White Tiger मोहन के लिए राजा मार्तंड सिंह ने बनवाया था 'बाघ महल', दुनियाभर में फैले तीनों रानियों के वंशज
First White Tiger of the World Mohan: आज पूरी दुनिया में अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस मनाया जा रहा है। हर साल 29 जुलाई को यह दिन खासतौर पर बाघों की लगातार कम होती आबादी पर नियंत्रण करने के लिए मनाया जाता है।
भारत के लिए यह दिन और भी खास है, क्योंकि बाघ न सिर्फ भारत का राष्ट्रीय पशु है, बल्कि दुनिया के 70% से अधिक बाघ भारत में ही पाए जाते हैं। विश्व टाइगर दिवस के अवसर पर पढ़िए रीवा में जन्मे सफेद बाघ के वंशज पूरी दुनिया मे चर्चित क्यों है।

जीवित अवस्था में पकड़ा गया था व्हाइट टाइगर
दुनिया के सबसे पहले सफेद बाघ मोहन को 1951 में सीधी जिले के बरगढ़ी के पंखोरा के जंगल में पकड़ा गया था। उसकी मौत 18 दिसंबर 1969 को हुई थी। दुनिया भर में आज जितने भी सफेद बाघ हैं वह इसी बाघ मोहन के बच्चे हैं। मोहन को इस दुनिया से गए करीब 55 साल गुजर गए हैं।
दुनिया भर में सफेद बाघ मोहन के वंशज
मोहन ऐसा पहला व्हाइट टाइगरथा जिसे जीवित रूप में पकड़ा गया था। रीवा के महाराजा मार्तण्ड सिंह ने मोहन को गोविंदगढ़ के किले में रखने के लिए 'बाघ महल' बनावाया। यहां बाघ की ब्रीडिंग शुरू की गई और 34 व्हाइट टाइगर जन्मे. इन्हें एक-एक करके इंग्लैड, अमेरिका और यूरोप देशों में भेजा गया। सफेद बाघ होने की आश्चर्यजनक जानकारी सुनकर राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू रीवा आए थे। महाराज मार्तंड सिंह ने इन्हे बाघ उपहार में दिए थे। बाघ की खरीदी बिक्री भी यहां शुरू हुई थी। ब्रिटेन की महारानी को बाघ की ट्रॉफी भेंट की गई थी। इस तरह से मोहन की संताने दुनियाभर में फैल गईं हैं।
संडे को क्यों रखता था व्रत मोहन
करीब 15 किलो बकरे का गोश्त, दूध, अंडे का आहार खाता था मोहन। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि मोहन रविवार को कुछ नहीं खाता था सिर्फ दूध पिया करता था। 16 वर्षीय सफेद बाघ मोहन की राधा, सुकेशी और बेगम नाम की तीन रानियां थी। बेगम ने 14, राधा 7 और सुकेशी ने 13 सफेद बाघों को जन्म दिया था।
डाक टिकट वाला मोहन
मोहन पहला बाघ है, जिसके सम्मान में राजकीय शोक मनाया गया था। उसकी मौत में बंदूक की सलामी दी गई थी। मोहन की कब्रगाह भी बनाई गई है। मोहन के नाम पर डाक टिकट भी जारी हो चुका है।
वर्तमान में रियासत के महाराजा पुष्पराज सिंह ने क्या कहा
रीवा रियासत के महाराज ने वन इंडिया हिंदी को बताया कि मेरे पिता महाराजा मार्तंड सिंह ने मोहन को पकड़ा था और फिर ब्रीडिंग कराई। आज दुनिया में जितने बाघ है मोहन की संताने हैं। एक समय ऐसा भी आया, जब यहां एक भी टाइगर नहीं बचा था, लेकिन 44 साल बाद फिर वापसी हुई है। सतना जिले में महाराज मार्तण्ड सिंह के नाम पर सफारी बनाई गई है। मोहन के नाम पर बाड़ा भी बनाया गया है, जहां व्हाइट टाइगर रखे गए हैं।












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