IS-खुरासान क्या है ? जिसने काबुल एयरपोर्ट पर मचाया कोहराम

काबुल, 27 अगस्त: कई लोगों को जो डर लग रहा था, गुरुवार को काबुल एयरपोर्ट पर वैसी ही भयावह वारदात हो गई। हामिद करजई इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर हुए कई धमाकों में कितने ही लोगों की जान चली गई और कई जख्मी हालत में अस्पताल पहुंचाए गए। इस तरह के आत्मघाती आतंकी हमले की आशंका कुछ पश्चिमी खुफिया एजेंसियों ने पहले से ही जाहिर कर रखी थी। इस हमले की जिम्मेदारी एक आतंकी संगठन 'इस्लामिक स्टेट' ने ली है, जो दुनिया में आईएसआईएस-खुरासान के नाम से कुख्यात है। इस आतंकी संगठन ने अपने नाम को खुरासान प्रांत पर रखा है, जिसके मंसूबे में अफगानिस्तान के अलावा भी कई देश शामिल हैं। अहम बात ये है कि अफगानिस्तान छोड़कर जा रहे अमेरिका और काबुल पर कब्जा करने वाले आतंकी संगठन तालिबान दोनों ने भी इस घटना को आतंकी हमला कहा है।

क्या है आईएस-खुरासान ?

क्या है आईएस-खुरासान ?

आईएस- खुरासान कुख्यात इस्लामिक स्टेट इराक और सीरिया का ही अंग है, जिसमें पाकिस्तान और अफगानिस्तान के आतंकवादी शामिल हैं। यह संगठन मुख्य रूप से पाकिस्तान में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के युवाओं के सशस्त्र ग्रुप के रूप में पैदा हुआ था। बाद में इसके आतंकी अफगानिस्तान भाग गए और 2014 में इस्लामिक स्टेट और उसके सरगना अबू बकर बगदादी के इशारों पर काम करने लगे। बगदादी 2015 में मारा गया। इस वक्त यह मूल रूप से अफगानिस्तान के नांगरहार प्रांत से संचालित होता है, जो पाकिस्तान से सटे इलाके में है। जब तालिबान का सरगना मुल्ला उमर मर गया तो उसके कई खूंखार आतंकी भी आईएस- खुरासान के सदस्य बन गए और इस तरह से इसका तालिबान से भी नजदीकी रिश्ता है, लेकिन आज की तारीख में इसे अपने मूल संगठनों से भी ज्यादा खतरनाक माना जाता है।

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    क्या चाहता है आईएस- खुरासान ?

    क्या चाहता है आईएस- खुरासान ?

    खुरासान एक फारसी शब्द है, जिसका मतलब है वह इलाका जहां सूरज निकलता है। आईएस- खुरासान का इरादा खुरासान देश बनाना है, जिसका दायरा बहुत ही विशाल है। दरअसल, तीसरी या चौथी शताब्दी में जो लोग अरब से निकलकर मौजूदा ईरान के इलाके में पहुंचे थे और जहां पर आबाद हुए थे, उसे ही खुरासान कहा जाने लगा। लेकिन, अगर इस्लामिक स्टेट-खुरासान के आतंकियों की ओर से तैयार आज के नक्शे की बात करें तो इसमें भारत के बहुत बड़े इलाके के इलावा पाकिसातन, अफगानिस्तान, ईरान, उज्बेकिस्तान, किर्गिस्तान, कजाकिस्तान और करीब-करीब आधा चीन भी आता है। वहीं इसमें जम्मू-कश्मीर से लेकर गुजरात तक के भारतीय इलाके को भी शामिल किया गया है, जिसमें हरियाणा, पंजाब और राजस्थान भी शामिल हैं। यानी यह आतंकी संगठन इन सभी देशों में इस्लामिक सत्ता कायम करने का इरादा रखते हैं।

    तालिबान- आईएस- खुरासान की जिहादी विचारधारा में अंतर

    तालिबान- आईएस- खुरासान की जिहादी विचारधारा में अंतर

    वैसे तो तालिबान और आईएस- खुरासान दोनों ही खूंखार जिहादी संगठन हैं, लेकिन इस समय दोनों की विचारधाराओं में थोड़ा अंतर आया है। जहां आईएस- खुरासान इस्लाम के सलाफिस्ट मूवमेंट से जुड़ा है, वहीं तालिबान की विचारधारा देवबंदी विचारों से प्रभावित है। जहां तालिबान कम से कम फिलहाल के लिए खुद को अफगानिस्तान तक ही सीमित रखने की बात करता है, वहीं इस्लामिक स्टेट पूरे दक्षिण और मध्य एशिया में अपना प्रभाव कायम करना चाहता है और दुनियाभर में गैर-मुस्लिमों के खिलाफ जिहाद चलाने का दम भरता है। दोनों आतंकी संगठनों में शरिया कानून और उसकी व्याख्या को लेकर भी मतभेद है। इस्लामिक स्टेट के नजरिए से तालिबान का नजरिया शरिया कानून को लेकर उतना सख्त नहीं है। इस्लामिक स्टेट के आतंकी तालिबान को खराब मुसलमान मानने लगे हैं, क्योंकि उसने अमेरिका के साथ शांति समझौते के लिए बातचीत की है। इस्लामिक स्टेट की नजर में यह जिहाद के लक्ष्य के साथ धोखाधड़ी है।

    तालिबान और आईएस-खुरासान में हो चुकी है दुश्मनी

    तालिबान और आईएस-खुरासान में हो चुकी है दुश्मनी

    जब तालिबान ने काबुल पर कब्जा किया तो पाकिस्तान समेत दुनिया भर में सक्रिय जिहादी संगठनों ने उसे बधाइयां दीं, लेकिन इस्लामिक स्टेट ने ऐसा नहीं किया। बल्कि, आईएस-खुरासान ने तो तालिबान के खिलाफ जंग जारी रखने का ऐलान कर दिया। हकीकत ये है कि उत्तर-पूर्वी अफगानिस्तान से आईएस को भगाने के लिए तालिबान के आतंकियों ने अमेरिका और अफगान सरकार के सुरक्षा बलों का भी साथ दिया था। आईएस को भरोसा है कि अमेरिका से शांति समझौते से तालिबान के जो आतंकी खुश नहीं हैं, वह उसके संगठन में ही शामिल होंगे। इसके अलावा उसे सीरिया, इराक और दूसरे इलाकों से भी आतंकियों से मदद पहुंचने की उम्मीद है। जून में संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट आई थी,जिसके मुताबिक अफगानिस्तान में 8,000 से 10,000 विदेशी आतंकी मौजूद थे। आईएस-के ने तालिबान के खिलाफ पहली बार 2017 में हथियार उठाया था और उसे तोरा-बोरा के पहाड़ी इलाकों से खदेड़ दिया था। यह वही इलाका है, जहां की गुफाओं में अल-कायदा का सरगना ओसामा बिन लादेन ने तब पनाह ली थी, जब वह 11 सितंबार, 2001 की घटना को अंजाम देकर भागता फिर रहा था और पाकिस्तान में सुरक्षित ठिकाना मिलने का इंतजार कर रहा था।

    अमेरिका के लिए भी कट्टर दुश्मन है इस्लामिक स्टेट-खुरासान

    अमेरिका के लिए भी कट्टर दुश्मन है इस्लामिक स्टेट-खुरासान

    कुछ साल पहले की बात है, जब तालिबान कमजोर पड़ रहा था तो अमेरिका ने आईएस-खुरासान को उससे भी बड़ा खतरा मानकर एयरस्ट्राइक शुरू कर दिया था। अमेरिकी कार्रवाई की वजह से कुछ साल पहले तक इसके कुछ सैकड़े आतंकी ही बच गए थे। 13 अप्रैल 2017 को तो उसने इसके मुख्य ठिकाने पर सबसे बड़ा बम (मदर ऑफ ऑल बम) गिरा दिया था। लेकिन, इसके बावजूद यह संगठन खत्म नहीं हुआ और उसने जल्द ही अपनी ताकत बढ़ा ली और पिछले साल शिहाब अल-मुहाजिर को अपना नेता घोषित कर दिया।

    आईएस-खुरासान को तालिबान से भी खतरनाक क्यों कहते हैं ?

    आईएस-खुरासान को तालिबान से भी खतरनाक क्यों कहते हैं ?

    आईएस-खुरासान ऐसा आतंकी संगठन है, जिसे गर्भवती महिलाओं और नवजात बच्चों के कत्लेआम में भी आनंद आता है, अगर उसे लगता है कि इससे उसके जिहाद का मकसद पूरा हो रहा है। एकबार उसने एक महिला अस्पताल पर हमला कर दिया था, जिसमें 20 से ज्यादा महिलाओं और नवजात शिशुओं की मौत हो गई थी। अस्पताल में वैसी महिलाएं भी भर्ती थीं जो कुछ ही वक्त में मां बनने वाली थीं। आईएस-खुरासान को लगता है कि तालिबान जो कुछ कर रहा है वह इस्लाम या जिहाद के लिए काफी नहीं है। तालिबान तो कम से कम कहने के लिए ही राजनीतिक चोला पहनने की कोशिश करता दिखा रहा है, लेकिन आईएस-खुरासान का मकसद कहीं ज्यादा खतरनाक है। इसलिए फिलहाल तालिबान तो सिर्फ अफगानिस्तान के लिए खतरा है, लेकिन खुरासान दुनिया की सारी मानवता के लिए संकट पैदा कर रहा है।

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