विवादों में घिरा पहली कक्षा से हिंदी अनिवार्य किए जाने का फैसला, महाराष्ट्र की भाषा समिति ने जताई आपत्ति
Maharashtra Language Panel: महाराष्ट्र सरकार की ओर से स्कूलों में पहली कक्षा से ही हिंदी को तीसरी भाषा के तौर पर पढ़ाना अनिवार्य किए जाने का फैसला अब विवादों में घिर गया है। भाषा सलाहकार समिति ने इस फैसले का खुला विरोध करते हुए इसे छात्रों की उम्र और समझ के लिहाज से गलत बताया है। समिति का कहना है कि इस तरह का निर्णय न केवल बच्चों पर अतिरिक्त बोझ डालेगा, बल्कि यह शैक्षणिक रूप से भी उचित नहीं है।
यह मामला तब गरमाया जब राज्य सरकार ने 16 अप्रैल को राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) लागू करने की घोषणा की, जिसमें यह प्रावधान भी शामिल था कि पहली कक्षा से हिंदी पढ़ाई जाएगी। इस फैसले के बाद सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई और कई राजनीतिक दलों और शिक्षाविदों ने इस पर आपत्ति जताई। अब समिति ने मुख्यमंत्री को चिट्ठी लिखकर अपना विरोध जताया है।

मुख्यमंत्री को लिखा गया विरोध पत्र
समिति ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर कहा कि इस फैसले से छात्रों पर अनावश्यक दबाव बढ़ेगा और यह नीति वैज्ञानिक नहीं है। समिति ने सुझाव दिया है कि कक्षा 12 तक केवल दो भाषाएं - जिनमें मराठी शामिल हो - पढ़ाना ही बेहतर होगा।
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सोशल मीडिया पर भी हुआ विरोध
16 अप्रैल को राज्य सरकार की तरफ से नई शिक्षा नीति (NEP) लागू करने की घोषणा की गई थी, जिसमें हिंदी को तीसरी भाषा के रूप में शामिल करने की बात कही गई थी। इसके बाद सोशल मीडिया पर विपक्षी दलों के साथ कई शिक्षाविदों ने भी इसका विरोध किया।
फडणवीस का स्पष्टीकरण
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि मराठी की अनिवार्यता बरकरार है और हिंदी को तीसरी भाषा के रूप में इसलिए चुना गया क्योंकि राज्य के पास हिंदी पढ़ाने के लिए पर्याप्त शिक्षक हैं। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि यदि किसी स्कूल में छात्र किसी अन्य भारतीय भाषा को पढ़ना चाहें और ऐसे 20 से अधिक छात्र हों, तो उस भाषा के लिए शिक्षक उपलब्ध कराया जाएगा। यदि शिक्षक न मिलें, तो ऑनलाइन पढ़ाई की सुविधा दी जा सकती है।
सीमावर्ती क्षेत्रों के लिए लचीलापन
मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि महाराष्ट्र की सीमाओं से लगे क्षेत्रों में अन्य भाषाओं की जरूरत को ध्यान में रखते हुए हिंदी के विकल्प की सुविधा दी जा सकती है।
समिति को नहीं लिया गया था भरोसे में
भाषा समिति ने यह भी आपत्ति जताई कि महाराष्ट्र राज्य शैक्षणिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (SCERT) पुणे ने इस फैसले से पहले समिति से कोई सलाह नहीं ली। उन्होंने कहा कि समिति में भाषाविज्ञान और शिक्षा के क्षेत्र के विशेषज्ञ शामिल हैं, जिन्हें इस तरह के फैसलों में शामिल किया जाना चाहिए था।
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