संगठन की कमजोरी से 2017 चुनाव का प्रदर्शन नहीं दोहरा पाई BJP ? जानिए इसकी 5 बड़ी वजहें

लखनऊ, 13 मार्च: उत्तर प्रदेश में चुनाव सम्पन्न होने के बाद अब बीजेपी में आत्ममंथन का दौर शुरू हो गया है। पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 312 सीटों पर जीत मिली थी लेकिन इस बार संगठन की कमजोरी और लचर रणनीति की वजह से सीटों की संख्या घटकर 255 तक पहुंच गई है। यही वजह है कि सपा के मुखिया अखिलेश यादव भी अब इस बात का दावा कर रहे हैं कि बीजेपी को हराना कठिन नहीं है। बीजेपी में कई जगहों पर टिकटों का बंटवारा सही तरीके से नहीं हुआ जबकि जिन जिलों में बीजेपी का सफाया हुआ है वहां बीजेपी के संगठन के भीतर ही काफी कमजोरी नजर आयी जिसका लाभ विपक्ष को मिल गया। राजनीतिक पंडितों की माने तो कमजोर रणनीति और कुप्रबंधन ही इसकी वजह है, नहीं तो ऐसा कौन सा कारण है कि काशी में मोदी की लहर में बीजेपी क्लीन स्वीप कर जाती है और बगले के जिले गाजीपुर में बीजेपी का खाता तक हीं खुलता है।

सरकार की प्रो इनकंबेंसी का लाभ लेने में असफल रहा संगठन

सरकार की प्रो इनकंबेंसी का लाभ लेने में असफल रहा संगठन

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार ने पूरे पांच साल तक जनता के हित में काफी काम किए। योगी और मोदी सरकार की नीतियों की बदौलत ही यूपी में बीजेपी दोबारा सरकार बना पायी है लेकिन वो कौन से कारण हैं कि बीजेपी इस बार पिछले आंकड़े को छूने में नाकाम रह गयी। राजनीतिक पंडितों की माने तो योगी को लेकर जनता के बीच प्रो इनकंबेंसी थी जबकि बहुत सारे मंत्री और विधायक ऐसे थे जिनके प्रति उनके क्षेत्र में एंटी इनकंबेंसी थी। अगर इन जगहों पर नाराजगी को भांपते हुए टिकट या सीटों की अदला बदली की गई होती तो शायद बीजेपी पुराने आंकड़े को पार कर सकती थी।

काशी में मोदी की लहर लहुरी काशी में बीजेपी का सफाया

काशी में मोदी की लहर लहुरी काशी में बीजेपी का सफाया

यूपी में बीजेपी दोबारा सरकार बनाने के बाद अपनी पीठ थपथपा रही है लेकिन उसे आत्ममंथन करने की जरूरत है। राजनीतिक पंडित मानते हैं कि क्या वजह है कि वाराणसी और गोरखपुर में बीजेपी मोदी और योगी ब्रांड के दम पर क्लीन स्वीप कर जाती है लेकिन वहां से करीब 80 किलोमीटर दूर इन जिलों में बीजेपी का खाता भी नहीं खुलता है। क्या इन जगहों पर योगी और मोदी की हवा नहीं चली। ऐसा नहीं है मोदी ओर योगी की हवा हर सीट पर रही लेकिन जिन जिलों में संगठन की कमजोरी सामने आई उन जगहों पर बीजेपी का सफाया हो गया। मिशन 2024 से पहले बीजेपी को इन जिलों में काफी काम करने की जरूरत होगी।

पश्चिम से लेकर पूरब तक बीजेपी को हुआ नुकसान

पश्चिम से लेकर पूरब तक बीजेपी को हुआ नुकसान

विधानसभा चुनाव के नतीजे आ गए हैं। बीजेपी की लगातार दूसरी बार सरकार बनने जा रही है। सफलता के रथ पर सवार बीजेपी शायद अब इन बातों पर आत्ममंथन करे कि पश्चिम से लेकर पूरब तक 57 सीटों का नुकसान कैसे हो गया। पश्चिम में किसान आंदोलन और किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत ओर अखिलेश-जयंत के गठबंधन ने बीजेपी को नुकसान पहुंचाया। पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी को पश्चिम क्षेत्र की 71 सीटों में से 52 सीटों पर जीत मिली थी लेकिन इस बार वहां 40 सीटें मिली हैं यानि संगठन को 12 सीटों का नुकसान हुआ है। वहीं काशी क्षेत्र की बात करें तो पिछली बार बीजेपी ने 71 सीटों 55 सीटों पर बीजेपी जीती थी। लेकिन इस बार इस क्षेत्र में इस बार 42 सीटें मिली हैं यानी 13 सीटों का नुकसान पार्टी को झेलना पड़ा है।

क्या पन्ना प्रमुखों की रणनीति में रहा झोल

क्या पन्ना प्रमुखों की रणनीति में रहा झोल

बीजेपी के पास इस बार पन्ना प्रमुखों की बड़ी फौज थी लेकिन इसमें हर जगह झोल दिखायी दिया। बूथ स्तर पर बेहतर मैनेजमेंट की कमी और सिर्फ कागजों पर ही पन्ना प्रमुख बनाकर सुर्खियां बटोरने की चाहत ने संगठन को कमजोर कर ने का काम किया है। हर बूथ पर पन्ना प्रमुखों की जिम्मेदारी तय की गई थी लेकिन संगठन के कुप्रबंधन ने योगी सरकार का सारा जायका बिगाड़ दिया। यही वजह था कि इस बार कई जिलों में बूथ स्तर पर संगठन काफी कमजोर दिखा। सिर्फ कागजों में ही पन्ना प्रमुख बड़े बड़े दावे करते रहे लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही थी।

संगठन की कमजोरी या गुटबाजी का शिकार हुई बीजेपी

संगठन की कमजोरी या गुटबाजी का शिकार हुई बीजेपी

पिछले चुनाव की बजाए इस बार बीजेपी को जिन जिन जिलों में सीटों का नुकसान हुआ है वहां बीजेपी के लिए आने वाले समय में और चुनौतियां पैदा होंगी। गाजीपुर,आजमगढ़, मऊ, जौनपुर बलिया समेत कई जिलों में बीजेपी की स्थिति काफी दयनीय रही। अब इस नुकसान की भरपायी कैसे होगी और इसकी जवाबदेही किसकी होगी। योगी सरकार की प्रो इनकंबेंसी का लाभ उठाने में संगठन नाकाम रहा। सरकार भले ही बन गई हो लेकिन जिस तरह से जिलों में संगठन के भीतर गुटबाजी सामने आयी है वह बीजेपी के लिए अच्छे संकेत नहीं है। बीजेपी के एक प्रदेश महासचिव कहते हैं कि वाकई संगठन को आत्ममंथन की जरूरत होगी। कई जिले गुटबाजी का शिकार हो गए। इसको दूर करने की जरूरत है। अगले आम चुनाव से पहले इस दिशा में काम किया जाएगा। पार्टी ने क्षेत्रवार मंथन करना शुरू कर दिया है कि कहां कमियां रह गईं।

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