विपक्षी एकता के बीच NCP के अंदर ही जबर्दस्त मौन विद्रोह का सामना कर रहे हैं शरद पवार?

पटना में हुई विपक्षी दलों की बैठक में एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार अपने साथ पार्टी के दोनों कार्यकारी अध्यक्षों सुप्रिया सुले और प्रफुल्ल पटेल को लेकर पहुंचे थे। विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ मोर्चा बनाने में जुटे हैं। लेकिन, तथ्य यह है पवार के अपने ही घर में सबकुछ ठीक नजर नहीं आ रहा है।

दरअसल, जब से पवार ने बेटी सुप्रिया सुले और करीबी प्रफुल्ल पटेल का एनसीपी में कद बढ़ाया है, उनके भतीजे और पूर्व उपमुख्यमंत्री अजित पवार ने मौन विद्रोह का झंडा उठा लिया है। सार्वजनिक रूप से वह सीधे-सीधे अपने चाचा पर हमले तो नहीं कर रहे हैं। लेकिन, उनके सवाल सीधे पार्टी सुप्रीमो के लिए ही तीर की तरह निकल रहे हैं।

silent rebellion within NCP

चाचा पवार के खिलाफ मौन विद्रोह!
अजित पवार ने मौन विद्रोह का झंडा उठाने का पहला संकेत तब दिया, जब शरद पवार की मौजूदगी में उन्होंने अचानक विपक्षी दल के नेता पद को ठुकराने की पेशकश कर दी। इस पद पर वह एक साल से बैठे हुए हैं। उन्होंने सीधे तौर पर संगठन का काम मान लिया, जिसके बारे में कहा जा रहा है कि वह प्रदेश एनसीपी में पूर्ण अधिकार चाह रहे हैं।

पार्टी की कमजोरी के लिए लीडरशिप पर निशाना साझ रहे हैं
एनसीपी में गड़बड़ी का पहला संदेश खुद शरद पवार इस्तीफे से सामने आया था। बाद में पार्टी के लोगों के कहने पर उसे वापस ले लिया और दो-दो कार्यकारी अध्यक्ष बना दिए। अजित पवार ने उसके बाद से ही अपने तेवर दिखाने शुरू किए हैं। वह एनसीपी के अंदर के मुद्दों को खुलकर उठाने लगे हैं और एक तरह से लीडरशिप को पार्टी की कमजोरी के लिए निशाने पर रख रहे हैं।

दरअसल, शरद पवार के खास जयंत पाटिल प्रदेश अध्यक्ष का जिम्मा संभाल रहे हैं। उनके आशीर्वाद से वह पांच साल पूरे होने के बाद भी पद पर बने हुए हैं, जबकि पार्टी ने इसके लिए तीन साल का कार्यकाल ही तय कर रखा है। कई विभागों के चीफ भी दशकों से एक ही पद पर जमे हुए हैं और अब जूनियर पवार इसे ही मुद्दा बना रहे हैं। वह कह रहे हैं कि मैं बता सकता हूं कि पार्टी कैसे चलाई जा सकती है।

ममता, केजरीवाल, केसीआर से तुलना
शरद पवार के लिए इससे बड़ी चुनौती क्या हो सकती है कि उनके भतीजे ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, जगन मोहन रेड्डी और के चंद्रशेखर राव का उदाहरण दे रहे हैं, जिन्होंने अपनी अलग राजनीति शुरू की और कहां से कहां पहुंच गए। जबकि, शरद पवार की नेतृत्व वाली एनसीपी पिछले 25 वर्षों में अपने दम पर सरकार नहीं बना पाई है। यहां तक कि मुंबई और विदर्भ में भी वह अपना जनाधार नहीं बना सकी है।

अजित पवार का इशारा साफ है कि पार्टी चीफ को दिल्ली से अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है, फिर भी आजतक पार्टी मुंबई में अपना अध्यक्ष नियुक्त क्यों नहीं कर सकी है। अजित पवार कहने लगे हैं कि राजनीतिक विरोधियों का सामना करने में एनसीपी के नेताओं में न तो प्रतिबद्धता नजर आती है और न ही दृढ़ संकल्प ही दिखाई देता है।

भुजबल के पीछे भी शरद पवार?
शरद पवार को राजनीति का चतुर खिलाड़ी माना जाता है। वह भतीजे के इशारों को भी समझ रहे होंगे। शायद यही वजह है उनके एक और करीबी छगन भुजबल भी अचानक सक्रिय हो गए हैं। उन्होंने ओबीसी को ही प्रदेश अध्यक्ष बनाने की जो मांग रखी है, उसके पीछे भी शरद पवार का ही आइडिया माना जा रहा है। शायद इससे वह अजित पवार के मौन विद्रोह का मौन रहकर ही सही इलाज करना चाहते हैं।

एनसीपी के टीएमसी या दूसरे दलों की तरह आगे नहीं बढ़ पाने की अजित पवार ने जो शिकायत की है, उसकी एक वजह ये भी है कि ढाई दशक के बाद भी यह मराठा समर्थक पार्टी के ठप्पे से नहीं उबर पाई है। जबकि, राज्य में मराठा महज 33% ही बताए जाते हैं। वहीं 40% ओबीसी हैं।

छगन भुजबल की दावेदारी के पीछे यह बहुत बड़ा कारण है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष चंद्रशेखर बावनकुले और कांग्रेस के बड़बोले अध्यक्ष नाना पटोले भी ओबीसी हैं। अब यह देखने वाली बात है कि भतीजे के शांत विद्रोह को पवार ने जिस ओबीसी कार्ड से दबाने की कोशिश की है, उसका पार्टी की सेहत पर आगे क्या असर होता है। लेकिन, यह तो प्रश्नचिन्ह लग ही चुका है कि पवार अभी अपनी पार्टी के सामने खड़ी चुनौतियों से निपटें या बीजेपी और नरेंद्र मोदी विरोधी विपक्षी दलों के लिए कॉमन मिनिमम प्रोग्राम का एजेंडा सेट करें?

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