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जम्मू-कश्मीर में बिना नेटवर्क का एक गांव, टीचर और बच्चे 3 किलोमीटर दूर जाकर लेते हैं ऑनलाइन क्लास

श्रीनगर, जून 8। जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 हटने के बाद भी इंटरनेट का मुद्दा बरकरार है। भले ही शहरी इलाकों में विकास कार्य तेजी से चल रहे हैं, लेकिन दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों में अभी भी लोगों को नेटवर्क की समस्या से जूझना पड़ रहा है। ऐसा ही एक गांव श्रीनगर से 90 किलोमीटर दूर बारामूला जिले के लिंबर इलाके में है। यहां के रहने वाले एक शिक्षक मंजूर अहमद चक गांव से 3 किलोमीटर पैदल चलकर एक पहाड़ी पर जाते हैं, फिर उसके बाद उनके मोबाइल में नेटवर्क आता है। मोबाइल में नेटवर्क आने के बाद अहमद चक जम्मू-कश्मीर शिक्षा विभाग के लर्निंग मैनेजमेंट सिस्टम पोर्टल पर लेसन प्लान अपलोड कर पाते हैं।

Jammu kashmir

पहाड़ी पर जाकर भी ठीक से नहीं हो पाती ऑनलाइन क्लास

इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक, मंजूर अहमद चक के साथ इलाके के सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले कुछ छात्र भी अपने माता-पिता के मोबाइल लेकर इस पहाड़ी पर आते हैं। ये बच्चे फोन में में उस क्लासवर्क को डाउनलोड करने के लिए यहां आते हैं, लेकिन उन्हें इसके लिए काफी इंतजार करना पड़ता है, क्योंकि पहाड़ी पर भी नेटवर्क उतना बेहतर नहीं होता कि बच्चे ऑनलाइन क्लास का हिस्सा बन सकें।

गांव में नहीं लैंडलाइन कनेक्शन

हाई स्कूल में पढ़ाने वाले मंजूर अहमद का कहना है कि बच्चों को शिक्षा देने के लिए बच्चों और हमारा संघर्ष इसी तरह चलता है। लिंबर इलाके के रहने वाले शिक्षक और छात्र बताते हैं कि उनके गांव में अभी सड़क का निर्माण किया जा रहा है। इसके अलावा गांव में अभी तक कोई लैंडलाइन कनेक्शन भी नहीं है।

जंगली जानवरों का खतरा होता है बरकरार

लिंबर इलाके के रहने वाले एक निवासी सज्जाद अहमद का कहना है कि लगभग 650 घरों के इस गांव में इस पहाड़ी पर ही बिताया समय बच्चों के लिए पढ़ाई के लिए उपयुक्त होता है, लेकिन ये किसी बड़े खतरे से कम नहीं है, क्योंकि इस क्षेत्र में कुछ जंगली जानवर हैं। सज्जाद का कहना है कि जंगल की तरफ कई बार भालू भी देखे गए हैं, इसलिए शाम 6 बजे के बाद किसी को भी पहाड़ी की तरफ जाने की अनुमति नहीं होती।

हर साल 20 प्रतिशत आबादी करती है पलायन

2011 में हुई जनगणना करने वाली टीम का हिस्सा रहे सज्जाद अहमद कहते हैं कि गांव के अंदर लोग संपर्क में रहने के लिए घर-घर जाते हैं। उनका कहना है कि इस इलाके में हर साल 20 प्रतिशत आबादी अपने बच्चों को शिक्षा प्रदान करने के लिए यहां से पलायन कर जाती है।

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