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रूस में पढ़े-लिखे और स्किल वाले लोग क्यों छोड़ रहे हैं देश

विशेषज्ञों का कहना है, अब यहाँ कार या जूतों की मरम्मत करने वालों की मांग ज्यादा होने वाली है. ऐसा नहीं है कि कयामत आ जाएगी लेकिन इन हालात से रूस में समय के साथ उत्पादकता कम हो जाएगी.

मारिया किसेलेवा और विक्टोरिया सफरोनोवा

बीबीसी न्यूज़, रसियन

रूस के लोग देश छोड़ कर जाते हुए
Getty Images
रूस के लोग देश छोड़ कर जाते हुए

यूक्रेन पर हमले के बाद भड़के युद्ध से रूस के लाखों लोग घर छोड़ कर जा चुके हैं.

रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद भड़के भीषण युद्ध के दौरान घर छोड़ कर जाने वाले ये लोग कौन हैं और कहां जा रहे हैं.

आख़िर वे पलायन क्यों कर रहे हैं?

स्वेतलाना उम्र के तीसरे दशक की शुरुआत में हैं. वो एक छोटे शहर की रहने वाली हैं.

18 साल की उम्र में वो मॉस्को आ गई थीं और यूनिवर्सिटी में भौतिकी से ग्रैजुएशन के बाद उन्होंने कई कंपनियों के लिए प्रोडक्ट मैनेजर का काम किया था.

वो कहती हैं, ’’मैंने कभी नहीं सोचा था कि रूस छोड़ूंगी. मैं मॉस्को में रिटायर होना चाहती थी.’’

वो कहती हैं, ’’मैं रूस से प्यार करती हूं. मैंने यहां जीवन का आनंद लिया है.’’

रूसी लोग यूक्रेन की लड़ाई शुरू होने से पहले भी देश छोड़ कर जाते रहे हैं.

रूसी प्रवक्ता दमित्री पेस्कोव
Reuters
रूसी प्रवक्ता दमित्री पेस्कोव

रूस से लोगों के बाहर जाने का सिलसिला

ख़ास कर वो लोग देश से बाहर जा रहे थे जो 2014 में क्राइमिया को रूस की ओर से मिला लेने के क़दम से असहमत थे.

वो रूस के उन नियमों से भी नाराज़ थे, जिनमें सत्ता से असहमत लोगों को दंडित करना आसान हो गया था.

रूस से बाहर गए कई लोग बाल्टिक, यूरोपियन यूनियन के देशों और जॉर्जिया जैसे देशों में चले गए थे.

लेकिन स्वेतलाना के लिए 2022 में यूक्रेन पर रूस का हमला एक अहम मोड़ साबित हुआ.

स्वेतलाना कहती हैं, ’’जब युद्ध शुरू हुआ तो मुझे लगा कि ये जल्दी ख़त्म नहीं होगा. ये भी कि लोग विरोध करने सामने नहीं आएंगे.

मैंने भावुक और तार्किक दोनों तरह से सोचने के बाद तय किया कि यहां से निकलना ही ठीक है.’’

स्वेतलाना अब सर्बिया की राजधानी बेलग्रेड में हैं.

वो कहती हैं, '’मैं ख़ुद को जितना संभव हो सके अधिकारियों से बहुत ज्यादा बनाए रखना चाहती थी’’

कई रूसी स्वेतलाना की तरह ही सोच रहे हैं. पहले पलायन करने वाले थोड़े से लोग थे लेकिन अब उनकी संख्या ज़्यादा हो गई है.

रूस छोड़ कर जा रहे लोग
Getty Images
रूस छोड़ कर जा रहे लोग

रूस से भागने वालों की पहली लहर

रूस से बाहर जाने वालों की पहली लहर मार्च-अप्रैल में आई थी.

रूस से पहले पहल भागने वालों ने बीबीसी को बताया था कि वो युद्ध के ख़िलाफ़ हैं. वो इस बात से भी निराश थे कि रूसी लोग इस युद्ध के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन क्यों नहीं कर रहे हैं.

अलग-थलग महसूस करने और युद्ध के जोखिमों को देखते हुए उन्होंने रूस से बाहर जाना बेहतर समझा.

ऐसी कई रिपोर्टें आईं जिनमें कहा गया था कि नए रंगरूटों को ख़राब ट्रेनिंग और ऐसी किट्स दी गईं जो युद्ध के ख़तरों को देखते हुए पर्याप्त नहीं थीं.

युद्ध शुरू होने के बाद रूस के लोगों और उनके परिवारों ने झुंड के झुंड वहां से निकलना शुरू कर दिया. जॉर्जिया और कज़ाखस्तान से लगी रूसी सीमाओं पर लोगों की लाइन लग गई.

रूसी राष्ट्रपति के आधिकारिक प्रवक्ता दमित्री पेस्कोव ने इस बात से इनकार किया है कि लोग समूहों में घर छोड़ कर जा रहे हैं.

अप्रैल ने रूसी अधिकारियों ने 'ऑनलाइन कॉल-अप’ शुरू की. इसमें नए रंगरूटों के नाम एक डिज़िटल रजिस्टर में जोड़े जा सकते थे.

उन्हें कागज नहीं दिए जाते थे. नया सिस्टम लोगों को बाहर जाने से रोकने के लिए डिजाइन किया गया था.

युद्ध के ख़िलाफ़ प्रदर्शन के ख़िलाफ़ कार्रवाई
AFP
युद्ध के ख़िलाफ़ प्रदर्शन के ख़िलाफ़ कार्रवाई

कितने लोगों ने रूस छोड़ा, कहाँ गए?

इस बात का कोई सटीक आँकड़ा नहीं है कि कितने लोग रूस छोड़ कर जा चुके हैं लेकिन आंकड़ों के मुताबिक़ एक लाख से लेकर दस-बीस लाख से अधिक लोग घर छोड़ कर जा चुके हैं.

रूसी रक्षा मंत्रालय ने मई में बताया था कि 2022 में 13 लाख रूस छोड़ कर जा चुके थे.

कई सूत्रों ने लोगों के पलायन के इस ट्रेंड की पुष्टि की है.

फोर्ब्स मैगजीन ने रूस के अंदर अलग-अलग विभागों मे काम करने वाले अधिकारियों के हवाले से बताया है कि 2022 में छह से दस लाख लोग देश छोड़ कर चले गए.

'द बेल’ और 'आरटीवीआई’ (रूस के दो स्वतंत्र मीडिया आउटलेट) ने भी इस बारे में तुलनात्मक आंकड़े प्रकाशित किए थे.

अगर आपके पास पैसा है आपको सेना में सेवा देने के लिए नहीं बुलाया गया है कि रूस छोड़ना तुलनात्मक तौर पर आसान है.

लेकिन रहने के लिए कोई स्थायी ठिकाना ढूंढना मुश्किल है.

युद्ध शुरू होने के बाद ही कई देश खास कर यूरोपीय यूनियन के देशों और अमेरिका ने रूसी के लिए वीज़ा आवेदन की प्रक्रिया मुश्किल कर दी थी.

जिन लोगों का परिवार इन देशों में नहीं था या जो लोग वहां नौकरी नहीं कर रहे थे, उनके लिए वीज़ा हासिल करना मुश्किल हो गया था.

रूस में सेना में भर्ती होने का विज्ञापन
Getty Images
रूस में सेना में भर्ती होने का विज्ञापन

वीज़ा और वर्क परमिट के लिए जद्दोज़हद

जॉर्जिया और आर्मीनिया जैसे देशों में इस तरह की पाबंदियां नहीं थीं. यहां रूसी कभी भी आ-जा सकते थे. आज भी यही हालात हैं.

कज़ाख़स्तान समेत कुछ देशों ने इस साल रूसी लोगों को आता देख अपने नियम बदल दिए थे. इन देशों ने अब इस संबंध में नियम बनाए हैं कि रूसी लोग यहां कितने दिन रह सकते हैं.

फ़िलहाल जिन लोगों को लौटने की संभावना नहीं दिख रही उन्हें उन देशों में रहने के लिए औपचारिक तौर पर आवेदन देना पड़ रहा है, जहां वे ठहरे हुए हैं.

हालांकि कई लोग यहीं से रूस में काम कर रही कंपनियों के लिए काम कर रहे हैं.

हमें पता चला है कि पिछले 15 महीनों के दौरान यूरोपियन यूनियन, बाल्कन, कॉकेसस और मध्य एशियाई देशों में 1,55,000 लोगों को अस्थायी रेजिडेंस परमिट मिल चुकी है.

यूरोपियन यूनियन एजेंसी फॉर असाइलम के आंकड़ों के मुताब़िक यूरोपियन यूनियन में राजनीतिक शरण के लिए 17 हजार लोगों ने आवेदन दिया था और इनमें से 2000 को ये मिल भी चुकी है.

रूसी गृह मंत्रालय के मुताबिक़ पिछले तीन साल की तुलना में 40 फीसदी अधिक लोगों ने विदेश जाने के लिए पासपोर्ट आवेदन भेजा है.

रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद हमने रूस छोड़ने वाले दर्जनों लोगों से बात की है.

रूस से पलायन
Getty Images
रूस से पलायन

रूस के बाहर जा रहे हैं, पढ़े-लिखे और पेशेवर लोग

ये अलग-अलग पेशे के लोग हैं. कुछ हमारी तरह ही पत्रकार हैं.

लेकिन आईटी एक्सपर्ट्स, डिजाइनर,आर्टिस्ट, एकेडेमिक, वकील, डॉक्टर और पीआर स्पेशलिस्ट्स और भाषा के जानकार भी इनमें शामिल हैं. ज्यादातर की उम्र 50 साल से कम है.

इनमें से कई पश्चिमी उदारवादी मूल्यों के समर्थक हैं और उम्मीद करते हैं के रूस एक न एक दिन लोकतांत्रिक देश बन जाएगा. इनमें से कुछ एलजीबीटीक्यू+ समुदाय से जुड़े लोग हैं.

समाजशास्त्री फ़िलहाल रूसी आप्रवास के मौजूदा ट्रेंड का अध्ययन कर रहे हैं.

वो बताते हैं कि इस बात के सुबूत हैं कि जो लोग बाहर जा रहे हैं, वो उन लोगों से ज़्यादा युवा, ज़्यादा शिक्षित और ज़्यादा अमीर हैं, जो फ़िलहाल रूस में बने हुए हैं. ऐसे ज्यादातर लोग बड़े शहरों के रहने वाले हैं.

थॉमस सेंट्स पीटर्सबर्ग से हैं.

वो कहते हैं, ’’मैं शांतिवादी हूं. मैं इस विचार से ही आतंकित हूं कि कोई मुझे किसी की हत्या करने के लिए भेजे. मैं 2014 से यूक्रेन के प्रति रूस की नीतियों के ख़िलाफ़ रहा हूं. हमला और नागरिकों की हत्या किसी भी स्थिति में मंज़ूर नहीं की जा सकती.’’

एक समलिंगी पुरुष के तौर पर वो अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं.

थॉमस ने स्वीडन में राजनीतिक शरण के लिए आवेदन दिया है.

उन्होंने अधिकारियों को समझाने की कोशिश की है क्यों रूस लौटना उनके लिए ख़तरनाक साबित हो सकता है. उनके आवेदन को ख़ारिज कर दिया गया है लेकिन उन्होंने इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील की है.

'’एक सप्ताह बाद हम सब दोस्त इकट्ठा हुए और यहां से बाहर जाने का फैसला कर लिया’’.

रूस और फिनलैंड के बॉर्डर पर खड़े रूस के लोग
BBC
रूस और फिनलैंड के बॉर्डर पर खड़े रूस के लोग

रूस से बाहर भागे लोग क्या कह रहे हैं?

सर्गेई ने कहा, '’युद्ध शुरू होते ही हमने यूक्रेन की ओर मिलिट्री किट ले जाए जाते देखा. घायलों से अस्पताल भरे पड़े थे. रोस्तोव एयरपोर्ट को सिविलियन फ्लाइट्स के लिए बंद कर दिया था. हालांकि वे कई विमान थे लेकिन हमें पता था कि वे कहां जा रहे हैं.’’

सितंबर में पुतिन की ओर से सेना को नए सिरे से भाषण दिए गए भाषण के बाद सर्गेई की मां ने उन्हें अपना सामान बांध कर वहां से निकलने को कहा.

जबकि कुछ दिनों पहले ही उनकी मां ने कहा था कि सर्गेई देशभक्ति नहीं दिखा रहे हैं. सर्गेई सारी रात सफ़र कर जॉर्जिया पहुंचे. वो अब यहीं रह रहे हैं.

सर्गेई बताते हैं, '’मेरी पत्नी और बच्चे अभी भी रूस में हैं. मुझे उनका वहां का भी खर्च भी उठाना पड़ा रहा और यहां भी मैं खर्च कर रहा हूं. मैं दो नौकरी कर रहा हूं. रूस की कंपनी के यहीं से काम कर रहा हूं. यहां भी एक दोस्त के छोटे कारोबार के लिए काम कर रहा हूं.’’

वो कहते हैं, ’’मैं अपने परिवार को रूस से निकालने के लिए पैसे इकट्ठा कर रहा हूं.’’

उनकी पत्नी पहले बाहर रूस के दक्षिणी शहर रोस्तोव-ऑन-दोन के रहने वाले सर्गेई का कहना है कि दिक्क़तें अब दूसरी हैं.

वो फ़िलहाल जॉर्जिया में हैं. जिस दिन रूस ने यूक्रेन पर हमला किया उस दिन उन्होंने अपने कई दोस्तों को फोन किया. और सब ने युद्ध को बुरी ख़बर बताया.’’

वो कहते हैं, '’हुआ ये कि युद्ध शुरू होते अर्थव्यवस्था में गिरावट शुरू हो गई.’’

जाने के लिए तैयार नहीं थीं लेकिन अब उन्हें लगता है कि जिंदगी कहीं बाहर तलाशने का समय आ गया है.’’

युद्ध के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करते रूसी लोग
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युद्ध के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करते रूसी लोग

रूस के लिए इसका क्या मतलब है?

रूसी अधिकारियों ने रूस के लोगों के पलायन से पड़ने वाले असर को नजरअंदाज़ करने की कोशिश की है.

हज़ारों पढ़े-लिखे और अमीर रूसियों के बाहर जाने के असर को कम करके दिखाने की कोशिश कर रहे हैं. इस पलायन का अर्थव्यवस्था पर असर साफ़ दिख रहा है.

रूस का सबसे बड़ा बैंक, अल्फा बैंक का आकलन है कि रूस में काम करने वाले लोगों का 1.5 फीसदी हिस्सा बाहर जा चुका है. जो लोग देश छोड़ कर गए हैं वो उच्च दक्षता वाले पेशेवर लोग हैं.

कंपनियां कर्मचारियों की कमी की शिकायत कर रही हैं. उनका कहना है कि उन्हें भर्तियों में दिक्कतें आ रही हैं.

रूस के केंद्रीय बैंक ने बताया है कि युद्ध के शुरुआती दो चरणों में रूसी अपने खातों से 1.2 ट्रिलियन रूबल ( 15 अरब डॉलर) निकाल लिए थे. 2008 के वित्तीय संकट के बाद रूस में ऐसा संकट नहीं दिखा था.

रशा नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस के अर्थशास्त्री सर्गेई स्मिरनोव का कहना है कि अभी का रुझान तो यही है कि पढ़े-लिखे और अपने काम में दक्ष लोग देश छोड़ने का रास्ता तलाश रहे हैं.

वो कहते हैं, '’अब यहां कार या जूतों की मरम्मत करने वाले लोगों की मांग ज्यादा होने वाली है. मैं ये तो नहीं कहता कि कयामत आ जाएगी लेकिन इस हालात से रूस में समय के साथ उत्पादकता कम हो जाएगी.’’

उनका कहना है कि ये रुझान बड़े शहरों को ज्यादा प्रभावित करेगी. मॉस्को, सेंट पीटर्सबर्ग और येकतेरिनबर्ग जैसे शहरों को यह संकट ज्यादा परेशान करेगा’’

पुतिन
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पुतिन

रूसी अर्थव्यवस्था को नुकसान

सर्गेई स्मिरनोव कहते हैं, '’ रूस के ज्यादातर हिस्से में लोगों को भले ही इस हालात का अहसास न हो क्योंकि छोटे शहरों और गांवों में जीवनस्तर उतना ऊंचा नहीं है और आगे भी यहां ऐसे ही हालात रहने वाले हैं.’’

इस बीच, बेलग्रेड में रहने वाली स्वेतलाना का रूस लौटने का कोई इरादा नहीं है.

वो कहती हैं,’’ मैं फ़िलहाल मोल्डोवा के स्टार्ट-अप में काम कर रही है. लेकिन मैंने हाल में नीदरलैंड में नौकरी के लिए आवेदन दिया है.’’

तिबलिसी में रह रहे सर्गेई भी यूरोप में नौकरी के लिए आवेदन दे रहे हैं. लेकिन फ़िलहाल उनकी ज़िंदगी कठिन है.

वो कहते हैं, '’मेरे पास कोई साप्ताहिक छुट्टी नहीं होती. कभी-कभी तो मैं रात में पूरी नींद भी नहीं ले पाता हूं. मैं तो अब कार में ही झपकी ले लेता हूं.’’

फ़िलहाल स्वीडन में रहने वाले थॉमस को उम्मीद है कि उन्हें जबरदस्ती रूस नहीं भेजा जाएगा क्योंकि वहां समलैंगिकों के साथ दुर्व्यवहार होने का डर है. फ़िलहाल वो स्वीडिश सीखने की कोशिश कर रहे हैं ताकि कोई भी काम मिल जाए.

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