Ajit Pawar rebellion: एक चाल से भाजपा ने खामोशी से साधे दो निशाने
Ajit Pawar rebellion: महाराष्ट्र की राजनीति में रविवार को अचानक भूकंप तब आया जब एनसीपी नेता अजित पवार ने अपने चाचा शरद पवार को झटका देते हुए कुछ विधायकों के संग बगावत कर दी।महाराष्ट्र की सत्ता पर काबिज भाजपा से हाथ थामकर ना केवल सरकार में शामिल हो गए बल्कि उपमुख्यमंत्री भी बना दिए गए। अजित पवार की बगावत से इस बार भाजपा ने एक तीर से दो निशाने साधे हैं आइए जानें कैसे?

ऑपरेशन लोटस को भाजपा ने खामोशी दे दिया अंजाम
बता दें इस बार भाजपा ने महाराष्ट्र में पिछले अनुभवों से सबक लेते हुए ऑपरेशन लोटस को बड़ी ही खामोशी और धैर्य के साथ अंजाम दिया। इस बार भाजपा ने इस काम को अंजाम देने की पूरी जिम्मेदारी अजित पवार पर ही छोड़ी थी। भाजपा ने साफ कर दिया था कि इस उनकी पार्टी कोई पहल नहीं करेगी।
शिंदे और फडणवीस ने दिल्ली जाकर आलाकमान के साथ रची ये रणनीति
अजित पवार ने जब अपने विधायकों की लिस्ट सौंपी जिसके बाद सीएएम एकनाथ शिंदे और डिप्टी सीएम देवेंद फडणवीस दोनों ने अमित शाह और जे पी नड्डा के साथ दिल्ली में मुलाकात की और सूचित किया कि एनसीपी में सेंध लगाने का सही समय आ गया है।
गुरुवार की रात लिखी गई थी ये पटकथा
शिंदे और फड़नवीस गुरुवार (29 जून) देर शाम दिल्ली आए और सीधे शाह के आवास पर पहुंचे थे और बातचीत करने के बाद मुंबई लौट आए। सूत्रों के अनुसार उस बैठक में निर्णय को अंतिम रूप दिया गया। भाजपा और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) नेता अजीत पवार के बीच कुछ समय से चर्चा चल रही थी, लेकिन अंतिम रूप इसी बैठक में दिया गया।
एक चाल से बीजेपी ने दो निशाने साधे
अजित पवार की बगावत के बाद एनसीपी में विभाजन कई मायनों में भाजपा के लिए अच्छा संकेत है। पहला ये कि पार्टी ने 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले राज्य में अपनी चुनावी स्थिति सुरक्षित और मजबूत कर ली है और विपक्ष को कमजोर कर चुकी है।
महाराष्ट्र में विपक्ष के गठबंधन को किया कमजोर
इससे भी अहम बात ये है कि अजीत पवार की एंट्री 2019 में भाजपा के साथ गठबंधन से बाहर निकलने और उसके बाद एनसीपी और कांग्रेस के साथ महा विकास अघाड़ी (एमवीए) के गठन के लिए शिवसेना के कदम का बदला भी है। अजित की बगावत के बाद एनसीपी और शिवसेना (यूबीटी) दोनों अब कमजोर हो गए हैं।
ये 2024 की रणनीति का हिस्सा है
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार भाजपा के वरिष्ठ नेता ने खुलासा किया कि ये 2024 की रणनीति का हिस्सा है। उन्होंने कहा भाजपा को 2024 के चुनावों में अपनी संभावनाओं के बारे में संदेह था क्योंकि पार्टी में कई लोग उस स्थिति से डरते थे जब उद्धव ठाकरे की शिवसेना, एनसीपी कांग्रेस और अन्य छोटी पार्टियां 48 सीटों पर लड़ने के लिए एक साथ आएंगी। विधानसभा चुनाव के लिए विपक्ष एक मजबूत ताकत होता अब फूट पड़ जाने से विपक्ष कमजोर हो गया है।
शिंदे की शिवसेना पर खत्म हुई भाजपा की निर्भरता
वहीं दूसरी ओर जो भाजपा को लाभ हुआ है कि आगामी विधानसभा चुनाव हो या लोकसभा चुनाव अब महाराष्ट्र में भाजपा को पूरी तरह से (मुख्यमंत्री एकनाथ) शिंदे की शिवसेना पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। यहां तक कि अगर अयोग्यता होती है (शिवसेना में विभाजन के बाद, निर्णय वर्तमान में महाराष्ट्र विधानसभा के अध्यक्ष के पास है) तो अजित पवार और उनके विधायकों के समर्थन से सरकार बनी रहेगी।












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