Maharashtra Politics में भाजपा की 'शिवसेना' पर निर्भरता फिर साबित हुई!
महाराष्ट्र का सियासी विवाद सुर्खियों में है। चुनाव आयोग के फैसले के बाद उद्धव ठाकरे और सीएम शिंदे के बीच सुप्रीम कोर्ट में भी बहस होनी है। इस तकरार से महाराष्ट्र में बीजेपी की शिवसेना पर निर्भरता साबित हुई है।

Maharashtra Politics में कई उतार-चढ़ाव के बावजूद, शिवसेना आज भी प्रासंगिक है। दिवंगत संस्थापक बाल ठाकरे के नेतृत्व की बदौलत अपने वोट बैंक को बनाए रखने में सफल रही शिवसेना अपने प्रतिबद्ध मतदाताओं, मुख्य रूप से स्थानीय लोगों या मजबूत पकड़ बनाए रखी है। इलेक्शन कमीशन के फैसले के कारण महाराष्ट्र की सियासत चर्चा में है। सियासी पंडितों का मानना है कि 'शिवसेना' पर भाजपा की निर्भरता फिर से साबित हुई है।
शिवसेना पर हक को लेकर उद्धव ठाकरे और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे का टकराव सुप्रीम कोर्ट में हो रहा है। दरअसल, उद्धव ने चुनाव आयोग के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किया है। इसी बीच भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को शिवसेना के बागी एकनाथ शिंदे का साथ हासिल करके उद्धव ठाकरे को हाशिए पर धकेलने वाली लड़ाई में जीत का एहसास भी हो रहा होगा। बड़ी लड़ाई जीतने की बात कहने वाली बीजेपी ने इस बात को भी स्वीकार किया है कि जब महाराष्ट्र की बात आती है तो वह शिवसेना के बिना ज्यादा से ज्यादा सफलता की उम्मीद नहीं की जा सकती। गृह मंत्री अमित शाह के राज्य दौरे के समापन के दिन, उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कोल्हापुर में घोषणा की कि भाजपा अब एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के साथ गठबंधन में आगामी चुनाव लड़ेगी।
फडणवीस की घोषणा इसलिए भी चौंकाने वाली है क्योंकि करीब 9 साल पहले 2014 में महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में भाजपा ने 2014 में उद्धव ठाकरे की बोली का विरोध किया था। अकेले हिंदुत्व के मशाल वाहक के रूप में खुद को स्थापित करने के प्रयास में शिवसेना को त्यागने की बात कहने वाली भाजपा अब शिवसेना के साथ की बात कर रही है।
महाराष्ट्र की सियासत पर इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2019 में पहली बार नहीं बुआ जब मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए मजबूत पिच बनाने के लिए उद्धव ठाकरे ने भाजपा को नाराज कर दिया था। हालांकि, जब 2014 में भाजपा के 25 साल पुराने सहयोगी- शिवसेना ने संबंध तोड़ने का फैसले लिया तो इसका ठीकरा ठाकरे पर फूटा। उनके कुछ बयान गठबंधन के बीच विवाद की जड़ बन गए थे। तकरार की नींव दिवंगत बाल ठाकरे और प्रमोद महाजन के दौर में 80 के दशक के अंत में रखी गई थी।
यह भी दिलचस्प है कि 2014 में भाजपा-शिवसेना 169 और 119 सीटों वाले फार्मूले पर भी आमने-सामने थीं। बीजेपी 184 यानी 15 और सीटें मांग रही थी। अतिरिक्त सीटों की मांग के बाद उसी वर्ष अप्रैल-मई में हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा को शानदार जीत मिली। कुछ भाजपा नेताओं ने गठबंधन सहयोगियों को एक निश्चित संख्या में सीटें आवंटित करने और आपस में 50:50 साझा करने का प्रस्ताव भी रखा था।
इसी दौरान उद्धव ठाकरे से जब राज्य का मुख्यमंत्री बनने की उनकी इच्छा के बारे में पूछा गया तो वे सतर्क नजर आए। उन्होंने कहा, यह महाराष्ट्र की जनता को तय करना है कि वे मुझ पर भरोसा करते हैं या नहीं। वही तय करेंगे कि वे (सीएम) के चेहरे के रूप में किसे चाहते हैं। मैं किसी पद के लिए लालायित नहीं हूं, लेकिन जिम्मेदारी से भी पीछे नहीं हटूंगा। भले ही 2014 में उद्धव सीएम नहीं बन सके, लेकिन ठाकरे ने 2019 में इच्छा पूरी की। ठाकरे का रूख भाजपा को रास नहीं आया। 2019 के चुनाव के लिए बातचीत सीएम पद के इर्द-गिर्द केंद्रित रही थी।
भले ही भाजपा ने 2014 के राज्य विधानसभा चुनावों में 122 सीटें जीतकर महाराष्ट्र में अपने मुख्यमंत्री की घोषणा की। विधानसभा में स्पष्ट बहुमत हासिल करने में विफल रहने के कारण बीजेपी को शिवसेना के सत्ता साझा करनी पड़ी। देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार केंद्र में प्यार और नफरत से भरे पांच साल के कार्यकाल के दौरान ठाकरे और उनके भरोसेमंद व्यक्ति संजय राउत के तीखे कटाक्ष झेलते रहे। सरकार कठिन दौर से गुजरी। आखिरकार, जनवरी 2018 में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को छोड़ने का फैसला सामने आया। शिवसेना ने अलग होने की पहल की, लेकिन भाजपा 2019 के आम चुनावों को देखते हुए सीट-शेयरिंग समझौते पर मुहर लगाने के लिए शिवसेना नेतृत्व पर दबाव बनाती रही।
-----
भाजपा और शिवसेना के बीच बातचीत के दौरान उसी अवधि में असंतोष के बीज भी पड़े क्योंकि बाद में विधानसभा चुनाव के लिए गठबंधन को बरकरार रखने के लिए मुख्यमंत्री पद पर जोर दिया गया। तत्कालीन भाजपा प्रमुख अमित शाह और उद्धव के बीच बंद दरवाजों के पीछे क्या हुआ यह आज भी एक रहस्य बना हुआ है। ठाकरे ने दावा किया था कि उन्हें मुख्यमंत्री पद का वादा किया गया था। शाह ने इसका जोरदार खंडन किया था। ऐसे में ठाकरे ने दूसरा रास्ता चुना और महा विकास अघाड़ी (MVA) सरकार बनाने के लिए राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) और कांग्रेस के साथ हाथ मिलाए। भाजपा ने जनादेश को धोखा देने का आरोप लगाया। नाराज बीजेपी नेताओं ने पहले दिन से ही उद्धव ठाकरे सरकार को बेनकाब करने और उसे गिराने की पूरी कोशिश की। जून, 2022 में इसमें सफलता भी मिली। शिंदे की बगावत के बाद बीजेपी के सहयोग से शिवसेना-बीजेपी सरकार बनी। चौंकाने वाले फैसले के तहत पूर्व सीएम फडणवीस डिप्टी सीएम बने।
MVA सरकार सात महीने पहले ताश के पत्तों की तरह बिखरी, लेकिन बीजेपी ने एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले विद्रोही समूह के सामने कमाल का धैर्य दिखाया। पार्टी ने विधायकों को भाजपा में शामिल कराने पर जोर नहीं दिया। वह चाहती थी कि ठाकरे को हटाकर शिंदे शिवसेना का नियंत्रण अपने हाथ में ले लें। इसे मुख्य रूप से महाराष्ट्र में मतदाताओं के बीच शिवसेना के मजबूत आधार के कारण एक सोची समझी चाल के रूप में देखा जा सकता है। ऐसा लगता है कि भाजपा के चाणक्यों ने इस बात को स्वीकार कर लिया है कि शिवसेना के प्रतिबद्ध मतदाताओं पर जीत हासिल करने का एकमात्र तरीका पार्टी को किसी भी रूप में जीवित रखना है।
शिवसेना का वोट बैंक
सियासी समीक्षकों का मानना है कि तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद, शिवसेना के दिवंगत संस्थापक बाल ठाकरे के नेतृत्व की बदौलत अपने वोट बैंक को बनाए रखने में सफल रही है। उन्होंने अपने प्रतिबद्ध मतदाताओं, मुख्य रूप से स्थानीय लोगों (मराठी मानुष) पर मजबूत पकड़ बनाए रखी। 1989 के लोकसभा चुनाव में सिर्फ एक सीट जीतने वाली पार्टी ने 1996 और 1999 में 15 सीटें जीतीं। 2004 और 2009 के लोकसभा चुनाव में इसका प्रदर्शन 12 और 11 सीटें थीं। राज्य विधानसभा चुनावों ने हमेशा 2014 से पहले सेना को बढ़त मिलती रही। शिवसेना को 1990 में 52, 1995 में 73, 1999 में 69, 2004 में 62 सीटें मिलीं। भाजपा प्रमुख पार्टी नहीं बन सकी।
2014 में 122 सीटें जीतने वाली भाजपा 2019 में 105 सीटें जीतने में सफल रही, लेकिन भाजपा अकेले दम पर महाराष्ट्र में सरकार बनाने के लिए जरूरी मैजिक नंबर 145 के जादुई आंकड़े के करीब आने में विफल रही। इस तथ्य को स्वीकार करते हुए, लगता है कि पार्टी ने उद्धव ठाकरे के प्रभाव को कम करने के लिए एक नई रणनीति तैयार की है। एनसीपी और कांग्रेस के साथ जाने के फैसले को भी बड़ा झटका लगा है। हालांकि, महाराष्ट्र की सियासी समझ रखने वाले लोग कहते हैं कि MVA सरकार जितनी अधिक समय तक जीवित रहेगी, बीजेपी के लिए लोकसभा की अधिकतम सीटें जीतने और महाराष्ट्र की सत्ता हासिल करने की संभावना उतनी ही कम होगी।












Click it and Unblock the Notifications