Maharashtra Chunav: महायुति के लिए कितना बड़ा है सोयाबीन की कीमतों का संकट, कितनी सीटों पर असर?
Maharashtra Chunav 2024:लोकसभा चुनावों में महाराष्ट्र के सत्ताधारी गठबंधन को राज्य की कम से कम 10 सीटों पर प्याज के आंसू रोने पड़े थे। प्याज निर्यात पर पाबंदी हटने से तो किसान खुश हैं, लेकिन सोयाबीन के मुंह चिढ़ाने वाले भाव ने किसानों को नाराज कर रखा है और सत्ता में होने की वजह से महायुति का दबाव में रहना स्वाभाविक है।
महाराष्ट्र में किसानों को सोयाबीन का सही भाव नहीं मिल रहा है। किसानों को 3,800 रुपए क्विंटल तक सोयाबीन बेचने को मजबूर होना पड़ा है। पिछले हफ्ते से कहीं-कहीं पर कुछ किसानों को 4,000 रुपए के भाव मिलने शुरू हुए हैं। लेकिन 4,892 रुपए के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से यह अभी भी बहुत कम है।

सोयाबीन के कम दाम, महायुति का जीना हराम!
हद तो तब हो गई थी कि सितंबर में किसानों को मजबूरन करीब 2,800 रुपए क्विंटल भी सोयाबीन बेचने पड़े थे, जो कि 10 साल का सबसे कम भाव है। जाहिर है कि किसानों का सारा गुस्सा उन्हीं दलों और गठबंधनों पर दिख रहा है, जो सत्ता में बैठे हुए हैं। इस वजह से महायुति के लिए यह एक बहुत बड़ी चुनौती बन चुकी है।
यह गठबंधन प्याज की कम कीमतों का खामियाजा लोकसभा चुनावों में भुगत चुका है। कुछ रिपोर्ट के मुताबिक कम से कम 10 सीटों पर इसने भाजपा की अगुवाई वाले गठबंधन को हराने में बहुत ही बड़ी भूमिका निभाई थी।
किसानों को एमएसपी का भी नहीं मिल रहा भाव
एमएसपी पर सुप्रीम कोर्ट से नियुक्त समिति के एक सदस्य और किसान नेता अनिल घनवट ने कहा, 'राज्य सरकार ने केंद्र को 6,954 रुपए प्रति क्विंटल एमएसपी देने की सिफारिश की थी, लेकिन केंद्र ने 4,892 रुपए तय किया। किसानों को यह भी नहीं मिल पा रहा है। इसको लेकर किसानों में बहुत भयंकर नाराजगी है।'
प्याजा उत्पादक इलाके से बड़ा है सोयाबीन उत्पादक क्षेत्र
लोकसभा चुनावों में विशेष रूप से प्याज पैदावार वाले नासिक, पुणे, छत्रपति संभाजीनगर, सोलापुर क्षेत्रों में महायुति गठबंधन को भारी नुकसान हुआ था। लेकिन, महायुति के लिए तब से बड़ा संकट ये है कि सोयाबीन विदर्भ से लेकर मराठवाड़ा तक में उगाई जाती है, जो कि प्याज उत्पादक क्षेत्रों से कहीं बड़ा है।
महाराष्ट्र में बहुत सारे किसानों ने सोयाबीन को कपास के विकल्प के तौर पर उगाना शुरू किया है। मराठवाड़ा के इलाके में ही आज 30 लाख हेक्टेयर से ज्यादा क्षेत्र में सोयाबीन की खेती होती है। विदर्भ भी बहुत बड़ा सोयाबीन उत्पादक क्षेत्र है, जहां इस बार इसकी बंपर पैदावार भी हुई है।
70 से ज्यादा विधानसभा सीटों पर पड़ सकता है असर
इसकी कम कीमतों में किसानों में जो नाराजगी है, उसके दायरे में 70 से ज्यादा विधानसभा की सीटें आती हैं। इसमें मराठवाड़ा के लातूर, ओस्मानाबाद, जालना, बीड, परभणी और औरंगाबाद जिले शामिल हैं। वहीं विदर्भ में नागपुर, यवतमाल, चंद्रपुर, वाशिम, वर्धा और बुल्ढाणा जैसे जिले भी आते हैं।
भाजपा को जमीनी हालात का पूरा इल्म है। इसलिए इसने अपने संकल्प पत्र में यह वादा किया है कि राज्य सरकार सोयाबीन और कपास के किसानों को एमएसपी और बेची जाने वाली कीमतों के अंतर का भुगतान करेगी। लेकिन, कांग्रेस यहां भी मौके पर चौका मारने की फिराक में है।
उसे मालूम है कि यह मुद्दा भाजपा और महायुति को असहज कर रहा है। इसलिए उसने सत्ता में आने पर एमएसपी से ज्यादा यानी सोयाबीन किसानों को उनके उत्पाद को 7,000 रुपए प्रति क्विंटल खरीदने का वादा कर दिया है।












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