दो तिहाई बहुमत नहीं है काफी, BJP के साथ मिलकर सरकार नहीं बना पाएंगे एकनाथ शिंदे, जानिए क्यों

मुंबई, 23 जून। महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी की सरकार पर जिस तरह से संकट मंडरा रहा है उसके बीच एक बड़ा सवाल यह खड़ा हुआ है कि क्या एकनाथ शिंदे पर दल बदल कानून लागू होगा। नियम कहता है कि अगर आपके पास पार्टी के दो तिहाई विधायकों का समर्थन है तो यह कानून आप पर लागू नहीं होता है, ऐसे में शिवसेना के पास कुल 55 विधायक हैं और अगर 37 विधायक एकनाथ शिंदे के साथ आ जाते हैं तो दल बदल कानून उनपर लागू नहीं होगा। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती है, इन विधायकों की की मदद से एकनाथ शिंदे भाजपा के साथ मिलकर सरकार नहीं बना पाएंगे और इसकी वजह है कि दल बदल कानून की कुछ प्रमुख शर्तें। आइए डालते हैं एक नजर कि इसको लेकर कानून क्या कहता है।

भाजपा के साथ मिलकर सरकार बना नहीं पाएंगे बागी विधायक

भाजपा के साथ मिलकर सरकार बना नहीं पाएंगे बागी विधायक

लोकसभा के पूर्व सेक्रेटरी जनरल पीडीटी आचार्य ने स्क्रॉल को दिए इंटरव्यू में स्पष्ट किया है कि शिवसेना के बागी विधायक भाजपा के साथ मिलकर सरकार का गठन नहीं कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि बागी विधायक तभी दल बदल कानून के तहत अयोग्य होने से बच सकते हैं अगर ये भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो जाते हैं। लेकिन इसकी दो मुख्य शर्तें हैं, पहली शर्त कि मूल पार्टी शिवसेना कका भाजपा के साथ विलय होना चाहिए और दूसरी शर्त यह है कि पार्टी के दो तिहाई विधायक विलय के लिए राजी हों। यानि 37 विधायक अकेले एक गुट के तौर पर काम नहीं कर सकते हैं, उन्हें भाजपा के साथ विलय करना होगा और ये जानकारी ऐसा लगता है कि इन विधायकों के पास नहीं है।

क्या है नियम

क्या है नियम

ऐसे में बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि मूल पार्टी कौन सी है, यह कैसे तय होगा। एक तरफ उद्धव ठाकरे अपनी पार्टी को मूल पार्टी का दावा करेंगे तो दूसरी तरफ एकनाथ शिंदे भी यही दावा करेंगे। इसका फैसला चुनाव आयोग करता है क्योंकि चुनाव आयोग ने ही शिवसेना को राजनीतिक दल की मान्यता दी है, लिहाजा चुनाव आयोग ही यह तय करेगा कि कौन सा खेमा असली खेमा है। लेकिन यहां बड़ी बात यह समझने वाली है कि चुनाव आयोग जिसके भी पक्ष में यह फैसला देगा विरोधी खेमा इसका विरोध करेगा और सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लिहाजा अंतिम फैसला सुप्रीम कोर्ट में होगा और यह एक लंबी प्रक्रिया है।

कैसे तय होगा कौन सा खेमा मूल पार्टी का

कैसे तय होगा कौन सा खेमा मूल पार्टी का

मूल पार्टी का फैसला चुनाव आयोग मुख्य तौर पर इस आधार पर करता है कि आखिर चुनाव चिन्हें किसे आवंटित किया गया। 1969 से जो भी विवाद इस तरह के सामने आए हैं उसमे इसी आधार पर फैसला हुआ है। पहले जब कांग्रेस का विघटन हुआ तो चुनाव आयोग ने इसी आधार पर फैसला दिया था। सुप्रीम कोर्ट के भी कई पुराने फैसले हैं, जोकि चुनाव आयोग को इसका फैसला करने में मदद करते हैं। ऐसे में महाराष्ट्र में भी कुछ इसी तरह से होगा। विधायक दल इसमे कुछ नहीं कर सकता है। विधायक दल पार्टी का होता है और पार्टी विधायक दल से बनती है। ऐसे में इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि किस खेमे के पास कितने विधायक हैं।

 विधानसभा को भंग करने की सिफारिश का विकल्प

विधानसभा को भंग करने की सिफारिश का विकल्प

मौजूदा हालात में मौजूदा सरकार विधानसभा को भंग करने की राज्यपाल से सिफारिश कर सकती है क्योंकि अभी तो महाविकास अघाड़ी सरकार के पास बहुमत है, ऐसे में राज्यपाल को इस फैसले को मानना ही पड़ेगा और वह इसे मानने के लिए बाध्य हैं। दूसरा विकल्प यह है कि एकनाथ शिंदे भाजपा विधायकों के साथ मिलकर राज्यपाल को सरकार बनाने का दावा पेश कर दें। ये विधायक कह सकते हैं कि हमने महाविकास अघाड़ी से समर्थन वापस ले लिया है, ऐसे में राज्यपाल मुख्यमंत्री से सदन में बहुमत साबित करने को कह सकते हैं। सदन में अगर बहुमत साबित करने में उद्धव ठाकरे विफल होते हैं तो राज्यपाल विपक्ष के नेता से पूछेंगे कि क्या आप सरकार बनाने की स्थिति में हैं।

उद्धव ठाकरे के पास विकल्प

उद्धव ठाकरे के पास विकल्प

एक और विकल्प यह है कि शिवसेना आज एक बैठक बुला सकती है, अगर बागी विधायक बैठक में हिस्सा नहीं लेते हैं तो शिवसेना इनके खिलाफ कार्रवाई करते हुए यह कह सकती है कि इन विधायकों ने अपने से पार्टी की सदस्यता छोड़ दी है। इसके बाद ये विधायक अयोग्य करार दिए जा सकते हैं। उद्धव ठाकरे कह सकते हैं कि विधायकों ने बैठक में हिस्सा नहीं लिया, जोकि काफी अहम थी और सरकार का भविष्य इसपर निर्भर था, इसलिए इन्हें पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से बर्खास्त किया जाता है।

बागी विधायकों का अगला कदम

बागी विधायकों का अगला कदम

उद्धव ठाकरे की इस कार्रवाई के बाद बागी विधायक कहेंगे कि उनके खिलाफ दल बदल कानून के तहत कार्रवाई नहीं की जा सकती है और वह भाजपा के साथ विलय करना चाहते हैं। ऐसे में अगर उद्धव ठाकरे यह फैसला लेते हैं कि वह भाजपा के साथ विलय करना चाहते हैं तो ही विलय हो सकता है और सरकार बच सकती है। लेकिन ठाकरे भाजपा में विलय करेंगे ऐसा कतई संभव नहीं है।

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