Bird Lover Forest Officer के 'भागीरथ यत्न' से लुप्तप्राय पक्षियों का संरक्षण, Jamtara में पोस्टिंग

Bird Lover Forest Officer के 'भागीरथ यत्न' से लुप्तप्राय पक्षियों का संरक्षण हो रहा है। अधिकारी झारखंड के Jamtara में पोस्टेड हैं। Jamtara DFO Ajinkya Bankar Bird Lover Forest Officer jharkhand

Bird Lover Forest Officer के 'भागीरथ यत्न' से लुप्तप्राय पक्षियों का संरक्षण हो रहा है। झारखंड के Jamtara में पोस्टेड प्रभागीय वन अधिकारी अजिंक्य ने अपने प्रयासों से खास पहचान बनाई है। सर्दियों के दौरान हिमालय क्षेत्र और मध्य एशिया से बड़ी संख्या में पक्षी झारखंड की ओर पलायन करते हैं। प्रवासी पक्षियों का समूह जामताड़ा सहित अलग-अलग शहरों में जाता है। ऐसे में लुप्त हो रही पक्षियों की प्रजातियों में दुर्लभ पक्षियों की पहचान करना और इनका संरक्षण करने का बीड़ा उठाने वाले प्रभागीय वन अधिकारी (DFO) अजिंक्य बंकर अब तक 146 पक्षियों की पहचान कर चुके हैं। जीवों की सुरक्षा के लिए उनके पारंपरिक आदिवासी नामों के साथ उनका नाम रखा जा रहा है। पढ़िए कमाल की लव स्टोरी जिसमें एक DFO पक्षियों को बचाने का अथक प्रयास कर रहा है। (सभी तस्वीरें साभार- फेसबुक @ajinkyabankar05)

लुप्तप्राय पक्षियों का मसीहा बना वन अधिकारी

लुप्तप्राय पक्षियों का मसीहा बना वन अधिकारी

जामताड़ा के डीएफओ अजिंक्य बंकर के प्रयासों पर दी न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने पक्षियों की पहचान करने की दिशा में नया कदम उठाया है। कई पक्षी लुप्तप्राय हैं। जिले में पक्षियों की प्रजातियों और उनके नामों को संथाली भाषा से जोड़ने पर आम लोगों के लिए उन्हें पहचानना और उनके संरक्षण के लिए काम करना आसान हो जाता है।

झारखंड की ओर आते हैं प्रवासी पक्षी

झारखंड की ओर आते हैं प्रवासी पक्षी

Bird Lover Forest Officer अजिंक्य बताते हैं कि जामताड़ा झारखंड आने वाले प्रवासी पक्षियों के लिए एक सुरक्षित ठिकाना है। हालांकि, इसके बावजूद, पक्षी अक्सर शिकारियों और स्थानीय ग्रामीणों के शिकार बन जाते हैं क्योंकि स्व-उपभोग के लिए पक्षियों का शिकार यहां की संस्कृति है। उन्होंने बताया कि सर्दियों के मौसम में हिमालयी क्षेत्र और मध्य एशिया से बड़ी संख्या में पक्षी झारखंड की ओर खास तौर पर जामताड़ा में पलायन करते हैं।

अंग्रेजी या जूलॉजिकल नाम कम पॉपुलर

अंग्रेजी या जूलॉजिकल नाम कम पॉपुलर

वन अधिकारी अजिंक्य बताते हैं कि स्थानीय लोगों और पक्षियों के जानकारों और कर्मचारियों के साथ बैठकों और बातचीत के दौरान यह देखा गया कि कुछ पक्षियों को जामताड़ा के लोग अपने पारंपरिक आदिवासी नामों से जाने जाते हैं, लेकिन यह अब प्रचलन में नहीं है। ऐसे में नई पीढ़ी भी इनसे पूरी तरह अनजान है। उन्होंने बताया कि जब हमने पक्षियों को उनके पारंपरिक नामों से पुकारा, तो यह स्थानीय लोगों को पक्षियों के अंग्रेजी या जूलॉजिकल नामों की तुलना में अधिक पसंद आया। इसलिए पक्षियों का संरक्षण करने के लिए इनके स्थानीय और संथाली भाषा के नाम का इस्तेमाल किया जाने लगा।

संथाली या पारंपरिक नाम वाले प्रवासी पक्षी

संथाली या पारंपरिक नाम वाले प्रवासी पक्षी

डीएफओ अजिंक्य बताते हैं कि उन्होंने पक्षियों को उनके पारंपरिक नामों के साथ सूचीबद्ध करने, इनकी पहचान करने और स्थानीय लोगों को पक्षियों के बारे में जागरुक करने का प्रयास शुरू किया गया। उन्होंने कहा कि जिले में वन विभाग के स्थानीय कर्मचारियों, वन समिति के सदस्यों और स्थानीय शिक्षकों की मदद से पक्षियों के पारंपरिक नामों वाले प्रवासी पक्षियों की सूची तैयार की गई है।

150 प्रजातियों की सूची तैयार

150 प्रजातियों की सूची तैयार

अजिंक्य बताते हैं कि उन्हें उनकी इस अनोखी कोशिश का नतीजा भी दिखने लगा है और अब तक उन्होंने लगभग 150 प्रजातियों की एक सूची तैयार कर ली है। Bird Lover Forest Officer अजिंक्य को उम्मीद है कि सूची तैयार होने और पक्षियों की पहचान के बाद प्रवासी पक्षियों के जामताड़ा क्षेत्र में आने की संख्या और अधिक बढ़ने की संभावना है। उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य समग्र पर्यावरण संरक्षण में सुधार करना है, जिससे पंख वाले जीवों की रक्षा के अलावा वन आवरण (forest cover) और वन्य जीवन दोनों में सुधार होगा।

पक्षियों को बचाने में भाषा का योगदान

पक्षियों को बचाने में भाषा का योगदान

न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार डीएफओ अजिंक्य ने यह पूछे जाने पर कि पक्षियों का संरक्षण और संथाली भाषा के इस्तेमाल का आइडिया उनके दिमाग में कैसे आया ? डीएफओ ने कहा कि मूटा टाइगर रिजर्व में उनके प्रोबेशन अवधि के दौरान सिखाया गया कि कोई एक ऐसा माध्यम जरूर होना चाहिए जिसके माध्यम से स्थानीय लोगों को वन विभाग और पर्यावरण संरक्षण से जोड़ा जा सके। उन्होंने कहा कि पक्षियों को देखना और परिदों को कोई नुकसान न पहुंचे, ये सुनिश्चित करना उनका शौक रहा है। इसी से उन्हें पक्षी संरक्षण की पहल करने के लिए प्रेरणा मिली।

पक्षियों के लिए प्राकृतिक आवास

पक्षियों के लिए प्राकृतिक आवास

डीएफओ अजिंक्य बंकर ने बताया कि उन्होंने अपने सभी कर्मचारियों और स्थानीय स्वयंसेवकों को क्षेत्र में विशेषज्ञों को बुलाकर पक्षियों को देखने और परिंदों की रक्षा करने का प्रशिक्षण दिलाया है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज में जंगलों में शिकार के लिए गुलेल (sling shots) ले जाने की परंपरा है, जिसे अब वन अधिकारियों ने जब्त कर लिया है। उन्होंने कहा, "हमने पेड़ों की भी 35 से अधिक प्रजातियां लगाई हैं, ये पक्षियों के लिए प्राकृतिक आवास हैं।" उन्होंने कहा कि पक्षियों के आवास को बेहतर बनाने के लिए पीपल, बरगद और गूलर के पेड़ उगाने पर खास ध्यान दिया गया।

स्थानीय लोगों के साथ मिलकर पक्षियों की पहचान

स्थानीय लोगों के साथ मिलकर पक्षियों की पहचान

Bird Lover Forest Officer अजिंक्य स्थानीय ग्रामीणों के बीच कैसे लोकप्रिय हो रहे हैं। इस पर न्यूइंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में जामताड़ा के स्वयंसेवक बलदेव सोरेन के हवाले से लिखा गया कि डीएफओ अजिंक्य लोगों के बीच पक्षियों के संरक्षण के बारे में जागरूकता पैदा करते हैं, लोगों से इन परिंदों का शिकार न करने की अपील करते हैं। उन्होंने इस क्षेत्र में पाए जाने वाले पक्षियों की जनगणना भी की है। बकौल बलदेव, स्थानीय लोग वन विभाग के साथ मिलकर पक्षियों की उनके पारंपरिक नामों के साथ सूची भी तैयार कर रहे हैं ताकि विभाग के पास रिकॉर्ड रखा जा सके।

जिन्हें दशकों तक नहीं देखा, कई ऐसे भी पक्षी मिले

जिन्हें दशकों तक नहीं देखा, कई ऐसे भी पक्षी मिले

बलदेव ने बताया कि जैसे ही उन्होंने पक्षियों को उनके पारंपरिक नामों से पुकारना शुरू किया, स्थानीय लोगों ने पक्षियों को अपनी संस्कृति से जोड़ना शुरू कर दिया। जागरुकता बढ़ने पर पक्षियों के शिकार में भी काफी कमी आई है। उन्होंने कहा कि डीएफओ अजिंक्य की पहल के बाद एक तरीके का अभियान शुरू हो गया और पक्षियों की पहचान के दौरान उन्हें कई और पक्षी भी मिले जो उन्होंने अपने 35 साल के जीवन में पहले कभी नहीं देखे थे।

गुलेल से पक्षियों का शिकार बंद हुआ

गुलेल से पक्षियों का शिकार बंद हुआ

जामताड़ा में पक्षी संरक्षण में जुटे एक अन्य स्वयंसेवक, नजीर सोरेन बताते हैं कि पहले, लोग अपने गुलेल से पक्षियों का शिकार करते थे, लेकिन अब लोगों ने उन्हें मारना बंद कर दिया है क्योंकि खुद की भाषा, संस्कृति और समाज के हिस्से के रूप में पक्षियों को पहचाना जाने लगा है। नजीर एक स्थानीय स्कूल में संथाली भाषा के शिक्षक हैं।

स्कूलों में कैसे जागरुक बन रहे बच्चे

स्कूलों में कैसे जागरुक बन रहे बच्चे

Bird Lover Forest Officer अजिंक्य के आह्वान का असर बताते हुए जामताड़ा में ही वन रक्षक के रूप में सेवाएं दे रहे सपन कुमार पंडित बताते हैं कि पक्षियों के संरक्षण के बारे में बच्चों के बीच जागरूकता पैदा करने के लिए स्कूलों में प्रश्नोत्तरी और पेंटिंग प्रतियोगिता जैसे आयोजन किए जाते हैं। बता दें कि डीएफओ बंकर को उनके उल्लेखनीय प्रयास के लिए भारतीय पक्षी संरक्षण नेटवर्क (Indian Bird Conservation Network) की ओर से भी सराहना मिल चुकी है।

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