राफेल फाइटर जेट खरीदना साबित हुआ घाटे का सौदा? पूर्व मार्शल ने MMRCA डील पर भारत के फैसले को क्यों कहा ब्लंडर?
Rafale Fighter Jet: सोशल मीडिया पर पिछले कुछ दिनों से चीनी छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान को लेकर काफी चर्चा की जा रही है, लेकिन पश्चिमी देशों के साथ साथ कई भारतीय विश्लेषक भी चीनी लड़ाकू विमान पर सवाल खड़े कर रहे हैं, लेकिन, इस बात को नकारना मुश्किल है, कि अधिग्रहण प्रक्रियाओं में हुई गड़बड़ियों ने भारतीय वायु सेना (Indian Air Force) को परेशान कर दिया है।
एयर मार्शल एम. मथेश्वरन (रिटायर्ड), जिन्होंने IAF के लिए 126 मीडियम मल्टी रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (MMRCA) की टेंडर प्रक्रिया में काम किया था, उन्होंने इस डील से भारत सरकार के हटने के फैसले पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है, कि लंबी अवधि की अधिग्रहण प्रक्रिया के बावजूद, अनुबंध को आगे नहीं बढ़ाना सही फैसला नहीं था।

MMRCA डील से पीछे हटना भारत का गलत फैसला? (Defence News)
एयर मार्शल मथेश्वरन ने यूरेशियन टाइम्स की एक रिपोर्ट में बताया है, कि "MMRCA को हासिल किया जाना चाहिए था। इसे न करना एक बड़ी भूल थी। इससे भारत में विश्व स्तरीय मैन्युफैक्चरिंग सुविधाएं और स्किल डेवलपमेंट होता। फ्रांस, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर पीछे हट रहा था, जिसकी वजह से HAL स्टैंडर्ड पर खरा नहीं उतर सका। यह एक विलंबकारी रणनीति थी, और भारत को इससे सख्ती से निपटना चाहिए था।"
आपको बता दें, कि अगस्त 2000 में भारतीय वायुसेना ने 126 मिराज 2000 II विमान खरीदने का प्रस्ताव रखा था। लेकिन 2004 में इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया गया और 2007 में MMRCA के तहत 126 विमान खरीदने का फैसला लिया गया। MMRCA सौदा करीब 15 साल तक प्रक्रिया में रहा, उसके बाद भारत सरकार ने इसे रद्द कर दिया और सीधे फ्रांस सरकार से 36 राफेल फाइटर जेट खरीद लिए।
अप्रैल 2010 तक, भारतीय वायुसेना ने 643 टेक्नोलॉजी स्टैंडर्ड के आधार पर छह दावेदारों (रूस का मिग-35, अमेरिका का लॉकहीड मार्टिन F-16IN "वाइपर" और बोइंग F-18E/F "सुपर हॉर्नेट", फ्रांस का राफेल, EADS का यूरोफाइटर टाइफून और स्वीडन का JAS-39 "ग्रिपेन") का तकनीकी मूल्यांकन पूरा कर लिया। विमानों की टेस्टिंग अलग अलग इलाकों और जलवायु में किया गया, जिनमें गर्मियों में लद्दाख में उच्च ऊंचाई और उच्च तापमान से लेकर सर्दियों में लद्दाख में -शून्य तापमान वाले उच्च ऊंचाई तक शामिल था।
MMRCA कैंसिल कर भारत ने खरीदा था राफेल
अप्रैल 2011 में भारतीय वायुसेना ने घोषणा की, कि तकनीकी मूल्यांकन के आधार पर राफेल और यूरोफाइटर को शॉर्टलिस्ट किया गया है। लेकिन बाद में राफेल को सबसे कम बोली लगाने वाले, एल1 के रूप में पहचाना गया और अधिग्रहण के लिए एक लंबी बातचीत शुरू हुई।
उस समय की रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि राफेल बनाने वाली फ्रांसीसी कंपनी डसॉल्ट, शुरूआती टेंडर में निर्धारित शर्तों, खासकर ऑफसेट और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के प्रावधानों को मामने ने के लिए उत्सुक नहीं था। टेंडर के मुताबिक, 18 विमान उड़ान भरने की स्थिति में खरीदे जाने थे, और बाकी 108 का निर्माण सार्वजनिक क्षेत्र की विमान निर्माता कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) द्वारा किया जाना था। लेकिन, डसॉल्ट HAL के साथ काम करने के लिए तैयार नहीं था। सितंबर 2016 में, भारत सरकार ने इस सौदे को रद्द करने और आपातकालीन खरीद के रूप में उड़ान भरने की स्थिति में 36 राफेल खरीदने का फैसला किया।

क्या राफेल फाइटर जेट खरीदना एक भूल थी?
भारतीय वायुसेना की तात्कालिक जरूरतों को पूरा करने की आवश्यकता थी और उसे आधुनिक विमानों की कमी का सामना करना पड़ रहा था। हालांकि, सिर्फ 36 राफेल खरीदने का नया सौदा विवादास्पद था और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया, जिससे खरीद की समयसीमा में देरी हुई। तत्कालीन वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल बीएस धनोआ ने बाद में कहा था, कि अगर राफेल को समय पर शामिल किया जाता तो (2019 में बालाकोट हमलों के) परिणाम भारत के पक्ष में होते।
फ्रांस ने दिसंबर 2022 तक सभी 36 जेट विमानों की आपूर्ति कर दी। भारत ने अब भारतीय नौसेना के विमानवाहक पोतों के लिए 26 राफेल-एम जेट खरीदने के लिए एक कॉन्ट्रैक्ट पर हस्ताक्षर किए हैं। माथेस्वरन का तर्क है, कि यह सबसे अच्छा विकल्प नहीं था।
उन्होंने कहा, "36 राफेल खरीदना सबसे अच्छा विकल्प नहीं था क्योंकि यह न सिर्फ महंगा था, बल्कि इससे भारतीय डिफेंस इंडस्ट्री को कोई फायदा भी नहीं हुआ। 126 MMRCA में देरी करने और बाद में इसे रद्द करने से हमने खुद को मुश्किल में डाल दिया, जिससे 36 राफेल की आपातकालीन खरीद करनी पड़ी।"
भारतीय वायुसेना के पूर्व सीनियर अधिकारी का मानना है, कि देश के सामरिक हितों को ध्यान में रखते हुए उच्च मूल्य वाले रक्षा अनुबंध सरकारों के बीच किए जाने चाहिए। माथेस्वरन कहते हैं, "उच्च मूल्य वाले रक्षा अनुबंध सरकार से सरकार के बीच होने चाहिए, क्योंकि हमें राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखना है और दुनिया को यह साबित नहीं करना है, कि हमारा टेंडर प्रोसेस सबसे अच्छा है।" उन्होंने आगे कहा: "अधिकतम लाभ उठाने के लिए भारत को एक साथ 2-3 देशों के साथ बातचीत करने की आवश्यकता है। जो हमारी आवश्यकताओं को पूरा करते हैं और टीओटी के लिए तैयार हैं, उन्हें भारत में आकर निर्माण करने के लिए कहा जाना चाहिए। हमारे उद्योग को बढ़ावा देने और अत्यधिक कुशल कार्यबल प्राप्त करने का कोई और तरीका नहीं है।"
MMRCA का पुनर्जन्म- MRFA
36 राफेल विमानों के अधिग्रहण के बावजूद, भारतीय वायुसेना के पास लड़ाकू विमानों की संख्या में काफी आ चुकी है। भारतीय वायुसेना के पास 1965 की संख्या से भी कम फाइटर जेट्स बचे हैं। और लड़ाकू विमानों की कमी ने निश्चित तौर पर भारत की टॉप लीडरशिप के सामने ऱखरे की घंटी बजा दी है। क्योंकि स्वदेशी लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट के निर्माण में अभी कई सालों का वक्त लगने वाला है।
हालांकि, भारतीय वायुसेना ने 2018 में 114 मीडियम रोल फाइटर एयरक्राफ्ट (MRFA) के लिए RFI जारी किया और दुनिया भर के विमान निर्माताओं से कई अरब डॉलर के इस सौदे के लिए उत्साहजनक प्रतिक्रिया हासिल की हैं।
इस रेस में प्रमुख दावेदार डसॉल्ट के राफेल, बोइंग के F-15EX और लॉकहीड मार्टिन के F-21 हैं। स्वीडन की कंपनी SAAB का JAS-39 ग्रिपेन, यूरोफाइटर टाइफून और रूसी Su-35 लड़ाकू विमान भी इस दौड़ में हैं। हालांकि, इसे भारत सरकार से आवश्यकता की स्वीकृति का इंतजार है।
वायुसेना ने 'मेक इन इंडिया' नीति के तहत MRFA हासिल करने पर सहमति जताई है, जिसके तहत विमान का भारत में लाइसेंस-उत्पादन किया जाएगा। इंडियन एयरफोर्स को उम्मीद है, कि इससे विमान में जरूरत पड़ने पर अपग्रेड और संशोधन करने में मदद मिलेगी।
भारत की स्थिति का अंदाजा चीफ एयर मार्शल अमर प्रीत सिंह के अक्टूबर में दिए गये बयान से लगाया जा सकता है, जब उन्होंने कहा था, कि "जहां तक तकनीक का सवाल है, हम पिछड़ रहे हैं। कुछ समय पहले हम उनसे बेहतर थे, लेकिन हम उसमें पिछड़ रहे हैं। हमें आगे बढ़ने की जरूरत है। विनिर्माण (विमान और उपकरण) के मामले में, हम पिछड़ रहे हैं।"
जब तक भारत का एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) उड़ान भरना शुरू करेगा, तब तक चीन 1000 J-20 'माइटी ड्रैगन' 5वीं पीढ़ी के जेट तैनात कर सकता है। एयरफोर्स के चीफ ने इस बात पर जोर दिया, कि यह देखते हुए कि भारत आक्रामक होने का इरादा नहीं रखता है, बल "अपने आप पर काबू रख सकता है।"
लेकिन सवाल यह है, कि अगर भारतीय वायुसेना चीन के खिलाफ आक्रामक रुख नहीं अपनाना चाहती है, तो क्या वह दो ऐसे दुश्मनों के खिलाफ (चीन और पाकिस्तान) अकेले खड़ी रह सकती है, जो एक साथ दो मोर्चे खोलने का फैसला करते हैं? भारतीय वायुसेना को बिना किसी देरी के ईमानदारी से इस सवाल का जवाब देना चाहिए।
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