फ्रांस में बदलेगी सरकार, और पुडुचेरी में लोग होंगे परेशान? दक्षिणपंथी नेता बार्डेला ऐसा क्या करने वाले हैं?
France News: फ्रांस के अगले प्रधानमंत्री बनने के काफी करीब पहुंच चुके दक्षिणपंथी नेशनल रैली पार्टी के नेता जॉर्डन बार्डेला ने फ्रांस में पहले राउंड का इलेक्शन एकतरफा जीतने के बाद दूसरे राउंड के चुनाव से पहले फिर वही पुराने वादे दोहराए हैं।
जॉर्डन बार्डेला का कहना है, कि अगर उनकी पार्टी देश में सरकार बनाती है, तो वे अप्रवासन को बहुत कम कर देंगे, टैक्स में कटौती करेंगे और अपराध पर लगाम लगाएंगे। अप्रवासन को लेकर उनका मतलब है, फ्रांस में मुस्लिम देशों से शरणार्थी बनकर आए वो लोग, जिनपर अकसर हिंसा करने के आरोप लगते रहे हैं।

जॉर्डन बार्डेला की विवादित नीतियां
नेशनल रैली फ्रांस में एक खास राजनीतिक परंपरा की उत्तराधिकारी है, जो खुले तौर पर नस्लवाद, यहूदी-विरोधी और नरसंहार के आरोपों में फंसी रही है। हालांकि पार्टी ने खुद को उस अतीत से दूर कर लिया है, लेकिन कुछ बुनियादी सिद्धांत अभी भी इसकी नीतियों में शामिल है, जैसे अप्रवासी फ्रांस की सुरक्षा के लिए खतरा हैं, इकोनॉमी और नेशनल सिक्योरिटी।
जॉर्डन बार्डेला की योजनाओं में गैर-फ्रांसीसी माता-पिता से फ्रांस में जन्मे बच्चों को 18 वर्ष की आयु में फ्रांसीसी नागरिकता प्राप्त करने का ऑटोमेटिक अधिकार छीनना, आपातकालीन स्थितियों को छोड़कर, कानूनी अनुमति के बिना देश में रहने वाले लोगों के लिए मुफ्त मेडिकल ट्रीटमेंट को खत्म करना और दूसरे पासपोर्ट वाले नागरिकों को संवेदनशील माने जाने वाले काम करने से रोकना, जैसे परमाणु संयंत्र चलाना और "रणनीतिक" रक्षा में काम करना।
फ्रांस में डुएल सिटिजनशिप है और देखा गया है, कि कई मुस्लिमों ने डुएल सिटिजनशिप ले रखी है और फ्रांस में मांग उठती ही है, कि ऐसे लोगों को संवेदनशील विभागों में काम नहीं करने दी जाए।
जॉर्डन बार्डेला दोषी अपराधियों को सार्वजनिक आवास में रहने से रोकना चाहते हैं और ईंधन से लेकर बिजली तक सभी प्रकार की ऊर्जा पर देश के बिक्री टैक्स में कटौती करना चाहते हैं।
हालांकि, वह ये काम कैसे करेंगे, यह पूरी तरह से साफ नहीं है। लेकिन पार्टी का 21 पन्नों का कार्यक्रम, जो फोटो और ग्राफिक्स से भरा हुआ है, वो ऐसे ही विचारों से भरा हुआ है, लेकिन उन्हें कैसे लागू किया जाए, इस पर कुछ नहीं कहा गया है। पिछले तीन हफ्तों के उग्र अभियान और बहसों में, बार्डेला या कुछ वादों पर पीछे हट गए हैं या उन्हें बाद के लिए ठंडे बस्ते में डाल दिया है।
लेकिन, कुछ उपाय जो लगातार उनकी योजना में बने हुए हैं, उनमें कुछ स्वचालित नागरिकता अधिकारों को छीनना, जिन्हें वह तुरंत लागू करना चाहते हैं, उन्हें राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और देश की संवैधानिक परिषद से प्रतिरोध का सामना करना पड़ सकता है।
लिहाजा, सवाल ये उठ रहे हैं, कि आक्रामक प्रचार के जरिए पहला राउंड जीतने वाले जॉर्डन बार्डेला अगर दूसरा राउंड भी जीत जाते हैं, तो फिर वो अपनी नीतियों को कैसे लागू करेंगे और उसका क्या असर होगा?
अपनी नीतियों को कैसे लागू करेगे जॉर्डन बार्डेला?
लिले विश्वविद्यालय में पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर रेमी लेफेब्रे का मानना है, कि "उन्हें अपने कुछ कार्यक्रमों को लागू करने में कठिनाई होगी।"
और सबसे बड़ी बात तो ये है, कि यह भी स्पष्ट नहीं है, कि 28 साल के बार्डेला फ्रांस के अगले प्रधानमंत्री बनेंगे या नहीं। पिछले रविवार को पहले चरण के चुनाव में उनकी पार्टी और उसके सहयोगियों ने 577 सीटों वाली नेशनल असेंबली के लिए लगभग 33 प्रतिशत लोकप्रिय वोट जीते हैं। लेकिन उनके केवल 38 उम्मीदवार ही अपनी सीटों पर सीधे जीत पाए हैं।
बाकी ज्यादातर उम्मीदवारों को अगले रविवार को निर्णायक दूसरे मतदान का सामना करना पड़ेगा, और उन्हें पूर्ण बहुमत प्राप्त करने से रोकने के लिए पूरे देश में एक राष्ट्रीय आंदोलन बन रहा है। उनके 200 से ज्यादा प्रतिद्वंद्वी तीन-तरफा रेस से बाहर हो गए हैं, और उन्हें रोकने के लिए सबसे मजबूत प्रतिद्वंद्वी को वोट देने की अपील की जा रही है।
बार्डेला ने कहा है कि वे 289 सीटों के पूर्ण बहुमत के बिना प्रधानमंत्री का पद नहीं संभालेंगे। लेकिन अगर वे प्रधानमंत्री बनते हैं, तो उन्होंने वादा किया है, कि उनकी सरकार इस साल कुछ उदार उपाय लागू करेगी।
कुछ विधेयक उनकी पार्टी की आव्रजन विरोधी मान्यताओं के मुताबिक ही हैं, जैसे कि दोहरी नागरिकता वाले लोगों के कुछ संवेदनशील सेक्टर में नौकरी करने पर प्रतिबंध, साथ ही बिना कानूनी अनुमति के देश में रहने वाले लोगों के लिए मुफ्त स्वास्थ्य सेवाओं पर रोक लगाना।
इसके अलावा, अगले कुछ वर्षों में, बार्डेला ने पार्टी के "राष्ट्रीय वरीयता" के लंबे समय से चले आ रहे सिद्धांत को आगे बढ़ाने का वादा किया है - जिसके तहत फ्रांसीसी नागरिकों को कुछ सरकारी नौकरियों, लाभों या सब्सिडी के मामले में विदेशियों की तुलना में तरजीह दी जाएगी।
न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, रूएन नॉरमैंडी विश्वविद्यालय में सार्वजनिक कानून की एसोसिएट प्रोफेसर और संवैधानिक विशेषज्ञ ऐनी-चार्लेन बेज़िना ने कहा, कि इन उपायों को देश की शीर्ष संवैधानिक परिषद द्वारा खारिज किए जाने की संभावना है।
पिछले साल ही कोर्ट ने गैर-फ्रांसीसी नागरिकों के लिए सामाजिक लाभों पर सीमाओं के खिलाफ फैसला दिया, जो देश में पांच वर्षों से कम समय से रह रहे हैं। फैसले में कहा गया है, कि इस तरह के प्रतिबंध राष्ट्रीय एकता के अधिकार का असंगत रूप से उल्लंघन करेंगे, जो फ्रांस के संविधान में निहित है।
बेजिना ने बताया कि जन्म या नागरिकता के आधार पर लोगों को अलग करके लाभ आवंटित करना फ्रांसीसी गणराज्य की मौलिक संरचनाओं के विरुद्ध है और जो 1789 के मनुष्य और नागरिक के अधिकारों की घोषणा में निहित है।
उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा, "आप फ्रांसीसी लोगों के बीच अंतर नहीं कर सकते हैं जो राष्ट्रीय या द्विराष्ट्रीय हैं।" उन्होंने कहा, कि "यह जन्मसिद्ध अधिकार या रक्त के आधार पर फ्रांसीसी लोगों को अलग करने के लिए समान है। यह समानता के सिद्धांत के विरुद्ध है।"
बेजिना ने कहा ने कहा, कि बार्डेला का चुनावी कैम्पेन इस बाधा को स्वीकार करता है और जनमत संग्रह बुलाकर संविधान में बदलाव की बात कह रहा है। हालांकि, ऐसा करने का अंतिम अधिकार सिर्फ राष्ट्रपति के पास है। जिसको लेकर मैक्रों ने कहा है, कि वह "राष्ट्रीय वरीयता" के लिए नेशनल रैली की कई योजनाओं का विरोध करते हैं।
लेकिन, एक्सपर्ट्स का कहना है, कि अपराध पर सख्त कार्रवाई करने की बार्डेला की तत्काल योजनाओं को जल्दी और सुचारू रूप से लागू किए जाने की संभावना है। पदभार ग्रहण करने के पहले सप्ताह में, उन्होंने बार-बार अपराध करने वालों के लिए न्यूनतम सजा निर्धारित करने वाले कानून पारित करने और दोबारा अपराध करते पकड़े गए युवा अपराधियों के परिवारों को सरकार की तरफ से दी जाने वाली सब्सिडी में कटौती करने का वादा किया है।
राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर लेफेब्रे ने कहा, कि "मुझे लगता है कि वे अपने मतदाताओं को संतुष्ट करने के लिए ऐसा करने की कोशिश करेंगे।"
हालांकि, ऊर्जा में बिल में भारी कटौती कैसे करेंगे, जब उनसे पूछा गया, कि वे इस उपाय के लिए कैसे भुगतान करेंगे, जो करीब 18 अरब ड़ॉलर का होगा, बार्डेला ने कई संभावनाएं पेश कीं, जिनमें यूरोपीय संघ को फ्रांस के भुगतान में 2 अरब यूरो की कटौती करना भी शामिल है।
लेफेब्रे ने भविष्यवाणी की, कि वहां, उन्हें फिर से यूरोपीय संघ के एक सशक्त समर्थक मैक्रों के साथ संघर्ष का सामना करना पड़ सकता है। लेकिन बार्डेला को तकनीकी चुनौती का भी सामना करना पड़ सकता है। पेरिस के जैक्स डेलर्स इंस्टीट्यूट में यूरोपीय आर्थिक मामलों की वरिष्ठ अनुसंधान फेलो यूलिया रुबियो ने कहा, कि अल्पावधि में, यदि फ्रांस सरकार उस भुगतान को भेजने से इंकार कर दे, तो उसे संभवतः तत्काल प्रतिबंध का सामना करना पड़ेगा और यूरोपीय संघ से होने वाले ट्रांसफर में भी कमी आएगी, जिनमें से ज्यादातर फ्रांसीसी किसानों को जाते हैं, जो कृषि सब्सिडी के सबसे बड़े लाभार्थी हैं।
पुडुचेरी में क्यों लोग होंगे परेशान?
पेरिस से पुडुचेरी की दूरी 8,000 किलोमीटर से ज्यादा है, लेकिन रंग-बिरंगी साड़ियां पहने कुछ महिलाएं अभी भी फ्रेंच भाषा में बातचीत करती हैं, पुलिसकर्मी पुलिस की नुकीली केपी टोपी पहनते हैं, और सड़क के संकेत पेरिस के प्रसिद्ध नीले और सफेद रंग के तामचीनी अक्षरों की नकल करते हैं।
पुडुचेरी में पूर्व में फ्रांसीसी अदालत में काम कर चुके 96 साल के जज डेविड अन्नुसामी ने औपनिवेशिक युग के नाम का उपयोग करते हुए कहा, "पांडिचेरी के भारतीयों को सांस्कृतिक और कानूनी रूप से फ्रांसीसी नागरिक माना जाता था।"
पुडुचेरी, तमिलनाडु और केरल के केंद्र शासित प्रदेशों में रहने वाले फ्रांसीसी नागरिकों ने फ्रांसीसी संसदीय चुनावों के पहले राउंड में प्रतिनिधियों को चुनने के लिए अपने मताधिकार का प्रयोग किया। दूसरा राउंड का चुनाव 7 जुलाई को होगा। पुडुचेरी, तमिलनाडु और केरल में 4,550 फ्रांसीसी नागरिक हैं। पुडुचेरी में फ्रांस के महावाणिज्य दूतावास और चेन्नई में ब्यूरो डी फ्रांस ने स्थानीय अधिकारियों की मदद से मतदान का आयोजन किया था।
फ्रांस ने 1954 में भारत को छोड़ा था, यानि ब्रिटेन से भारत की आजादी मिलने के सात साल बाद - और पेरिस को औपचारिक रूप से पूर्ण संप्रभुता सौंपने में 1962 तक का समय लगा। और उसके बाद पूर्व फ्रांसीसी व्यापारिक केंद्र ने अपना नाम बदलकर पुडुचेरी कर लिया है, जो एक प्रशासनिक क्षेत्र है जिसमें कराईकल, माहे और यनम सहित अन्य फ्रांसीसी पूर्व-औपनिवेशिक परिक्षेत्र भी शामिल हैं।
आज पुडुचेरी शहर में करीब 5,000 फ्रांसीसी नागरिक रहते हैं, जिनमें से अधिकांश के पूर्वज भारतीय हैं, जिन्होंने फ्रांस से नागरिकता ली थी।
फ्रेंको-भारतीय फैशन डिजाइनर वासंती मानेट ने अपने पिता की एक ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर दिखाते हुए कहा, कि "पेरिस में पैदा हुए किसी व्यक्ति या पांडिचेरी में पैदा हुए किसी व्यक्ति, दोनों के अधिकार समान हैं।" लिहाजा अगर फ्रांस में नई सरकार बनती है और नये कानून बनते हैं, तो ऐसे लोगों का परेशान होना तय होगा, जो अभी भी खुद को फ्रांसीसी मानते हैं।












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