MP News: मध्य प्रदेश में आदिवासियों की कैसे हुई जीत, जानिए, वन अधिकार पट्टों के लिए फिर से होगा सर्वे
MP News: मध्य प्रदेश में आदिवासियों के लिए एक बड़ी जीत के रूप में, सरकार ने वन ग्रामों में फिर से सर्वेक्षण की घोषणा की है, ताकि वन अधिकार अधिनियम (FRA) 2006 के तहत छूटे हुए पात्र आदिवासियों को वन भूमि के पट्टे दिए जा सकें। यह घोषणा नेपानगर, बुरहानपुर सहित विभिन्न क्षेत्रों में आदिवासी समुदायों के लंबे संघर्ष और कांग्रेस नेताओं जैसे उमंग सिंघार, कमलेश्वर पटेल, और अरुण यादव के आंदोलनों का परिणाम है।
हालांकि, इस कदम के साथ कई सवाल भी उठ रहे हैं-सर्वे की समय-सीमा क्या होगी?, 3 लाख से अधिक दावे क्यों निरस्त किए गए?, और क्या यह घोषणा जमीनी बदलाव लाएगी? आइए, इस मुद्दे की गहराई में जाएं और इन सवालों का विश्लेषण करें।

आदिवासियों की जीत, फिर से सर्वे की घोषणा
20 जून 2025 को मध्य प्रदेश सरकार ने घोषणा की कि वन ग्रामों में वन अधिकार अधिनियम (FRA) 2006 के तहत नए सिरे से सर्वेक्षण किया जाएगा। यह निर्णय उन आदिवासियों के लिए राहत की खबर है, जिनके वन भूमि अधिकार दावे पहले अस्वीकार किए गए थे। कांग्रेस नेता उमंग सिंघार ने X पर इसे "आदिवासियों की जीत" करार दिया, जबकि कमलेश्वर पटेल ने इसे "जंगल, जल, और जमीन की रक्षा" का आंदोलन बताया।
इस घोषणा का स्वागत करते हुए नेपानगर के आदिवासी कार्यकर्ता भीका सकड़िया की कहानी ने भी ध्यान खींचा, जिनके 1980 के वन अधिकार पट्टे को बिना नोटिस के निरस्त कर दिया गया था।
सर्वे की समय-सीमा: सवाल बिना जवाब
कांग्रेस नेताओं और आदिवासी कार्यकर्ताओं ने सरकार से सर्वे की समय-सीमा स्पष्ट करने की मांग की है। उमंग सिंघार ने X पर सवाल उठाया, "सर्वे कब होगा? इसकी समय-सीमा बताई जाए।" अभी तक सरकार ने इस सर्वे की कोई निश्चित तारीख या समय-सीमा घोषित नहीं की है। एसटीएफ भोपाल के सूत्रों के अनुसार, विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया गया है, जो सर्वे की प्रक्रिया को तकनीकी और पारदर्शी बनाने का काम करेगा। लेकिन, समय-सीमा के अभाव में यह सवाल बना हुआ है कि क्या यह घोषणा केवल एक चुनावी वादा है या वास्तविक बदलाव लाएगी।
2019 में मध्य प्रदेश सरकार ने 'वनमित्र' पोर्टल लॉन्च किया था, जिसका उद्देश्य अस्वीकृत दावों की समीक्षा करना था। हालांकि, कार्यकर्ता नितिन वर्गीस ने डाउन टू अर्थ को बताया कि इस पोर्टल का दुरुपयोग हुआ, और कई दावे बिना उचित जांच के खारिज किए गए। यह सवाल उठता है कि नया सर्वे कितना पारदर्शी और प्रभावी होगा।
3 लाख से अधिक दावे क्यों निरस्त किए गए?
वन अधिकार अधिनियम (FRA) 2006 के तहत मध्य प्रदेश में 5,79,411 दावे दायर किए गए थे, जिनमें से 3,54,787 दावे (लगभग 61%) खारिज कर दिए गए। X पर @UmangSinghar ने लिखा, "मध्यप्रदेश सरकार ने 2024 तक आदिवासियों द्वारा किए गए 6.5 लाख वनाधिकार दावों में से 3 लाख से ज़्यादा दावे बिना स्पष्ट कारण के खारिज कर दिए।"
नितिन वर्गीस के अनुसार, कई दावे अनुचित प्रक्रियाओं के कारण खारिज हुए, जैसे:
- ग्राम सभा की अनदेखी: FRA के नियमों के अनुसार, ग्राम सभा को दावों की प्रारंभिक जांच करनी होती है, लेकिन कई मामलों में यह प्रक्रिया छोड़ दी गई।
- अधिकारियों का मनमाना रवैया: पंचायत सचिवों ने कई दावों को "दावेदार मौके पर नहीं था" जैसे कारणों से खारिज कर दिया, बिना मौके पर जांच किए।
- तकनीकी खामियां: वनमित्र पोर्टल पर तकनीकी समस्याओं और गलत डेटा प्रविष्टि के कारण भी दावे खारिज हुए।
कांग्रेस नेता अरुण यादव ने इसे "षड्यंत्रपूर्ण" कार्रवाई करार दिया, विशेष रूप से नेपानगर क्षेत्र में, जहां आदिवासियों के पट्टे बिना नोटिस के निरस्त किए गए। सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में राज्यों से खारिज दावों की समीक्षा के लिए विस्तृत हलफनामा मांगा था, लेकिन मध्य प्रदेश में इस प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी रही।
क्या यह घोषणा जमीनी हकीकत बदलेगी?
कांग्रेस नेताओं ने सवाल उठाया है कि क्या यह घोषणा केवल "चुनावी घोषणा" है या वास्तव में आदिवासियों को उनके अधिकार मिलेंगे। उमंग सिंघार ने X पर लिखा, "क्या यह सिर्फ एक 'घोषणा' है या इससे जमीनी हकीकत में बदलाव आएगा?"
पिछले अनुभवों को देखते हुए, आदिवासी समुदाय और कार्यकर्ता सतर्क हैं। 2019 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी, 3 लाख से अधिक दावों की समीक्षा में गड़बड़ियां सामने आई थीं। वनमित्र पोर्टल की विफलता और ग्राम सभाओं की अनदेखी ने आदिवासियों का भरोसा तोड़ा है।
मध्य प्रदेश सरकार ने इस बार एसआईटी के गठन और नए सर्वे की घोषणा की है, लेकिन इसके लिए स्पष्ट दिशानिर्देश, समय-सीमा, और पारदर्शी प्रक्रिया का अभाव चिंता का विषय है। कमलेश्वर पटेल ने X पर कहा, "यह ज़मीन सिर्फ़ पट्टा नहीं, आदिवासियों की रोज़ी-रोटी है। हम एक इंच ज़मीन भी छिनने नहीं देंगे।"
आदिवासियों का संघर्ष: नेपानगर से भोपाल तक
नेपानगर, बुरहानपुर में आदिवासी समुदाय ने कांग्रेस नेताओं के साथ मिलकर व्यापक आंदोलन चलाया। भीका सकड़िया जैसे आदिवासियों की कहानियों ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उजागर किया। X पर @adiwasivikasMP ने लिखा, "हमारे आदिवासी भाई के पास 1980 से वन अधिकार पट्टे की कॉपी है, फिर भी बिना नोटिस के निरस्त कर दिया गया।"
कांग्रेस नेता उमंग सिंघार ने इस मुद्दे को विधानसभा और सोशल मीडिया पर बार-बार उठाया। प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने और अरुण यादव ने सरकार पर आदिवासियों के खिलाफ अत्याचार का आरोप लगाया। कमलेश्वर पटेल ने इसे "आदिवासियों की जीत" बताया, लेकिन साथ ही सरकार से जवाबदेही की मांग की।
मध्य प्रदेश में आदिवासियों की स्थिति
मध्य प्रदेश में आदिवासी समुदाय राज्य की आबादी का 21% हिस्सा है और वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत वन भूमि पर उनके अधिकार सुनिश्चित किए गए हैं। फिर भी, 3 लाख से अधिक दावे खारिज होने से उनके जंगल, जल, और जमीन पर अधिकार खतरे में हैं। कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने X पर लिखा, "मध्य प्रदेश में आदिवासियों के खिलाफ अत्याचार के 25% मामले हैं।"
वनमित्र पोर्टल और वन विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे हैं। नितिन वर्गीस ने बताया कि पंचायत सचिवों और वन अधिकार समितियों की लापरवाही के कारण कई पात्र आदिवासियों को पट्टे नहीं मिले।
भविष्य की दिशा: चुनौतियां और उम्मीदें
- मध्य प्रदेश सरकार का यह कदम आदिवासी समुदाय के लिए एक उम्मीद की किरण है, लेकिन कई चुनौतियां बाकी हैं:
- पारदर्शिता: पिछले अनुभवों को देखते हुए, सर्वे की प्रक्रिया को ग्राम सभाओं और एफआरए नियमों के अनुरूप होना चाहिए।
- समय-सीमा: बिना निश्चित समय-सीमा के यह घोषणा अधूरी है। एसआईटी को जल्द से जल्द सर्वे की तारीखें घोषित करनी चाहिए।
- जवाबदेही: खारिज दावों के कारणों को सार्वजनिक करना होगा, ताकि भविष्य में ऐसी गलतियां न हों।
- निगरानी: कांग्रेस और आदिवासी संगठनों ने इस प्रक्रिया की निगरानी की मांग की है।
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