Maharashtra Election: लोकसभा चुनाव के नतीजों से डरी बीजेपी? विधानसभा के लिए बदलनी पड़ी रणनीति!
Maharashtra Chunav: लोकसभा चुनावों से पहले तक बीजेपी महाराष्ट्र में विधानसभा चुनावों में अकेले 145 से ज्यादा सीटें जीतने की लक्ष्य लेकर चल रही थी। लेकिन, लोकसभा चुनावों में पार्टी और उसके महायुति गठबंधन को जो झटका लगा, उसके बाद बीजेपी ने अपना टारगेट करीब एक-तिहाई घटा दिया है।
महाराष्ट्र में विधानसभा की 288 सीटें हैं, जिनमें से 106 सीटें अभी भी बीजेपी के पास हैं। अब भाजपा अपनी सहयोगियों शिवसेना और एनसीपी के साथ मिलकर 145 के जादुई आंकड़े को पार करने की उम्मीद कर रही है।

बीजेपी ने 145 से घटाकर 100 सीटों का किया टारगेट
पिछले दिनों पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा, 'इस बात में कोई संदेह नहीं रहनी चाहिए कि महायुति सरकार में वापस लौट रही है। लेकिन, सत्ता में बने रहने के लिए हमें 100 सीटें सुनिश्चित करनी हैं। अगर हमने 100 का आंकड़ा पार कर लिया, बगैर बीजेपी के कोई भी सरकार बनाने में सक्षम नहीं हो पाएगा।'
लोकसभा चुनावों में वोट शेयर में एमवीए को मामूली बढ़त
महाराष्ट्र में मुख्य टक्कर सत्ताधारी महायुति और विपक्षी महा विकास अघाड़ी (MVA) के बीच होना है। लोकसभा चुनावों में भी यही दोनों गठबंधनों के बीच चुनावी लड़ाई हुई थी। तब विपक्षी गठबंधन को 48 में से 29 सीटें तो मिली थीं, लेकिन उनका वोट शेयर सिर्फ 0.3% ज्यादा था।
फडणवीस ने भी इसी बात पर जोर देने की कोशिश की कि वास्तविक वोट में अंतर सिर्फ 2 लाख वोटों का था और इसे आसानी से पाटा जा सकता है। डिप्टी सीएम के मुताबिक अकेले लाडकी बहीण योजना ही महायुति को बढ़त दिलाने के लिए काफी रहेगी।
ज्यादा सीटों के नारे का दांव उल्टा पड़ा
बीजेपी के एक नेता ने माना है कि 'लोकसभा चुनावों में 400 पार का नारा उल्टा पड़ गया। महाराष्ट्र में हमने कहा था कि 49 में से हम 45 से ज्यादा जीतेंगे। लेकिन, इसका विपरीत असर हुआ।'
सीधे मतदाताओं से संपर्क पर बीजेपी करेगी फोकस
'बड़े-बड़े प्रचार अभियानों और अनुमानों पर जोर देने की जगह, हमने पूरे राज्य में लोगों से सीधे संपर्क के आजमाए और परखे हुए फार्मूले का सहारा लिया है। हमने महसूस किया है कि लोकसभा में नाकामी जमीनी स्तर पर लोगों से संपर्क टूटने के कारण से हुई।'
आरएसएस के दरवाजे पर भी वापसी
जानकारी के मुताबिक इसके लिए बीजेपी ने वापस आरएसएस की ओर देखना शुरू किया है। फडणवीस के खुद का बैक्रगाउंड वहीं से है और पार्टी को लग रहा है कि अगर मतदाता-संपर्क अभियानों में संघ के स्वयं सेवकों का साथ मिल गया तो पार्टी के अपने 35 लाख सक्रिय कार्यकर्ताओं की ताकत में चार चांद लग सकता है।
लोकसभा चुनावों की गलतियों से बीजेपी को मिली सीख!
भाजपा के अंदर के लोगों का कहना है कि महायुति सरकार की लोकप्रिय योजनाओं को जमीनी स्तर तक पहुंचाने में संघ बहुत अहम रोल निभा सकता है। लोकसभा चुनावों के दौरान दोनों संगठनों में दूरी की बातें सामने आई थीं। खासकर बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के उस बयान से संघ को धक्का लगा था कि बीजेपी खुद में ही सक्षम है और अब उसे पहले की तरह आरएसएस पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं है।
महाराष्ट्र में बीजेपी और आरएसएस के बीच पिछले वर्षों में तालमेल में कमी आने की एक वजह ये भी रही है कि 2021 से राज्य में महासचिव (संगठन) का पद खाली रहा है। परंपरागत तौर पर इस पद पर आरएसएस के कोई प्रचारक होते हैं जो राजनीतिक संगठन (भाजपा) और इसके वैचारिक अभिभावक संगठन (आरएसएस) के बीच पुल का काम करते हैं।












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