उन्हें 2001 से ही विभाग प्रमुख (संभाग प्रमुख) की जिम्मेदारी दे रखी है और वे अकेले ऐसे नेता हैं, जिन्हें दो संभागों का जिम्मा मिला हुआ है और मायानगरी में बांद्रा से लेकर अंधेरी तक पार्टी में उन्हीं का बोलबाला है।

अनिल परब पर सचिन वाजे का आरोप क्या है ?
उद्योगपति मुकेश अंबानी के घर के बाहर विस्फोटकों से भरी एसयूवी पार्क करने और उसके मालिक मनसुख हिरेन की हत्या के आरोपी मुंबई पुलिस के निलंबित असिस्टेंट पुलिस इंस्पेक्टर सचिन वाजे ने एनआईए कोर्ट में हाथ से लिखी एक चिट्ठी देने की कोशिश की है। उसमें उसने परब पर आरोप लगाया है कि पिछले साल जुलाई-अगस्त में उसे अपने सरकारी बंगले पर बुलाया और मुंबई के एक ट्रस्ट के खिलाफ चल रही प्राथमिक जांच रोकने के नाम पर 50 करोड़ रुपये उगाही करने को कहा। हालांकि, वाजे के मुताबिक उसने इसमें असमर्थता जता दी। उसके मुताबिक इस साल जनवरी में भी परब ने फिर कहा कि वह बीएमसी में धोखाधड़ी करने वाले 50 ठेकेदारों से कम से कम 2-2 करोड़ की उगाही करके दे। वाजे के मुताबिक मौजूदा केस में उसके ट्रांसफर होने तक उसे जांच में उन ठेकेदारों के खिलाफ कुछ भी हाथ नहीं लगा।

वाजे के आरोपों पर परब ने क्या कहा ?
अनिल परब ने सचिन वाजे के आरपों को खारिज करते हुआ कहा है कि वह नार्को टेस्ट भी करवाने के लिए तैयार हैं, लेकिन मंत्री पद से इस्तीफा नहीं देंगे। उन्होंने आरोप लगाया है कि उनके खिलाफ बीजेपी ने यह साजिश रची है ताकि उनके जरिए मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और उनकी सरकार को बदनाम किया जा सके। उन्होंने कहा है, 'मैं दोनों ही आरोपों को खारिज करता हूं क्योंकि ये गलत आरोप हैं। मैं बालासाहेब (शिवसेना के संस्थापक और उद्धव के पिता) और अपनी दोनों बेटियों के नाम की कसम खाता हूं और राज्य के लोगों से कहना चाहता हूं कि सारे आरोप झूठे हैं और यह मुझे बदनाम करने की कोशिश है।' उन्होंने यह भी दावा किया है कि बीजेपी की रणनीति ये है कि मुख्यमंत्री के नजदीकी व्यक्ति को बदनाम करो, जिससे सीएम और सरकार को बदनाम किया जा सके।

शिवसेना के लिए अनिल परब क्यों महत्वपूर्ण हैं ?
अनिल परब का शिवसेना में तबसे कद बढ़ना शुरू हो गया, जब 2017 में बीएमसी चुनाव से पहले उसका मुंबई में भाजपा के साथ गठबंध टूट गया। पार्टी ने देश के कई राज्यों से भी बड़े बजट वाली बीएमसी में भ्रष्टाचार के भाजपा के आरोपों का जवाब देने के लिए परब को आगे किया। चुनाव में मामूली अंतर से शिवसेना को भाजपा से बढ़त मिली और पार्टी ने उन्हें कई वरिष्ठ नेताओं को किनारे करके विधान परिषद में दल का नेता बना दिया। धीरे-धीरे वह ठाकरे और मातोश्री के और करीब होते गए और पार्टी में उनका कद बढ़ता चला गया। 2019 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों में भी उन्होंने पार्टी की रणनीति तय करने में अहम रोल अदा किया। जब विधानसभा चुनावों के बाद शिवसेना ने बीजेपी को झटका देकर कांग्रेस और एनसीपी के साथ हाथ मिलाकर सरकार बनाने का फैसला किया तो ठाकरे ने फिर से कई सीनियर को नजरअंदाज करके इन्हें मंत्री बनाया और वो महा विकास अघाड़ी सरकार में पार्टी के संकट मोचक बनकर उभरे। अदालत से लेकर राजनीति तक में वो ठाकरे के एक इशारे पर मैदान में उतरने लगे। खासकर करीब डेढ़ साल से शिवसेना ने उन्हें भाजपा के खिलाफ जमकर इस्तेमाल किया है। यही वजह है कि भाजपा चाहे उनपर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों पर जितना भी हाय-तोबा करे, उद्धव इतनी आसानी से उन्हें सरकार से निकालेंगे, इसकी संभावना लगती नहीं। लेकिन, इस मामले में शरद पवार का रोल भी देखने वाला होगा, जिनकी पार्टी के देशमुख पहले ही क्लीन बोल्ड हो चुके हैं।












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