up news : कौशांबी के 20 वर्षीय युवक ने रची खुद के अपहरण की साज़िश, ऑनलाइन गेम में हार गया था पैसे

ये दौर टेक्नालॉजी का है, युवा पीढ़ी के लिए मोबाइल ऑक्सीजन जितना जरूरी हो गया है। वहीं बच्चे भी तेजी से मोबाइल का उपयोग करना सीख चुके हैं। मोबाइल पर कॉल अटेंड करना, व्हाट्सऐप और मैंसेजर पर लोगों से चैंटिंग करने के अलावा एक रोग तेजी से पैर जमा चुका है और वो है ऑनलाइन गेम्स। बच्चे लगातार ऑनलाइन गेम्स में फंसते जा रहे हैं। बच्चों को आभासी दुनिया ही रियल नजर आने लगी है। कई गेम्स में नेक्सट लेवल को पार करने के लिए तो बच्चों ने अपनी बलि तक चढ़ा दी। ऐसा ही एक मामला सामने आया है उत्तर प्रदेश के कौशांबी ज़िले से, जिसमे एक 20 वर्षीय युवक ने ऑनलाइन गेम में पैसे हारने के बाद खुद के ही अपहरण का ड्रामा रच डाला।

खुद की ही किडनेपिंग का षड्यंत्र

खुद की ही किडनेपिंग का षड्यंत्र

दरअसल, जनपद कौशांबी के चरवा निवासी जयचंद्र प्रजापति का 20 वर्षीय बेटा अतुल करीब 6 माह से अपनी नानी के घर रह रहा था। इसी दौरान उसने घर से किसी जरूरी काम के लिए पैसे लिए थे। यह पैसे वो किसी ऑनलाइन गेम के चक्कर में फस के गवां बैठा। पैसा वापस मिलने की कोई संभावना नहीं थी और घर पर जवाब देने के डर से, बचने के लिए उसने खुद की ही किडनेपिंग का षड्यंत्र रच डाला।
फिर 23 नवंबर को अतुल अपनी ननिहाल से कहीं बिना बताए चला गया। उसके बाद अतुल के पिता के पास एक अनजान नंबर से फोन आया कि बेटा खुर्जा जंक्शन पर बेहोश मिला है। फोन करने वाले व्यक्ति ने बेटे से बात भी कराई। इसके बाद जब दोबारा जयचंद्र ने उसी नंबर पर फोन किया तो उसने बताया कि वह बिहार में है।

ऑनलाइन गेम में हार गया था पैसे

ऑनलाइन गेम में हार गया था पैसे

अतुल के पिता इस फ़ोन से बेहद ही घबरा गए और भागे-भागे पुलिस के पास शिकायत लेकर पहुंचे। शिकायत पर सक्रिय हुई साइबर सेल की टीम ने युवक को 24 घंटे में ही प्रयागराज जंक्शन से बरामद कर लिया। एएसपी समर बहादुर ने बताया कि अतुल घर से किसी जरूरी काम के लिए मिले पैसे ऑनलाइन गेम में हार गया था। इसी वजह से वह खुद ही घर से चला गया था। अतुल को सकुशल बरामद कर लिया गया है। चरवा निवासी जयचंद्र प्रजापति ने एसपी बृजेश कुमार श्रीवास्तव को दिए प्रार्थना पत्र में बताया था कि उनका बेटा अतुल अपने ननिहाल ककराबाद में छह महीने से रहता है। वह भरवारी स्थित एक कंप्यूटर कोचिंग संस्थान में पढ़ाई भी करता है।

अपनी जान देने को भी तैयार हो जाते हैं बच्चे

अपनी जान देने को भी तैयार हो जाते हैं बच्चे

मोबाइल, कम्प्यूटर से शिक्षा का आइडिया कोरोना संकट के दौरान आया, ये बात सौ फीसदी सच है कि मोबाइल एक बेहतरीन उपकरण है जो अनों को जोड़े रखता है। ये मनोरंजन के साथ नॉलेज और क्रिएटविटी का भी जरिया बना है। मोबाइल ने अधिकतर कामों का आसान बना दिया है। लेकिन हर वस्तु के अच्छे और बुरे दोनों तरह के इफेक्ट होते हैं। मोबाइल पर गेमिंग की लत ने इस अच्छे खासे इंस्ट्रूमेंट को बदनाम भी किया है।
मौजूदा दौर में स्मार्टफोन में कई गेम एप्स इंस्टाल रहते हैं ये गेमिंग की लत का बड़ा जरिया बनते हैं। कॉम्पीटिशन के इस दौर में बच्चे हर बाधा पार करना चाहते हैं, नए लेवल को पार करना चाहते हैं, बड़ा स्कोर करना चाहते हैं, माता-पिता भी बच्चों को दिन-रात यही उपदेश देते हैं। बच्चा जो काम पढ़ाई में करना चाहता है, वहीं टारगेट वो गेम में भी लेकर चलता है। वब मैदानी खेल और ऑनलाइन खेल में अंतर ना कर पााने की वजह उसे लगातार आगे की ओर ढकेलती है, ऐसे में वो समय भी आता है जब वो अपनी जान देने को भी तैयार हो जाता है।

बच्चा बन सकता है अपराधी

बच्चा बन सकता है अपराधी

कुछ ऑनलाइन गेम्स फ्री होते हैं, कुछ में पैसा देना होता है। बच्चे अगला स्टेप पार करने के लिए अभिभावकों की जमा पूंजी से चोरी करते हैं। कई गेम्स जीतने पर रिवॉर्ड भी मिलता है, इससे लालच बढ़ता जाता है। वहीं हार जाने पर डूबा पैसा वापस लाने की जिद सवार हो जाती है। बच्चे लगातार झूठ बोलने और लोन लेने जैसी आदतें के शिकार हो जाते हैं।
बच्चों-युवाओं में गेम की आदत छुड़ाने के लिए उन्हें आउटिंग करना बेहद जरूरी है। बच्चों के साथ दोस्ताना व्यवहार रखकर भी उन्हें मोल्ड किया जा सकता है। बच्चों के साथ बच्चे बनकर भी उनका दिल जाता जा सकता है। इसके लिए उनके साथ उनका मनचहा गेम खेलें। बच्चों के सामने मोबाइल से परहेज करें। मोबाइल पर गेम ब्लॉक करने से समस्या दूर नहीं होगी, बेहतर है कि बच्चों को उदाहरण देकर समझाएं।

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