MP में चमत्कार, नदी में तैरते हुए पुजारी तक पहुंची नृसिंह मूर्ति, कैसा रहेगा साल, हुई भविष्यवाणी

देवास जिले के हाटपिपल्या में प्रतिवर्ष अनुसार इस वर्ष भी भगवान नृसिंह की साढ़े सात किलो वजनी पाषाण प्रतिमा को भमोरी नदी स्थित नरसिंह घाट पर मंदिर के पुजारी रमेश दास वैष्णव ने 3 बार तैराया, प्रतिमा तीनों बार करीब 15 से 20 फिट तक तेरी, ऐसी मान्यता है की प्रतिमा तीनों बार तेर जाए तो आने वाला वर्ष सुखद रहेगा।

हाटपिपल्या के प्रसिद्ध नृसिह मंदिर से डोल में भगवान नृसिंह की प्रतिमा को ढोल धमाकों व अखाड़े और पुलिस बैंड के साथ नृसिह घाट तक शोभायात्रा निकाली गई। शोभायात्रा का विभिन्न मंचों द्वारा स्वागत किया गया। घाट पर पहुंचने पर पूजन-अर्चन कर प्रतिमा को तैराया गया। प्रतिमा तेराते समय भगवान नृसिंह के जयकारों को वातावरण गुंजुमान हो गया। इस दौरान हजारों की संख्या में श्रद्धालुजन मौजूद रहे।

Dewas

धार्मिक मान्यताओं में ऐसा कहा जाता है कि, भगवान अपने भक्त की एक पुकार पर उस तक पहुंच जाते हैं। इतना ही नहीं भगवान से जुड़े कई चमत्कार हमने पहले भी देखें और सुने हैं, लेकिन मध्यप्रदेश के देवास जिले में डोल ग्यारस यानी जलझूलनी एकादशी पर धर्म और आस्था की ऐसी तस्वीर देखने मिलती है, जिसे देखने दूर-दूर से लोग देवास जिले के हाटपिपलिया आते हैं। यहां भगवान नृसिंह की साढ़े 7 किलो वजनी मूर्ति है,जो पुजारी के पानी में छोड़ने के बाद तैरती हुई फिर पुजारी तक पहुंच जाती है।

हर साल होता है चमत्कार

हाटपिपलिया के भमोरी में यह चमत्कार हर साल डोल ग्यारस के पर्व पर देखने मिलता है, जहां भगवान नृसिंह की प्रतिमा को तीन बार नदी में तैर आया जाता है। ऐसा दावा है कि, प्रतिमा पानी में तैरती है, और नदी के बहाव की उलटी दिशा में तैरते हुए पुजारी तक पहुंच जाती है। प्रतिमा के तैरने के पीछे कई धार्मिक मान्यताएं भी हैं। ऐसा कहा जाता है कि, प्रतिमा के तैरने पर साल की खुशहाली का अंदाजा लगाया जाता है। वहीं इस चमत्कार को देखने दूर-दूर से भक्त हाटपिपलिया पहुंचते हैं।

बेहद पुराना है प्रतिमा का इतिहास

जानकारी के मुताबिक ग्रामीणों की मानें तो भगवान नृसिंह की इस प्रतिमा का इतिहास काफी पुराना है, जहां कुछ लोग इसे लगभग 100 साल पुराना इतिहास भी बताते हैं। ऐसा बताते हैं कि, भादो मास के शुक्ल पक्ष की जलझूलनी एकादशी यानी डोल ग्यारस पर भगवान नृसिंह की प्रतिमा नदी में तैरने की परंपरा वर्षों से कायम हैं, जहां इस परंपरा का निर्वहन ग्रामीणों और रियासत के पुजारी की ओर से किया जाता है।

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