INS Vishal: चीन को काउंटर करने के लिए हर हाल में चाहिए तीसरा एयरक्राफ्ट कैरियर, क्या भारत ने गंवाया बड़ा मौका?
INS Vishal: भारतीय रक्षा मंत्रालय ने अपनी नौसेना को तीसरे एयरक्राफ्ट कैरियर से लैस करने का एक बेहतरीन मौके को गंवा दिया है, जिसका इंडियन नेवी हकदार थी। भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता वाली डिफेंस एक्विजीशन काउंसिल (DAC) 30 नवंबर को अपनी बैठक में पूरी खरीद प्रक्रिया में पहले चरण के लिए मंजूरी देने में नाकाम रही है।
दरअसल, भारतीय नौसेना ने डीएसी से अपनी आवश्यकता की स्वीकृति के माध्यम से अपने बेड़े में तीसरे एयरक्राफ्ट कैरियर को शामिल करने की प्रक्रिया को शुरू करने की मांग की थी और भारतीय नौसेना ने अपने आकलन में जो तर्क रखे थे, उसका आकलन करने पर पता चलता है, कि इंडियन नेवी को तीसरे एयरक्राफ्ट कैरियर की सख्त आवश्यकता है।
यदि डीएसी ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी होती, जिसकी कीमत लगभग 40,000 करोड़ रुपये (लगभग 5 बिलियन अमेरिकी डॉलर) बताई गई है, तो रक्षा मंत्रालय ने तीन एयरक्राफ्ट कैरियर के संचालन के भारतीय नौसेना के लंबे समय से पल रहे सपने को साकार करना शुरू कर दिया होता।

इंडियन नेवी क्यों चाहती है तीसरा एयरक्राफ्ट कैरियर?
इंडियन नेवी तीन एयरक्राफ्ट कैरियर को अपने बेड़े में ऑपरेट करना चाहती है, ताकि कम से कम दो कार्यात्मक एयरक्राफ्ट कैरियर देश के पूर्वी और पश्चिमी समुद्री तट पर तैनात किए जाएं, जबकि तीसरे की समय समय पर मरम्मत होती रहे। फिलहाल, अगर एक एयरक्राफ्ट की मरम्मत होती है, तो एक ही एयरक्राफ्ट कैरियर ऑपरेशनल रह पाता है।
भारतीय नौसेना ने दक्षिणी भारत में केरल के कोच्चि में कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड (CSL) में दूसरे स्वदेशी विमान वाहक (IAC-2) के निर्माण का प्रस्ताव पहले से ही कमीशन किए गए INS विक्रांत के लिए "रिपीट ऑर्डर" के रूप में दिया था, जिसे CSL ने 15 वर्षों में बनाया।
भारतीय नौसेना ने वास्तव में अपने बेड़े में एक परमाणु ऊर्जा से संचालित एयरक्राफ्ट कैरियर होने का सपना देखा था, जब 2016 में IAC-2 योजना तैयार की गई थी। हालांकि, भारत सरकार ने नौसेना को धन की कमी और बजटीय बाधाओं को देखते हुए अपनी मांग को कम करने के लिए कहा था।
परमाणु ऊर्जा-संचालित विमानवाहक पोत का मतलब ये होता, कि पूरे वर्ष का पूंजीगत बजट दस वर्षों में चरणों में नौसेना को देना होता। लेकिन, डर इस बात की थी, अगर नौसेना के लिए इस बजट को जारी कर दिया जाता, तो दूसरी सेवाएं भी सरकार से बजट की मांग करने लगतीं।
लिहाजा, भारतीय नौसेना ने इलेक्ट्रिसिटी से ही संचालित होने वाले एक और एयरक्राफ्ट कैरियर से ही संतोष किया और आईएनएस विक्रांत का निर्माण किया गया। भारत के पास फिलाहल दो एयरक्राफ्ट कैरिय हैं, जिनमें से दूसरे को पिछले साल इंडियन नेवी में शामिल किया गया था।
हालांकि, इंडियन नेवी ने जिस तीसरी एयरक्राफ्ट कैरियर के लिए सरकार से बजट की मांग की थी, अस्थाई तौर पर उसका नाम आईएनएस विशाल रखा गया है। हालांकि, यूरो टाइम्स की रिपोर्ट में कहा गया है, कि भारत में बनने वाले दूसरे स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विशाल के निर्माण को मंजूरी फरवरी से मई 2024 तक, आम चुनाव से पहले, अगली दो या तीनडिफेंस एक्विजीशन काउंसिल (DAC) बैठकों में ली जा सकती है।
इसका मतलब यह भी है, प्रोजेक्ट में देरी होना अब तय है।

एयरक्राफ्ट कैरियर बनने में लगेगा काफी वक्त
फर्ज कीजिए, अगर आईएनएस विशाल प्रोजेक्ट को अगले साल संसदीय चुनाव से पहले मंजूरी मिल जाती है, तो भी आईएनएस विशाल को बनने और इंडियन नेवी में शामिल होने में कम से कम 12 सालों का वक्त लगेगा और ये 2035 तक इंडियन नेवी में शामिल हो पाएगा।
फिर भी, भारतीय नौसेना इस देरी से सहमत है, क्योंकि वह एक ऐसा विमानवाहक पोत चाहती है, जो भारत के समुद्री हितों की रक्षा कर सके, जो पश्चिमी मोर्चे पर होर्मुज जलडमरूमध्य और मलक्का जलडमरूमध्य के बीच हिंद महासागर क्षेत्र तक फैल रहा है। इसके साथ ही, भारत के पूर्वी मोर्चे का विस्तार अब दक्षिण चीन सागर तक हो रहा है, लिहाजा इस क्षेत्र में भी चीन को काउंटर करने के लिए तीसरे एयरक्राफ्ट कैरियर की जरूरत है, क्योंकि हिंद महासागर में चीन को दाखिल होने से रोकने के लिए भारत का दक्षिण चीन सागर में घुसना जरूरी है और इसके लिए तीसरे एयरक्राफ्ट कैरियर की जरूरत होगी।

क्यों है तत्काल फैसला लेने की जरूरत?
भारत सरकार को दूसरे स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर प्रोजेक्ट पर तत्काल फैसला लेने की जरूरत है। इसकी सबसे बड़ी वजह ये है, कि पहला एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत बनाने वाले मजदूरों ने पिछले 15 सालों में जो काम सीखा है, अगर उन्होंने दूसरा एयरक्राफ्ट बनाना शुरू नहीं किया, तो वो कौशल वो भूल जाएंगे।
इसके अलावा, भारतीय नौसेना का लक्ष्य अपनी ऑपरेशनल जरूरतों को पूरा करना है। क्योंकि, आईएनएस विक्रांत इस साल युद्ध के लिए तैयार हो चुका है और आईएनएस विक्रमादित्य, पिछले दस वर्षों से भारतीय नौसेना की सेवा कर रहा है, जिसे नवंबर 2013 में कमीशन किया गया था।
तीन एयरक्राफ्ट कैरियर के साथ, भारतीय नौसेना हिंद-प्रशांत क्षेत्र में तैनात सभी नौसेनाओं के साथ तालमेल बनाए रखेगी। समुद्री परिदृश्य तेजी से विकसित हो रहा है, भू-राजनीतिक गतिशीलता और क्षेत्रीय सुरक्षा चिंताओं के कारण मजबूत नौसैनिक क्षमताओं की मांग हो रही है।
इस संदर्भ में, भारतीय नौसेना के लिए तीसरा विमानवाहक पोत हासिल करने का मामला न केवल प्रासंगिक बल्कि अनिवार्य हो जाता है। यह सिर्फ इंडियन ओसियन क्षेत्र में चीन का मुकाबला करने के बारे में नहीं है, बल्कि भारत के हितों की रक्षा करने और क्षेत्र में अपनी श्रेष्ठता का दावा जारी रखने के बारे में भी है।
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