कौन हैं Vidyut Mohan? जिनके आविष्कार से है दिल्ली का प्रदूषण दूर होने की आस,ग्लासगो में पीएम मोदी से मिले थे
ग्लासगो, 7 नवंबर: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हाल ही में जब जलवायु परिवर्तन पर आयोजित सम्मेलन में शिरकत करने के लिए स्कॉटलैंड पहुंचे थे तो वहां उनकी मुलाकात एक युवा भारतीय उद्यमी से हुई थी, जो आज दुनियाभर में प्रदूषण नियंत्रण का उपकरण विकसित करने के लिए चर्चित हो चुके हैं। वह युवा भारतीय उद्यमी हैं विद्युत मोहन। पेशे से इंजीनियर मोहन ने एक ऐसा आविष्कार किया है, जिसने आने वाले समय में खासकर दिल्ली-एनसीआर को प्रदूषण मुक्त बनाने की उम्मीद बढ़ा दी है। आमतौर पर नवंबर ही वह महीना है, जब राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में अपने इलाकों से लेकर पड़ोसी राज्यों में खासकर पराली जलाने की घटनाओं के चलते सांस लेना दूभर हो जाता है। लेकिन, विद्युत मोहन का आविष्कार अगर बड़े पैमाने पर धरातल पर उतर पाया तो आने वाले वर्षों में इस समस्या का हमेशा के लिए समाधान मिल सकता है।

98% तक कार्बन उत्सर्जन कम करने वाली मशीन बनाई
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब हाल ही में सीओपी26 समिट के लिए स्कॉटलैंड की राजधानी ग्लासगो में थे तो वे युवा उद्यमी और इंजीनियर विद्युत मोहन से मिलने की अपनी इच्छा दबा नहीं पाए। भारत के विद्युत मोहन ने एक प्रोटेबल और किफायती उपकरण का आविष्कार किया है, जिसके बारे में माना जा रहा है कि वह वायु प्रदूषण की समस्या दूर करने में बड़ी भूमिका निभा सकता है। संयुक्त राष्ट्र की ओर से आयोजित क्लाइमेट चेंज समिट के लिए पीएम मोदी जब दो दिवसीय दौर पर ग्लासगो पहुंचे तो उनकी वहां दिल्ली के इस मेकेनिकल इंजीनियर से भी थोड़ी देर के लिए मुलाकत हुई थी। विद्युत मोहन ने जो मशीन बनाई है, उसकी मदद से 98% तक कार्बन उत्सर्जन को कम किया जा सकता है।

कौन हैं विद्युत मोहन ?
विद्युत मोहन ने वायु प्रदूषण की समस्या दूर करने के लिए एक ऐसा उपकरण विकसित किया है, जो ट्रैक्टर पर लगाया जा सकता है और इसके जरिए कृषि से पैदा हुए कई टन कचरे को ऊर्जा और उर्वरक में तब्दील किया जा सकता है। यह उपकरण धान की पराली और नारियल के शेल को ऊर्जा में बदलने में सक्षम है। यह मशीन कॉफी रोस्टर के सिद्धांत पर काम करता है। इससे बनने वाले ईंधन, उर्वरकों और बाकी उत्पादों को फिर से खेती के काम में लाया जा सकता है। मोहन दिल्ली में ही पले-बढ़े हैं।

वायु प्रदूषण रोकने वाला उपकरण बनाने की प्रेरणा कैसे मिली ?
कुछ साल पहले तक की बात है। 30 साल के युवा उद्यमी विद्युत मोहन और उनकी दादी दिल्ली की प्रदूषित हवा की चपेट में आकर अक्सर बीमार हो जाते थे। उन्होंने फैसला किया कि वह हवा को स्वच्छ बनाने के लिए काम करेंगे और आज वह अपने बनाए हुए उपकरण की वजह से अर्थशॉट पुरस्कार जीत चुके हैं। मोहन ने अपने अनोखे उपकरण को उत्तराखंड में तैयार किया था, जिसकी टेस्टिंग कई जगहों पर हो चुकी है। जलवायु परिवर्तन का भयानक संकट झेल रही दुनिया में मोहन के आविष्कार को इसलिए भी सराहा जा रहा है, क्योंकि उनका उपकरण न सिर्फ हवा की गुणवत्ता में सुधार कर सकता है, बल्कि उसमें रोजगार पैदा करने की भी बड़ी संभावना है।

पीएम मोदी से मुलाकात में क्या हुआ ?
विद्युत मोहन टकाचार डॉट कॉम के भी संस्थापक हैं। पीएम मोदी से मुलाकात के बाद उन्हें उम्मीद है कि सरकार के साथ साझीदारी होने से उनका आविष्कार बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो सकता है। उन्होंने कहा है, 'पीएम मोदी से मेरी मुलाकात बहुत छोटी थी, सिर्फ दो मिनट की। इतने देर में ही उनमें इस मशीन के बारे में जानने की बहुत ज्यादा उत्सुकता थी कि यह कैसे काम करता है, किसानों को कैसे मिलता है, खासकर यह जानना चाहते थे कि हम इसे कहां और कैसे बना रहे हैं। वे बहुत ही ज्यादा उत्सुक थे।' उनका लक्ष्य इस आविष्कार को आगे तक ले जाना है, लेकिन उन्हें लगता है कि बिना सरकार के सहयोग के यह संभव नहीं है।

हर साल निकलता है 12,000 डॉलर का कृषि कचरा
दुनियाभर में हर साल खेती के बाद जो बेकार की चीजें रह जाती हैं, उनकी कीमत 12,000 डॉलर होती है। भारत के कई इलाकों में यह माना जाता है कि एक फसल के बाद जो कृषि से बचा कचरा रह जाता है उसे जलाने में ही सबसे ज्यादा भलाई है, ताकि नए फसल के लिए जमीन को तैयार किया जा सके। हालांकि, देश के कई इलाकों में धान की पराली जलाने की जगह उनका बखूबी इस्तेमाल करने की परंपरा सदियों से अपनाई जा रही है। लेकिन, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और पश्चिमी यूपी में धान की पराली जलाना सरकार और पर्यावरण विशेषज्ञों के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है और यह स्वास्थ्य संकट के इजाफे का बहुत बड़ा कारण बनता जा रहा है।

वायु प्रदूषण से हर साल 70 लाख लोगों की होती है मौत
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक खेतों में कृषि से बचे अपशिष्ट जलाने की वजह से जो वायु प्रदूषण होता है, उससे सालाना 70 लाख लोगों की मौत हो जाती है। यह ब्लैक कार्बन उत्सर्जन का बहुत बड़ा कारण है, जो न सिर्फ इंसान की स्वास्थ्य के लिए जानलेवा साबित हो रहा है, बल्कि हिमालय के ग्लेशियर पिघलने की भी बहुत बड़ी वजह बनता जा रहा है। भारत ने सीओपी26 समिट में 2070 तक नेट-जीरो का संकल्प जताया है; और इसमें मोहन जैसे लोगों के आविष्कारों की मदद से हवा में कार्बन उत्सर्ज कम करने में बहुत अधिक मदद मिल सकती है।(विद्युत मोहन की तस्वीर-फेसबुक वीडियो के सौजन्य से)












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