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MP News: जनता की गाढ़ी कमाई पर टेंडर तिकड़म, EOW ने PWD के दो बड़े इंजीनियरों पर शुरू की भ्रष्टाचार की जांच

MP News: मध्य प्रदेश में सड़कें क्यों समय पर नहीं बनतीं? क्यों गड्ढों से भरी सड़कों पर चलकर जनता की गाड़ियाँ टूटती हैं, मगर ठेकेदारों की किस्मत चमकती रहती है? इस सवाल का जवाब इन दिनों लोक निर्माण विभाग (PWD) के दो वरिष्ठ इंजीनियरों के खिलाफ दर्ज हुई ईओडब्ल्यू (आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो) की जांच में छिपा है।

प्रभारी प्रमुख अभियंता केपीएस राणा और शालिग्राम बघेल पर गंभीर आरोप लगे हैं, जो सीधे-सीधे जनता के टैक्स के पैसों की बंदरबांट की तरफ इशारा करते हैं। ये वही पैसा है जिससे आपके कस्बे की सड़कें बननी थीं, पुलिया बननी थी और गांव-गांव को जोड़ने वाले रास्ते तैयार होने थे।

MP News Work given to blacklisted contractors EOW inquiry begins against two chief engineers of PWD

ब्लैकलिस्टेड ठेकेदार को मिला 38 करोड़ का तोहफा!

केपीएस राणा पर आरोप है कि उन्होंने वर्ष 2022 में NHAI में प्रभारी मुख्य अभियंता रहते हुए एक ऐसे ठेकेदार को 38.39 करोड़ रुपए का टेंडर दे दिया, जिसे उन्होंने खुद ही ब्लैक लिस्टेड किया था! ठेकेदार राजेंद्र सिंह किलेदार को बीना टोल प्लाजा के निर्माण में लापरवाही के चलते ब्लैक लिस्ट किया गया था।

लेकिन सिर्फ 13 दिन बाद वही ठेकेदार आष्टा बायपास के 7.50 किलोमीटर सड़क निर्माण का 39 करोड़ रुपए का टेंडर लेकर बैठ गया। सवाल यह नहीं कि टेंडर कैसे मिला, सवाल यह है कि जनता के विश्वास के साथ यह कैसा मज़ाक किया गया?

रिटायर्ड ईएनसी नरेंद्र कुमार ने इस पर आपत्ति जताते हुए पत्र लिखा था कि जब पंजीयन 13 दिसंबर 2022 को निलंबित हुआ, तो 17 दिसंबर को उसकी फाइनेंशियल बिड कैसे खोली गई?

यह सब उस समय हुआ जब प्रदेश में लोकसभा चुनाव की आचार संहिता लागू थी - यानी सब कुछ "चुपचाप" करने का सही वक्त! मगर अब ये मामला सार्वजनिक होते ही हड़कंप मच गया है।

EPC नियमों की खुली अवहेलना

बिना किसी झिझक के EPC (इंजीनियरिंग, प्रोक्योरमेंट और कंस्ट्रक्शन) कांट्रेक्ट के नियमों को नजरअंदाज किया गया। EPC के मुताबिक, अगर कोई ठेकेदार ब्लैक लिस्टेड है, तो उसका टेंडर न ही खोला जाएगा और न ही उसे कार्य आवंटित किया जाएगा। फिर भी नियमों को ताक पर रखकर दूसरे और तीसरे सबसे कम बोली लगाने वालों की अनदेखी कर काम ब्लैकलिस्टेड ठेकेदार को सौंप दिया गया। जनता यह सवाल पूछ रही है - अगर नियम तोड़कर टेंडर दिए जाएंगे, तो फिर कानून किसके लिए है?

MP News: बघेल ने "संयुक्त निविदाओं" से किया खेल

दूसरे आरोपी, पीआईयू के प्रभारी प्रमुख अभियंता शालिग्राम बघेल पर ग्वालियर ज़ोन-8 के तहत कई कामों की संयुक्त निविदाएं आमंत्रित करने और 2.38 करोड़ रुपए का भुगतान नियमों के विरुद्ध जारी करने का आरोप है।

  • इन सड़कों की सूची में शामिल हैं:
  • डोंगरी मेन रोड से शिकहरी मार्ग
  • भदौरिया पुरा नहर की पुलिया
  • धरमपुरा से लालपुरा मार्ग

त्रिवेणी वाटिका अंबा से पुटकी नहर मार्ग

कई अन्य ग्रामीण मार्ग, जिनके नाम उन गांवों में आज भी गड्ढों और अधूरे निर्माण के साथ चर्चा में हैं। इन मार्गों पर काम तो अधूरा है, लेकिन भुगतान पूरे मनोयोग से कर दिया गया, और वह भी एक्सलेशन (मूल्यवृद्धि) देय न होने के बावजूद।

MP News: क्या सिर्फ जांच होगी या कार्रवाई भी?

ईओडब्ल्यू ने दोनों मामलों में औपचारिक प्रकरण दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। सरकार के स्तर पर जल्द ही आरोप पत्र जारी किया जाना है। लेकिन आम जनता के मन में सवाल यह है कि क्या यह भी उन मामलों की तरह होगा, जो फाइलों में धूल खा जाते हैं? जब स्कूल की छत गिरती है, अस्पतालों में दरारें आती हैं या बारिश में सड़क बह जाती है - तब यही भ्रष्टाचार सामने आता है। सवाल सिर्फ अधिकारियों पर नहीं, पूरे सिस्टम पर है।

जनता क्या कह रही है?

भोपाल के एक ऑटो चालक संदीप ठाकुर कहते हैं, "हमारे बच्चों के लिए दूध महंगा हो गया है, सड़कें गड्ढों से भरी हैं और ये लोग करोड़ों के टेंडर खेल रहे हैं। क्या हम टैक्स इसलिए देते हैं?"

ग्वालियर की कॉलेज छात्रा रिया सिंह का कहना है, "गांव की सड़कें टूटी पड़ी हैं। हम रोज गिरते हैं, लेकिन करोड़ों की मंजूरी बिना काम के हो जाती है? ये कैसी व्यवस्था है?"

अब क्या होगा?

इस पूरे घटनाक्रम से स्पष्ट है कि निर्माण विभाग के भीतर कुछ ऐसा है जो आम लोगों की नज़रों से छिपा रहता है लेकिन करोड़ों की गूंज वहीं से निकलती है। यह केवल एक 'इंजीनियरिंग की गलती' नहीं, बल्कि एक नैतिक दिवालियापन है। जनता अब उम्मीद कर रही है कि ये जांच सिर्फ औपचारिकता न रह जाए, बल्कि उदाहरण बने, ताकि अगली बार कोई ब्लैकलिस्टेड ठेकेदार जनता की गाढ़ी कमाई से बनाई गई सड़क पर 'ब्लैक मनी' की सवारी न कर सके।

क्या आप चाहेंगे कि इस पर आधारित एक जनमत सर्वे तैयार किया जाए, जिसमें पूछा जाए कि जनता भ्रष्टाचार के मामलों में कितनी पारदर्शिता चाहती है?

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