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Arun Gawli कौन है? जो कहलाया अपराध जगत का ‘डैडी’, 10 हत्याओं का गुनाहगार 17 साल बाद क्यों जेल से रिहा?

Why Gangster Arun Gawli Get Bail: मुंबई की गलियों में कभी 'डैडी' के नाम से खौफ का पर्याय रहे अरुण गवली एक बार फिर सुर्खियों में हैं। 17 साल तक नागपुर सेंट्रल जेल की सलाखों के पीछे रहने के बाद, 3 सितंबर 2025 को गवली सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलने के बाद जेल से बाहर आ गया है। 76 साल के इस गैंगस्टर-नेता का स्वागत उसके परिवार, वकील और समर्थकों ने किया।

लेकिन ये रिहाई कोई साधारण खबर नहीं है-ये उस शख्स की कहानी है, जिसने मुंबई के अंडरवर्ल्ड को हिलाया, सियासत में कदम रखा, और फिर शिवसेना पार्षद कमलाकर जामसांडेकर (Kamlakar Jamsandekar) की हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा पाई। आइए, अरुण गवली की जिंदगी और उनके 2007 के मर्डर केस की पूरी कहानी खोलते हैं...

Who is Arun Gawli

Who Is Arun Gawli- कौन है अरुण गवली? 'डैडी' की खौफनाक दुनिया

1955 में जन्मे अरुण गुलाब गवली मुंबई के भायखला इलाके की तंग गलियों से निकलकर अंडरवर्ल्ड का 'डॉन' बना। उसकी कहानी किसी बॉलीवुड फिल्म से कम नहीं। दगड़ी चॉल, भायखला, उसका गढ़ था, जहां से उसने 1970 के दशक में अपराध की दुनिया में कदम रखा। पहले एक मिल मजदूर, फिर भायखला गैंग का हिस्सा, और बाद में दाऊद इब्राहिम की D-कंपनी से टकराने वाला गैंगस्टर-गवली की जिंदगी क्राइम, खून और सत्ता की सनसनीखेज दास्तान है।

  • अपराध की दुनिया: गवली ने उगाही, सुपारी किलिंग और प्रोटेक्शन रैकेट के जरिए मुंबई में अपनी बादशाहत कायम की। दाऊद के विदेश भागने के बाद गवली ने दगड़ी चॉल को अपना किला बनाया।
  • सियासी पारी: 1990 के दशक में गवली ने अपराध की दुनिया से निकलकर सियासत में कदम रखा। उन्होंने अखिल भारतीय सेना (ABS) बनाई और 2004 में मुंबई के चिंचपोकली से विधायक बने। मराठी माणुस के 'मसीहा' के रूप में खुद को पेश करते हुए उन्होंने सियासी जमीन बनाई, लेकिन उनका आपराधिक अतीत पीछा नहीं छोड़ता था।
  • बॉलीवुड कनेक्शन: गवली की जिंदगी पर 2017 में फिल्म 'डैडी' (Daddy Movie) बनी, जिसमें अर्जुन रामपाल (Arjun Rampal) ने उनका किरदार निभाया। उनकी पत्नी आशा गवली (ऐश्वर्या राजेश) की कहानी भी इस फिल्म में दिखाई गई।

2007 का मर्डर केस: कमलाकर जामसांडेकर की हत्या (Kamlakar Jamsandekar Murder)

2007 में मुंबई के घाटकोपर में शिवसेना पार्षद कमलाकर जामसांडेकर की गोली मारकर हत्या कर दी गई। ये हत्या कोई साधारण अपराध नहीं थी-ये मुंबई के अंडरवर्ल्ड और सियासत के गठजोड़ का खूनी नमूना थी। पुलिस ने इस हत्या को 'सुपारी किलिंग' करार दिया और इसका मास्टरमाइंड अरुण गवली को ठहराया।

  • क्या था मामला: जामसांडेकर शिवसेना के प्रभावशाली नेता थे और मुंबई की सियासत में उनकी अच्छी पकड़ थी। पुलिस का दावा था कि गवली ने अपने गैंग के जरिए उनकी हत्या करवाई, क्योंकि जामसांडेकर उसके सियासी और आपराधिक रास्ते में रोड़ा बन रहे थे। 2006 में गवली और उनके 11 साथियों को इस मामले में गिरफ्तार किया गया।
  • MCOCA का शिकंजा: गवली पर महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (MCOCA) के तहत केस दर्ज हुआ। पुलिस ने 138 पेज की चार्जशीट दाखिल की, जिसमें गवली के गैंग के संगठित अपराध में शामिल होने के सबूत पेश किए गए।
  • 2012 में सजा: अगस्त 2012 में मुंबई की सत्र अदालत ने गवली को जामसांडेकर की हत्या का दोषी ठहराया और उम्रकैद की सजा सुनाई। साथ ही, 17 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया। 2019 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस सजा को बरकरार रखा।
Who is Arun Gawli

17 साल बाद जमानत क्यों?

17 साल तक नागपुर सेंट्रल जेल में सजा काटने के बाद, 28 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने अरुण गवली को जमानत दे दी। जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने फैसला सुनाया, जिसमें कहा गया:- गवली 17 साल से ज्यादा समय से जेल में हैं। उसकी उम्र 76 साल हो चुकी है। उसकी अपील सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, जिसकी सुनवाई फरवरी 2026 में होगी। गवली की जमानत याचिका में उनके वकील ने उसकी उम्र और स्वास्थ्य समस्याओं का हवाला दिया, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने माना।

3 सितंबर 2025 को दोपहर 12:30 बजे, जेल की औपचारिकताएं पूरी होने के बाद गवली जेल से बाहर आया। उनके भाई, रिश्तेदार, वकील और समर्थक नागपुर सेंट्रल जेल के बाहर उनका इंतजार कर रहे थे। एक वायरल वीडियो में गवली सफेद दाढ़ी और बढ़े हुए वजन के साथ नजर आए, जिससे वो लगभग पहचान में नहीं आए। जेल से निकलते ही वो नागपुर एयरपोर्ट पहुंचे और मुंबई के लिए रवाना हुए, जहां वो अपने गढ़ दगड़ी चॉल लौटे।

जेल में गवली: गांधीवादी टॉपर और अनुशासित कैदी

17 साल की कैद के दौरान गवली ने सुर्खियां बटोरीं, लेकिन इस बार अपराध के लिए नहीं।

  • गांधीवादी टॉपर: 2018 में गवली ने जेल में गांधीवादी विचारों पर आधारित एक परीक्षा दी और 80 में से 74 अंक हासिल कर टॉप किया।
  • अनुशासित कैदी: नागपुर जेल के अधीक्षक वैभव एज के मुताबिक, गवली को 15-16 बार पैरोल और फरलो मिला, और हर बार उसने नियमों का पालन किया। वो जेल में अनुशासित रहा और उसे सिलाई, बुनाई जैसे काम सौंपे गए।

गवली का अतीत: अंडरवर्ल्ड से सियासत तक

  • अंडरवर्ल्ड की शुरुआत: 1970 के दशक में गवली ने भायखला के दगड़ी चॉल से अपराध की दुनिया में कदम रखा। पहले वो रामा नाइक और बाबू रेशम के साथ भायखला गैंग में था। बाद में दाऊद इब्राहिम की D-कंपनी से उसकी दुश्मनी शुरू हुई। 1980-90 के दशक में गवली ने अपने गैंग को मजबूत किया और उगाही, सुपारी किलिंग और प्रोटेक्शन रैकेट में नाम कमाया।
  • दगड़ी चॉल का किला: दगड़ी चॉल गवली का मुख्य ठिकाना था, जहां से वो अपने अपराध साम्राज्य को चलाते थे। ये चॉल अब रिडेवलपमेंट के लिए तैयार है, जहां 40 मंजिला इमारतें बनेंगी।
  • सियासी पारी: 1990 के दशक में गवली ने अखिल भारतीय सेना बनाई और 2004 में चिंचपोकली से विधायक बने। मराठी माणुस के लिए 'मसीहा' बनने की कोशिश में वो सियासत में आए, लेकिन गवली का आपराधिक रिकॉर्ड पीछा नहीं छोड़ता था।
  • 46 से ज्यादा केस: महाराष्ट्र सरकार के मुताबिक, गवली पर 46 से ज्यादा केस दर्ज थे, जिनमें 10 हत्या के मामले शामिल थे।

2007 Murder Case का सियासी कोण

कमलाकर जामसांडेकर की हत्या कोई साधारण अपराध नहीं थी। ये मुंबई के अंडरवर्ल्ड और सियासत के गठजोड़ का नतीजा थी। जामसांडेकर शिवसेना के मजबूत नेता थे। गवली की अखिल भारतीय सेना और शिवसेना में सियासी टकराव था। पुलिस का दावा था कि गवली ने जामसांडेकर को रास्ते से हटाने के लिए सुपारी दी। गवली पर पहली बार MCOCA के तहत केस दर्ज हुआ, जो संगठित अपराध के लिए बेहद सख्त कानून है। इसने उनके बचने की संभावनाओं को कम कर दिया। 2012 में सत्र अदालत ने गवली और 11 अन्य को दोषी ठहराया। 2019 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने सजा बरकरार रखी। गवली ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की, जो अभी लंबित है।

जमानत के बाद क्या?

3 सितंबर 2025 को गवली की रिहाई के बाद सियासी और सामाजिक हलकों में हलचल मच गई है। रिहाई के बाद गवली मुंबई के दगड़ी चॉल लौटे, जो कभी उनका किला था। क्या वो फिर से सियासत में सक्रिय होंगे? मुंबई में नगर निगम चुनाव नजदीक हैं। गवली की रिहाई को सियासी नजरिए से देखा जा रहा है। क्या उनकी अखिल भारतीय सेना फिर से सक्रिय होगी? सुप्रीम कोर्ट में उनकी अपील फरवरी 2026 में सुनी जाएगी। अगर अपील खारिज हुई, तो गवली को फिर जेल लौटना पड़ सकता है।

अरुण गवली की कहानी क्राइम, सत्ता और सियासत का एक अनोखा संगम है। दगड़ी चॉल का 'डैडी' 17 साल बाद जेल से बाहर है, लेकिन उसका अतीत अभी भी उसे पीछा कर रहा है। क्या ये रिहाई एक नए अध्याय की शुरुआत है, या पुरानी कहानी का अंत? वक्त बताएगा, लेकिन फिलहाल गवली की रिहाई ने मुंबई की गलियों में एक बार फिर 'डैडी' की चर्चा छेड़ दी है!

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