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एक बूंद पानी को तरस रहा है मध्य प्रदेश का यह गांव, लोगों को प्यास बुझाने के लिए रोज जाना पड़ता है उत्तर प्रदेश

By Rajeevkumar Singh
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    टीकमगढ़। मध्य प्रदेश में एक ऐसा गांव है जहां के लोगों को प्यास बुझाने के लिए उत्तर प्रदेश का सहारा लेना पड़ता है। यहां लोग अपने बच्चों के साथ दिन-दिन भर पानी के लिये भटकते हैं। पांच किलोमीटर का सफर तय करने के बाद इन ग्रामीणों की प्यास बुझ पाती है। यह आज से नहीं बल्कि पिछले तीन सालों से ग्रामीण भोग रहे हैं। वहीं जिम्मेदार अधिकारी वातानुकूलित कमरों में बैठकर फाइलें पलटा रहे हैं।

    पानी की घनघोर समस्या

    पानी की घनघोर समस्या

    मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ जिले का गांव अटरिया जिसकी आबादी तीन हजार के लगभग है, उत्तरप्रदेश के जनपद ललितपुर की सीमा से लगा हुआ है। बुंदेलखंड के इस इलाके में पिछले तीन साल से सूखे के हालात हैं लेकिन इस गांव की सूखे के चलते यह हालत हो गई है कि गांव के सारे हैंडपंप और कुओं ने पानी देना बंद कर दिया है। पिछले तीन माह से परेशान इन ग्रामीणों की समस्याओं को भी जिला प्रशासन ने भी नजरअंदाज कर दिया लेकिन जिंदगी की चाहत और गले की प्यास ने इन ग्रामीणों को पहुंचा दिया उत्तरप्रदेश के जनपद ललितपुर के गांव पथराई, जहां किसान रामलाल के खेत में लगे बोर से पांच किलोमीटर जाकर यह ग्रामीण पानी लाते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि पानी की समस्या के चलते कई लोगों की जान चली गई। नहाने से लेकर कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। यहां तक की गांव में युवाओं की शादी भी समस्या बन गई है।

    पानी ढोने में गुजर रहा बच्चों का जीवन, छूटी पढ़ाई

    पानी ढोने में गुजर रहा बच्चों का जीवन, छूटी पढ़ाई

    घर का सारा काम काज छोड़कर के महिलायें बच्चे दिनभर पानी ढोने के लिए लगे रहते हैं। समय पर घर का काम न हो पाने के कारण महिलायें भी परेशान रहती हैं। महिलायें कहती हैं कि बुंदेलखंड में पिछले तीन साल से सूखे की समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया है। बच्चे पढ़ने नहीं जा पाते हैं। गांव से लगातार पलायन हो रहा है क्योंकि पूरे परिवार को दिन-दिन भर पानी का इंतजार करना पड़ता है। कभी-कभी पानी के इंतजार में शाम हो जाती है और सुबह का खाना नहीं बन पाता है।

    मध्यप्रदेश सरकार का स्कूल चलो अभियान चल रहा है लेकिन यह अभियान टीकमगढ़ जिले के इस गांव अटरिया में अभिशाप बन गया है। यहां मासूम बच्चे जिनकी उम्र पढ़ने लिखने और खेलने की है वो अपनी मां और पीने के पानी की तलाश में मौत को गले लगाकर ऐसे कुओं में उतरते हैं जहां चंद पलों में लोगों की जिंदगी जा सकती है। मासूम कहते हैं कि पानी की प्यास तो बुझानी है, क्या करें। कहते हैं कि स्कूल तीन साल से नहीं गये हैं। यूपी से पानी लाना पड़ता हैं। नेता वोट के समय तो आते हैं लेकिन हमारी समस्या को हल नहीं करते हैं।

    5 किलोमीटर रोज सफर कर आते हैं उत्तर प्रदेश

    5 किलोमीटर रोज सफर कर आते हैं उत्तर प्रदेश

    मध्यप्रदेश के इस टीकमगढ़ जिले में अगर वर्षा का रिकार्ड देखा जाए तो यहां औसतन वर्षा 1000.02 मिलीमीटर है। लेकिन वर्ष 2009 से लगातार वर्षा का औसतन कम हो रहा है। वर्ष 2010 में 706 मि.मी. वर्षा हुई जबकि 2014-2015 में 670.02 वर्षा हुई। जबकि वर्ष 2017-18 में 548 मि.मी. वर्षा हुई इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं । मध्यप्रदेश के इस इलाके में लगातार वर्षा न होने के कारण पानी का संकट गहराता जा रहा है। वहीं लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के अधिकारी कहते हैं कि हम इस मामले को दिखवा रहे हैं। जान जोखिम में डालकर जहां मासूम कुआं में उतरकर अपनी प्यास बुझाते हैं वहीं महिलाओं को 44 डिग्री के तापमान में दिन-दिन भर अपने परिवार के साथ पानी के लिए पांच किलोमीटर का सफर तय कर पानी लाना पड़ता है। बुंदेलखंड की जीवनदायनी कही जाने वाली धसान नदी भी सूख गई है। कहीं-कहीं पोखरों में पानी जरूर नजर आता है। नदी पर बने स्टॉपडैम भी सूखे पड़े हैं।

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    English summary
    Villagers of Madhya Pradesh came to Uttar Pradesh daily for water.

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