त्वरित टिप्पणी: चुनाव में हारें या जीतें, वजूदहीन राकेश को चुन फिलहाल शिवराज ने जीती बाजी

त्वरित टिप्पणी: चुनाव में हारें या जीतें, वजूदहीन राकेश को चुन फिलहाल शिवराज ने जीती बाजी

भोपाल। भारतीय जनता पार्टी के मध्य प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान को हटाने के बाद जबलपुर से सांसद राकेश सिंह को नया अध्यक्ष बनाया गया और दो दिन से चल रहीं अटकलों पर विराम लग गया। हालांकि यह बदलाव भी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की सहमति से हुआ है। मुख्यमंत्री ने अपनी सहमति ऐसे व्यक्ति पर दी, जिसका खुद का कोई रजनीतिक वजूद नहीं है। छह महीने बाद विधसनसभा चुनाव हैं। इनमें जीतना शिवराज सिंह के लिए बड़ी चुनौती है। इससे पहले उन्होंने वजूदहीन अध्यक्ष चुनकर फिलहाल जीत हासिल कर ली है।

चुनाव में हारें या जीतें, वजूदहीन राकेश को चुन फिलहाल शिवराज ने जीती बाजी

प्रदेश में लंबे समय से प्रदेश अध्यक्ष बदले जाने की अटकलें चल रही थीं। संगठन मंत्री सुहास भगत के आने के बाद से ही प्रदेश अध्यक्ष को बदलने के प्रयास शुरू हो गए थे। पार्टी में नंदकुमार सिंह चौहान की कमजोर पकड़ और और कार्यकर्ताओं के असंतोष के कारण संगठन मंत्री भगत प्रदेश अध्यक्ष को बदलना चाह रहे थे। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने पसंदीदा अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान चौहान को छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे। उन्होंने इसके लिए पुरजोर प्रयास भी किए। नागपुर से लेकर दिल्ली तक संगठन के लोगों को मनाया।

सूत्रों के मुताबिक चौहान को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाने के संबंध में कुछ मौकों पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस्तीफे की तक धमकी दी। संगठन 2019 लोकसभा चुनाव के चलते मुख्यमंत्री चौहान को नाराज नहीं करना चाहता था। यही कारण है कि संगठन बगैर शिवराज सिंह की सहमति के प्रदेश अध्यक्ष नहीं बदलना चाहता था। प्रयास लगातार चलते रहे। अंततः प्रदेश अध्यक्ष को बदलने में संगठन की चली लेकिन प्रदेश अध्यक्ष को चुनने में मुख्यमंत्री की चली।

सीएम अध्यक्ष बदलने के लिए तैयार तो हुए लेकिन अपनी पसंद और कमजोर प्रदेश अध्यक्ष चुनने की नीति को सबसे ऊपर रखा। प्रदेश अध्यक्ष बनाने के लिए पूर्व अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री नरोत्तम मिश्रा, भूपेंद्र सिंह एवं सांसद प्रहलाद पटेल और पूर्व मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के भी नाम चले। यह सभी वे नाम है जो पार्टी में और कार्यकर्ताओं पर मजबूत पकड़ रखते हैं। इन्हें जमीनी भी भी कहा जा सकता है। शिवराज सिंह ने इनमें से किसी पर भी सहमति नहीं दी। यही कारण था कि अध्यक्ष की घोषणा करने में दो दिन लग गए।

नरेंद्र सिंह तोमर दिल्ली से आने को तैयार नहीं हुए और कैलाश को आने नहीं दिया गया। भाजपा सूत्रों के मुताबिक चुनावों की चुनौती देखते हुए संगठन पूर्व अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को प्रदेश अध्यक्ष बनाना चाहता था,लेकिन वह प्रदेश में आने के लिए तैयार नहीं हुए। इसके बाद अन्य विकल्पों पर विचार किया गया। कैलाश विजयवर्गीय भी एक महत्वपूर्ण पसंद थे लेकिन उन्हें शिवराज सिंह नहीं चाहते।

भूपेंद्र सिंह, नरोत्तम मिस्रा, प्रह्लाद पटेल ऐसे नाम हैं जो अपना विजन और वजूद रखते हैं। लेकिन अनजाने भय के कारण मुख्यमंत्री ने इन नामों पर सहमति नहीं दी। इसके बाद संगठन के पास ज्यादा विकल्प नहीं थे। शिवराज की पसंद के सांसद राकेश सिंह को प्रदेश अध्यक्ष की बागडोर सौंप दी गई। राकेश सिंह 2004 से जबलपुर लोकसभा सीट से लगातार सांसद हैं। रेलवे ठेकेदार भी हैं। लेकिन उनकी जबलपुर से इतर ना तो कोई बड़ी पहचान है और ना ही कोई बड़ा जनाधार। ऐसे में वो मध्यप्रदेश में भाजपा संगठन की अगुवाई तो करेंगे लेकिन शिवराज सिंह चौहान की मर्जी के साथ।

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