MP: बीना के पाली गांव में मुक्ति कठिन, चिता को चादर और छातों का सहारा, जानिए क्या है मामला
सागर, 24 जुलाई। यहां मानसून में मौत के बाद भी शरीर को आसानी से मुक्ति नहीं मिल पाती है! व्यक्ति तो चला जाता है, लेकिन परिजन बारिश में अंतिम संस्कार के लिए जद्दोजहद करते नजर आते हैं! हम बात कर रहे हैं बुंदेलखंड में सागर जिले की बीना तहसील के पाली गांव की, जहां श्मशान न होने से खुले आसमान के नीचे अंतिम संस्कार की मजबूरी है। बारिश में कई घंटो चिता के ऊपर लोहे की चादर लगाकर बारिश से बचाना होता है।

मप्र के गांव-गांव में विकास की गंगा बह रही है, लेकिन यहां आकर सरकार के दावे खोखले साबित होने लगते हैं... मप्र के सागर जिले की बीना तहसील से सटे पाली गांव में श्मशान घाट तो है, लेकिन यहां टीनशेड तक नसीब नहीं है। बीते रोज गांव के 70 वर्षीय मुन्नालाल अहिरवार का निधन हो गया। परिजन और गांव वाले जब खुले आसमान के नीचे श्मशान में अंतिम संस्कार कर रहे थे, बारिश होने लगी। चिता की आग पर पानी न पड जाए, चिता की आग बुझ न जाए इसलिए परिजन ने लोहे की चादर ली, छातों का सहारा लिया और चिता को बारिश से बचाने की जद्दोजहद करने लगे। यहां करीब 16 घंटे तक चिता की आग को बुझने और बारिश में अस्थियां बहने से बचाने के लिए परिजन संघर्ष करते रहे।

राजनीति के कारण नहीं बन पाया श्मशान का टीनशेड
जानकारी के मुताबिक बीना के ग्राम पाली में श्मशान घाट खुले आसमान के नीचे है जहां शवों का अंतिम संस्कार किया जाता है। टीन शेड न होने से बरसात के दिनों में दाह संस्कार करना बड़ा मुश्किल होता है। श्मशान घाट में टीन शेड की मांग हमेशा से की जाती रही है, लेकिन आज तक इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया। जिससे ग्रामीणों को मजबूरी बस खुले आसमान के नीचे ही अंतिम संस्कार करना पड़ता है। गांव के पूर्व सरपंच बताते हैं कि टीनशेड का काम शुरू हुआ था, लेकिन बीना के भाजपा-कांग्रेस के नेताओं के दखल के कारण काम पूरा ही नहीं हो सका। आसपास की कॉलोनियों के लोग भी विरोध करने लगे।












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