महाराष्ट्र में अजित पवार की NCP अब शरद पवार से ज्यादा कांग्रेस के लिए क्यों बन चुकी है चुनौती?
महाराष्ट्र की राजनीति में चुनाव आयोग और राज्य विधानसभा के स्पीकर राहुल नार्वेकर के हालिया फैसलों से उपमुख्यमंत्री अजित पवार सियासी तौर पर बहुत मजबूत होकर उभरे हैं। उन्होंने विचारधारा की राजनीति की जगह 'सुविधा की सियासत' को प्रमुखता दी है और इसका उन्हें फायदा मिल रहा है।
चुनाव आयोग और स्पीकर दोनों के ही फैसलों से एनसीपी पर अजित पवार की दावेदारी पर मुहर लग गई है। वैसे चुनाव आयोग के फैसले के बाद से ही विपक्ष पर अजित पवार का पावर दिखना शुरू हो गया था। मुंबई कांग्रेस के चर्चित चेहरे बाबा सिद्दीकी 48 साल बाद कांग्रेस का 'हाथ' छुड़ाकर अजित 'दादा' की 'घड़ी' पहन चुके हैं।

एनसीपी पर कब्जा मिलने से अजित पवार और मजबूत हुए
लेकिन, महाराष्ट्र की राजनीति के जानकार मानते हैं कि मंगलवार को स्पीकर राहुल नार्वेकर के अजित पवार के पक्ष में आए फैसले से एनसीपी के और मजबूत होने का रास्ता साफ हो गया है। अजित पवार भले ही बीजेपी और शिवसेना की गठबंधन सरकार में शामिल हैं, लेकिन एनसीपी ने फिर भी खुद की छवि कथित रूप से सेक्युलर वाली बना रखी है।
पश्चिमी महाराष्ट्र में जनधार बढ़ाने पर दिया है जोर
पश्चिमी महाराष्ट्र के गन्ना बेल्ट को एनसीपी का गढ़ माना जाता है। पुणे, सतारा, सांगली और कोल्हापुर से लेकर सोलापुर के कुछ हिस्सों तक में इसका खासा जनाधार रहा है। यहां शरद पवार ने जिस तरह से पार्टी की नींव मजबूत की थी, पार्टी टूटने के बाद उनके भतीजे अजित पवार ने लगातार इसके विस्तार के लिए काम किया है।
एनसपी के मजबूत होने से कांग्रेस को हो सकता है ज्यादा नुकसान
क्योंकि, अब एनसीपी पूरी तरह से अजित पवार के साथ है, इसलिए जानकारों को लगता है कि इसका जनाधार और मजबूत होना तय है और इसका सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस को झेलना पड़ सकता है, जिसका ट्रेलर बाबा सिद्दीकी के रूप में दिख चुका है।
कांग्रेस नेताओं पर टिकी है अजित पवार की नजर
टीओआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक कांग्रेस के एक नेता ने नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा, 'पवार की तरह अजित पवार का पश्चिमी महाराष्ट्र में तगड़ा नेटवर्क है और चाचा से अलग होने के बाद वे कांग्रेस के नेताओं के साथ-साथ कार्यकर्ताओं को मनाने की कोशिश कर रहे हैं।'
उन्होंने कहा, 'अब जबकि एनसीपी उनके कंट्रोल में आ चुकी है, वे विपक्ष के उन नेताओं को तोड़ने की कोशिश कर सकते हैं, जो सत्ता में जाने के लिए उतावले बैठे हैं।'
वजह ये है कि कांग्रेस की युवा पीढ़ी करीब 10 वर्षों से सत्ता से एक तरह से दूर ही रही है और अब एनसीपी के रास्ते उसे सेक्युलर पार्टी के सहारे सत्ता का स्वाद चखने का मौका मिल सकता है।
विपक्षी दलों के असंतुष्टों पर डाल सकते हैं डोरे
हाल ही में उपमुख्यमंत्री सांगली से शरद पवार के वफादार जयंत पाटिल को अपने खेमे में कर चुके हैं। वह जयश्री पाटिल जैसी कांग्रेस की असंतुष्ट नेताओं को भी एनसीपी में लाना चाहते हैं।
कांग्रेस नेता मदन पाटिल की विधवा महाराष्ट्र के पूर्व सीएम वसंतदादा पाटिल के परिवार से आती हैं। 2019 में उन्होंने सांगली से टिकट मांगा था, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली।
'विपक्षी नेताओं को सत्तापक्ष में जाने का मौका'
कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक,'कांग्रेस नेताओं की युवा पीढ़ी ने पिछले 10 वर्ष विपक्ष में गुजारे हैं। लेकिन, बीजेपी और शिवसेना के साथ विचारधारा में अंतर की वजह से उन्होंने पार्टी नहीं बदली। अब जब अजित पवार की पार्टी को आधिकारिक मान्यता मिल गई है, इन नेताओं के लिए सत्ताधारी दल में जाने का विकल्प मिल गया है। कांग्रेस के पूर्व नेता बाबा सिद्दीकी इसके उदाहरण हैं।'
पश्चिम महाराष्ट्र में अजित पवार को मिल सकती है ज्यादा कामयाबी-जानकार
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक अजित पवार का जोर व्यवहारिक राजनीति पर है। एक राजनीतिक विश्लेषक प्रकाश पवार का कहना है, 'अजित पवार की राजनीति विचारधारा से ज्यादा व्यावहारिकता के भरोसे है। अपनी पार्टी के विस्तार के लिए वे ऐसे नेताओं को तबज्जो देंगे, जो आर्थिक रूप से मजबूत हों और व्यावहारिक फैसले लेने में सक्षम हों।'
उन्होंने कहा, 'पश्चिमी महाराष्ट्र में सफलता मिल सकती है, जहां कई मराठा नेता काफी संपन्न हैं, लेकिन चुनाव लड़ने का अवसर नहीं मिल रहा है।'












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