मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव: चुप रहकर भी ‘बोल’ रहे हैं दिग्विजय
भोपाल। दिग्विजय सिंह की मध्यप्रदेश के चुनाव में क्या भूमिका है इसे लेकर दो टूक राय नहीं है। एक तबका है जो कह रहा है कि दिग्विजय सिंह किनारे कर दिए गये हैं, वहीं दूसरा तबका है जो बता रहा है कि दिग्विजय ही पार्टी के भीतर सारी नीति रणनीति तय कर रहे हैं। जिस तरीके से बीजेपी ने दिग्विजय सिंह को नक्सल केस में उलझाने की कोशिश की है, उससे पता चलता है कि मध्यप्रदेश में दिग्विजय कितने बड़े फैक्टर हैं। अन्दरूनी सच्चाई यही है कि पूरा का पूरा चुनाव दिग्विजय सिंह के ही हिसाब से और उनके ही भरोसे लड़ा जा रहा है। दिग्विजय सिंह यानी जिसने दुनिया फतह कर ली हो। सिंह यानी किंग। दिग्विजय और सिंह के नाम और उपनाम को जी रहे इंसान का ही नाम है दिग्विजय सिंह।

मध्य प्रदेश में दिग्विजय कर रहे हैं अपना 'काम'
मध्यप्रदेश में इस नाम और उपनाम को दिग्विजय सिंह ने सार्थक कर दिखलाया था। 10 साल तक कांग्रेस का मुख्यमंत्री रह जाना दुनिया फतह करने के समान था। खासकर उस कांग्रेस में, जिसके बारे में कहा जाता था कि मुख्यमंत्री ऐसे बदले जाते हैं जैसे इंसान अंगवस्त्र बदलता है। जब ‘दिग्विजय' और ‘सिंह' ने अर्थ खो दिए। इन्हीं दिग्विजय सिंह के नाम और उपनाम ने जब अर्थ खो दिए, ये नाम बदनाम होने लगे तो कांग्रेस का ग्राफ भी मध्यप्रदेश में गिरता चला गया। इतना गिरा, इतना गिरा कि 15 साल का शिवराज आ गया। व्यापम और भ्रष्टाचार के खुले तांडव के बाद भी यह शिवराज चलता रहा। दरअसल यह मध्यप्रदेश कांग्रेस में गैर दिग्विजय काल का असर था।

10 साल तक चुनाव नहीं लड़ने का संकल्प हुआ पूरा
अब दिग्विजय लौट आए हैं। दस साल तक चुनाव नहीं लड़ने का उनका संकल्प भी पूरा हो चुका है। मध्यप्रदेश में नर्मदा परिक्रमा यात्रा करके उन्होंने मध्यप्रदेश की राजनीति में दोबारा सक्रियता दिखलायी। दिग्विजय मध्यप्रदेश के ऐसे नेता हैं जो हर जिले के हर छोटे-बड़े शहर के कार्यकर्ताओं को नाम के साथ जानते हैं। यही वजह है कि वे ‘संगत में पंगत' के जरिए कार्यकर्ताओं को पार्टी से जोड़ने में कामयाब रहे। कांग्रेस पर दिग्विजय की ही है पकड़मायावती के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ने में अड़ंगा लगाने वाले भी दिग्विजय सिंह ही थे। ऐसा करके दिग्विजय ने राष्ट्रीय राजनीति का फायदा उठाकर मायावती के हाथों कांग्रेस का दोहन होने से बचा लिया। मध्यप्रदेश की सियासत में कांग्रेस पर उनकी पकड़ का यह सबसे बड़ा सबूत है।मध्यप्रदेश में चुनाव प्रचार समिति के प्रमुख ज्योतिरादित्य सिंधिया हैं, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ हैं और समन्वय समिति के प्रमुख खुद दिग्विजय सिंह हैं।

पिछले कुछ सालों में दिग्विजय सिंह की छवि संघ विरोधी और मुस्लिम परस्त नेता की बन गई
बीते चुनाव में भी ज्योतिरादित्य सिंधिया की भूमिका यही थी। बदलाव अगर हुआ है तो कमलनाथ और दिग्विजय सिंह की स्थिति में हुआ है। दोनों ने एक-दूसरे की मदद की है। कांग्रेस के लिए बने ‘खलनायक'दिग्विजय जानते हैं कि वे सीएम नहीं बन सकते। इसका कारण ये है कि मध्यप्रदेश से दूर केन्द्र की सियासत में भी उन्होंने अपने लिए ‘खलनायक' वाली भूमिका स्वीकार कर ली। राजनीति का वह खलनायक जो सार्वजनिक निन्दा अपने नाम कर पार्टी के हितों की रक्षा करता है, जो जोख़िम उठाकर विरोधियों पर हमले करता है। इस कोशिश में दिग्विजय सिंह की छवि बीते 15 साल में संघ विरोधी और मुस्लिम परस्त नेता की बन गयी। यह वही छवि थी जिससे एंटनी समिति की रिपोर्ट कांग्रेस को निकालना चाहती है। एक तरह से दिग्वजिय-कांग्रेस की छवि एक-दूसरे में समा गयी थी।

दिग्विजय सिंह से कांग्रेस की दूरी सम्भव ही नहीं
समझिए दिग्विजय कांग्रेस के लिए कितने उपयोगी और अहम रहे। दिग्विजय से दूरी कांग्रेस की मजबूरी? अब कांग्रेस सॉफ्ट हिन्दुत्व के रूप में दिखने की कोशिश में जुटी है तो उसे दिग्विजय जैसे नेताओं से दूरी भी बनानी पड़ेगी। मगर, दिग्विजय सिंह से कांग्रेस की दूरी सम्भव ही नहीं है। इसलिए दिग्विजय ने नये सिरे से खुद को बदलना शुरू कर दिया। वे कहने लगे कि असली हिन्दू वही हैं। आरएसएस वाले तो नकली हिन्दू हैं। दिग्विजय की सोच और जनेऊधारी राहुल की सोच फिर एक होती दिख रही है। फिर भी, कांग्रेस मध्यप्रदेश में 15 साल बाद अब कोई लॉफ्टेड शॉट खेलना नहीं चाहती जिसमें कैच होने का ख़तरा रहे। इसलिए दिग्विजय सिंह के नाम को आगे नहीं किया जा रहा है। मगर, समन्वय समिति का प्रमुख बनाना कोई छोटी भूमिका नहीं है। इस भूमिका में वह कमलनाथ के लिए कमल का नाश करने में जुटे हैं। चुप रहकर भी ‘बोल' रहे हैं दिग्विजय। दिग्विजय की खासियत यही है कि राजनीतिक स्थिति को परखने या प्रकट करने में वे देरी नहीं करते। वे कह चुके हैं कि उनके बयान देने से कांग्रेस की स्थिति ख़राब हो जाती है, इसलिए वे चुप रहेंगे।

राजनीति में छायावाद के प्रयोगधर्मी दिग्विजय सिंह से घबराती है बीजेपी
मगर, क्या यह खुद में एक बयान नहीं है? इस बयान के जरिए क्या दिग्विजय सिंह ने अपनी पैठ वाले वर्ग को संदेश नहीं दे दिया है? राजनीति में छायावाद के प्रयोगधर्मी दिग्विजय सिंह से बीजेपी इसलिए घबराती है। नक्सलवादियों के साथ कथित संबंध के लिए दिग्विजय सिंह की घेराबंदी में बीजेपी जुटी हुई है। मगर, दिग्विजय भी खुलकर बीजेपी को चुनौती दे रहे हैं। दोनों एक-दूसरे को ललकारते हैं और ललकारने का मतलब भी जानते हैं। यही वजह है कि राजनीति का यह धुरंधर खिलाड़ी मध्यप्रदेश में बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिए सबसे अहम बना हुआ है।कांग्रेस बस दिग्विजय सिंह के चेहरे को सामने नहीं कर रही, मगर दिग्विजय सिंह को पूरी आज़ादी है कि वह सॉफ्ट हिन्दुत्व के रूप में चाहे जितना हो सके, कांग्रेस से जुड़ सके। अंदरखाने नीति-रणनीति सबमें दिग्विजय की ही चल रही है। मगर, इसकी पुष्टि कैसे होगी? इसकी पुष्टि के लिए आपको करना होगा चुनाव नतीजों का इंतज़ार। अगर कांग्रेस जीतती है तो चुनाव चिन्ह के रूप में कमल राज जरूर ख़त्म होगा मगर सीएम के रूप में ‘कमल'राज ही शुरू होगा क्योंकि दिग्विजय यही चाहते हैं।
(ये लेखक के निजी विचार हैं)












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