बच्चा कोई संपत्ति नहीं, मां-बाप अंह में अधिकारों को अनदेखी न करें: बॉम्बे हाईकोर्ट
Bombay High Court News: बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि वैवाहिक विवादों में उलझे माता-पिता अपने अहंकार को संतुष्ट करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं, लेकिन वे अपने बच्चे के जन्म रिकॉर्ड को मनमाने ढंग से बदलने का अधिकार नहीं रखते।
38 वर्षीय एक महिला ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर मांग की थी कि उसके बच्चे के जन्म प्रमाण पत्र में केवल उसका नाम दर्ज किया जाए और पिता का नाम हटाया जाए। महिला ने दावा किया कि उसका पति बुरी आदतों का आदी है और उसने कभी अपने बच्चे को देखा भी नहीं।

हाईकोर्ट का सख्त रुख
हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ के न्यायमूर्ति मंगेश पाटिल और वाई जी खोबरागड़े ने इस याचिका को सिरे से खारिज कर दिया और कहा कि कोई भी माता-पिता अपने बच्चे के जन्म रिकॉर्ड को बदलने का अधिकार नहीं रखते। अदालत ने इस याचिका को न्याय प्रक्रिया का दुरुपयोग करार दिया और महिला पर 5,000 रुपये का जुर्माना लगाया।
'बच्चा कोई संपत्ति नहीं' - हाईकोर्ट
पीठ ने कहा कि महिला केवल अपने अहंकार को संतुष्ट करने के लिए यह सब कर रही थी और बच्चे के हितों की अनदेखी कर रही थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चे का कल्याण सबसे महत्वपूर्ण है और उसे माता-पिता के व्यक्तिगत विवादों का शिकार नहीं बनाया जाना चाहिए।
क्या कहता है कानून?
कानूनी रूप से, बच्चे के जन्म प्रमाण पत्र में माता-पिता दोनों का नाम दर्ज करना आवश्यक है। अगर माता-पिता के बीच मतभेद हैं या वे अलग हो चुके हैं, तब भी यह दस्तावेज़ी प्रक्रिया प्रभावित नहीं हो सकती।
न्यायालय की चेतावनी
अदालत ने इस मामले को वैवाहिक विवादों के कारण बेवजह मुकदमों की बढ़ती प्रवृत्ति का उदाहरण बताया। पीठ ने कहा कि माता-पिता को यह समझना चाहिए कि बच्चे के कानूनी अधिकारों से छेड़छाड़ करना न्यायिक प्रक्रिया की बर्बादी है।
इस फैसले से यह स्पष्ट होता है कि कोई भी माता-पिता अपने वैवाहिक विवादों की वजह से बच्चे के कानूनी अधिकारों के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकता। अदालत ने माता-पिता को सख्त संदेश दिया कि बच्चे का हित सर्वोपरि है, न कि उनका अहंकार।












Click it and Unblock the Notifications