J&K elections: जम्मू-कश्मीर चुनाव में जमात-ए-इस्लामी हुआ सक्रिय, किस पार्टी को लग सकता है झटका?
Jammu Kashmir Chunav: जम्मू और कश्मीर विधानसभा चुनाव में इस बार प्रतिबंधित जमात-ए-इस्लामी भी सक्रिय हो गया गया है। प्रतिबंध की वजह से यह खुद तो चुनाव में उम्मीदवार नहीं उतार सकता, लेकिन इसने कुछ सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवारों के समर्थन का फैसला किया है। जमात के इस तरह से चुनावी राजनीति में सक्रिय होना, केंद्र शासित प्रदेश की चुनावी राजनीति में बहुत बड़े बदलाव का संकेत है।
एक दिन पहले ही एनडीटीवी को दिए एक इंटरव्यू में जमात-ए-इस्लामी के पूर्व महासचिव गुलाम कादिर ने कहा था कि उसके सदस्य चुनावों में हिस्सा लेंगे, ताकि अपनी आवाज उठा सकें। इनके मुताबिक जमात इसलिए चुनावों में हिस्सा लेना चाहता है, ताकि इसपर लगा प्रतिबंध हट सके।

निर्दलीय प्रत्याशियों को 'परोक्ष' समर्थन देगा जमात-ए-इस्लामी
फिलहाल जमात ने दक्षिण कश्मीर के कुलगाम, पुलवामा, देवसार और जैनपोरा में चार निर्दलीय प्रत्याशियों को समर्थन देने का फैसला किया है। दूसरे और तीसरे चरण में भी जमात-ए-इस्लामी कुछ उम्मीदवारों की समर्थन कर सकता है।
2019 में 'गैरकानूनी संगठन' घोषित हुआ था
जमात खुद चुनावों में हिस्सा नहीं ले सकता, क्योंकि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 2019 में इसे 'गैरकानूनी संगठन' घोषित कर दिया था। इस साल फरवरी में यह प्रतिबंध और पांच वर्षों के लिए बढ़ा दिया गया। 1987 के बाद से जमात-ए-इस्लामी ने किसी भी चुनाव में भाग नहीं लिया है।
गुलाम कादिर ने टीवी इंटरव्यू में कहा, 'हमने ऐसा कुछ भी नहीं किया है जो कानून के खिलाफ हो और हमने हमेशा अपनी गतिविधियां भारतीय संविधान के दायरे में रखी हैं। इसलिए जब केंद्र ने हमपर बैन लगाने का फैसला किया, तो हम हैरान रह गए कि एक लोकतांत्रिक देश में ऐसा कैसे हो गया। इसलिए हमने चुनावों में भाग लेने का फैसला किया है, ताकि अपनी आवाज उठा सकें।'
आतंकी संगठन से तार जुड़े होने के लग चुके हैं आरोप
जमात-ए-इस्लामी पर आरोप है कि इसने कश्मीर में अलगाववादियों का समर्थन किया, जिसमें हथियारों के साथ हिंसक प्रदर्शन भी शामिल है। 1888 के विवादित विधानसभा चुनावों के बाद यह संगठन अलगाववादी आंदोलनों से जुड़ गया। इसपर हिजबुल मुजाहिदीन जैसे आतंकवादी संगठनों से भी तार जुड़े होने के आरोप लग चुके हैं।
जमात के चुनाव बहिष्कार वाले स्टैंड में आया है बदलाव
आर्टिकल 370 हटने के बाद सरकार ने यूएपीए के तहत इसके खिलाफ कार्रवाई शुरू की, इसके नेता गिरफ्तार हुए और संपत्तियां जब्त की गईं। इससे इस संगठन की गतिविधियां ठप पड़ गईं। लेकिन, पिछले कुछ वर्षों में जमात के स्टैंड में बदलाव नजर आने लगा है और इसने चुनाव बहिष्कार से निर्दलीय उम्मीदवारों को समर्थन देने की ओर रुख करना शुरू कर दिया है।
वैसे जमात के नेता का दावा है कि 'हमने कभी भी चुनाव के खिलाफ नहीं बोला। हम अपने उम्मीदवारों का समर्थन करते हैं और उम्मीद करते हैं कि वह लोगों के मुद्दों पर ध्यान देंगे।'
जमात के सक्रिय होने से मतदान प्रतिशत में बढ़ोतरी की संभावना
जमात किसी भी रूप में चुनाव में सक्रिय होता है तो इससे जम्मू-कश्मीर में मतदान के प्रतिशत में काफी बढ़ोतरी होने की संभावना है। जमात का उत्तर और दक्षिण कश्मीर में मजबूत पकड़ है। यह एक कैडर-आधारित संगठन है। इसके जो कैडर पहले चुनाव बहिष्कार में अहम रोल निभाते थे, वही अब बड़ी संख्या में वोटरों को मतदान केंद्रों तक लाने में सहायक बन सकते हैं।
जमात हुआ सक्रिय तो किस पार्टी को लग सकता है झटका?
अगर कश्मीर घाटी में ज्यादा वोटिंग होती है तो इससे यहां जो प्रमुख क्षेत्रीय पार्टियां हैं, उनका प्रदर्शन प्रभावित हो सकता है। क्योंकि, नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी जैसी पार्टियां को अक्सर कम मतदान का ही फायदा मिलता देखा गया है।
लेकिन, अगर जमात के प्रभाव में निर्दलीयों के पक्ष में मतदान का ग्राफ बढ़ा तो हवा का रुख बदल भी सकता है। इसकी झलक लोकसभा चुनावों में भी दिख चुकी है।(दाहिनी तस्वीर-वीडियो से ली गई है)












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