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US elections results Analysis: भारत के लिए डोनाल्ड ट्रंप 2.0 से सबसे बड़ा खतरा क्या होगा?

US elections results: अमेरिकी राष्ट्रपति पद की रेस कमला हैरिस और डोनाल्ड ट्रंप के बीच है। यदि उप-राष्ट्रपति कमला हैरिस जीतती हैं, तो कई सेक्टर्स में निवर्तमान बाइडेन प्रशासन के साथ उनकी नीति में निरंतरता देखी जा सकती है। लेकिन, व्हाइट हाउस में ट्रंप की वापसी कई मायनों में परेशान करने वाला हो सकता है

खासकर भारत के लिए, व्यापार और ट्रेड पॉलिसी पर प्रभाव सबसे ज्यादा होने की संभावना है।

US elections results Analysis

अपने चुनावी कैम्पेन के दौरान ट्रंप ने भारत को "बहुत बड़ा (व्यापार) दुर्व्यवहार करने वाला" करार दिया, जो यह सुझाव देता है कि वह अपने पहले कार्यकाल के व्यापार तनाव को नये सिरे से शुरू कर सकते हैं, भारत, जो अमेरिका में 75 अरब डॉलर से ज्यादा के सामानों का निर्यात करता है, उसपर उच्च टैरिफ लगा सकते हैं।

ट्रम्प 1.0 (2017-21) के संरक्षणवाद और व्यापार अलगाववाद की ओर झुकाव, बाइडेन प्रशासन के दौरान भी पलटा नहीं गया। ट्रंप ने विश्व व्यापार संगठन (WTO) विवाद समाधान प्रक्रिया को ब्लॉक कर दिया था और भारत सहित प्रमुख व्यापार भागीदारों के साथ व्यापार संघर्ष शुरू करने के लिए युद्धकालीन व्यापार प्रावधानों को लागू किया था।

ट्रंप की वापसी से भारत के कारोबार पर होगा असर!

2019 में, भारत ने दशकों पुराने सामान्यीकृत वरीयता प्रणाली (Generalised System of Preferences- जीएसपी) कार्यक्रम के तहत बिना शुल्क के अमेरिकी बाजारों तक सामान पहुंचाने की सुविधा खो दी थी, जिससे भारतीय कारोबारियों को काफी फायदा पहुंचता था।

अमेरिका से टैरिफ फ्री कारोबार से भारत को लाभ 5.7 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया था।

बर्नस्टीन रिसर्च के मुताबिक, ट्रंप के राष्ट्रपति बनने से चीन को नुकसान होगा, लेकिन भारत के लिए लाभ "सीमित" हो सकता है, क्योंकि यह नए सिरे से टैरिफ दबाव में आ सकता है। रिसर्ट नोट में कहा गया है, कि "चीन-प्लस-वन" रणनीति गति पकड़ सकती है, लेकिन व्यापार बाधाओं के कारण होने वाली मुद्रास्फीति अपेक्षित ब्याज दर-कटौती ट्रेजेक्टरी को बाधित कर सकती है, जिससे भारत में मध्यम वर्ग की खपत प्रभावित हो सकती है।

अगर ट्रंप व्हाइट हाउस में लौटते हैं और टैरिफ में इजाफा करते हैं, अमेरिका को भारतीय दवा के निर्यात में गिरावट आ सकती है, और एच-1बी वीजा पर रुख सख्त होने की संभावना के कारण आईटी सर्विस कंपनियों के मुनाफे में कमी आ सकती है। हालांकि, टैक्स नीतियां और कॉर्पोरेट नकदी प्रवाह पर उनका प्रभाव, निगेटिव प्रभाव को संतुलित करने में मदद कर सकता है।

रिपोर्ट में कहा गया है, कि "बढ़ी हुई मुद्रास्फीति और लंबे समय तक उच्च दरों के कारण रुपये में कुल मिलाकर गिरावट देखने को मिल सकती है।"

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अमेरिका के साथ व्यापार क्यों मायने रखता है?

अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापार साझेदार है, जिसका द्विपक्षीय व्यापार वित्त वर्ष 2024 में लगभग 120 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया है - जो भारत के चीन व्यापार से थोड़ा ज्यादा है। हालांकि, चीन के विपरीत, अमेरिका के साथ भारत के व्यापार संबंध अनुकूल हैं, जो अमेरिका को विदेशी मुद्रा का एक महत्वपूर्ण स्रोत बनाता है।

निर्यात में विविधता लाने की कोशिशों के बावजूद, पिछले एक दशक में भारत की अमेरिका पर निर्भरता काफी बढ़ी है। आधिकारिक 2022-23 के आंकड़ों के अनुसार, भारत के निर्यात में अमेरिका का हिस्सा 18% है, जबकि 2010-11 में यह 10% था। अमेरिका को भारत का निर्यात बास्केट काफी अच्छी तरह से विविधतापूर्ण है, जिससे कपड़ा से लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स और इंजीनियरिंग तक के उद्योगों को लाभ होता है।

हालांकि, ट्रंप अगर टैरिफ बढ़ाते हैं, तो मुख्य रूप से उनका निशाना चीन होगा, क्योंकि चीन और अमेरिका के कारोबार में व्यापार असंतुलन बहुत बड़ा है। और अमेरिका-चीन व्यापार युद्धों का एक नया दौर भारत को लाभ पहुंचा सकता है क्योंकि इससे निवेश और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की कंपनियों के लिए चीन में रहकर काम करना मुश्किल होगा और भारत उनके लिए नया ठिकाना बन सकता है।

अमेरिका, WTO, व्यापार समझौते

पिछले कुछ वर्षों में, अमेरिका ने धीरे-धीरे खुद को उदार वैश्विक व्यापार व्यवस्था से दूर कर लिया है, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्थापित करने में उसी ने मदद की थी, खासकर तब से, जब चीन 2001 में WTO का सदस्य बन गया। चीन के प्रवेश से उम्मीदों के मुताबिक आर्थिक उदारीकरण तो नहीं हुआ, लेकिन इसने राज्य पूंजीवाद के प्रसार को बढ़ावा दिया, जिसका असर अमेरिकी नौकरी बाजारों पर पड़ा। जवाब में, अमेरिका ने नए मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) पर हस्ताक्षर करने से परहेज किया है, जबकि WTO से पूरी तरह से हटने की मांग अमेरिका में काफी तेजी से बढ़ी है।

WTO में चीन को लगाम लगाने से नाकाम रहने पर बौखलाए ट्रंप प्रशासन ने WTO में जजों की बहाली को ब्लॉक कर दिया, जिससे WTO में विवादों के समाधान का काम ही निष्क्रीय हो गया। वहीं, बाइडेन प्रशासन ने भी जजों की बहाली नहीं की, बल्कि सिर्फ आश्वासन दिया।

ट्रंप 1.0 में टैरिफ पॉलिसी का असर

अपने पहले कार्यकाल के दौरान, ट्रंप ने भारत और अन्य देशों से स्टील पर 25% और एल्युमीनियम पर 10% टैरिफ लगाने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा प्रावधानों का इस्तेमाल किया, जो मित्र देशों को निशाना न करने की प्रथा से बिल्कुस अलग था। वहीं, बाइडेन ने इन टैरिफ को हटाने के बजाय भारत और यूरोपीय संघ के साथ बातचीत करना चुना।

ट्रंप ने बार-बार भारत में बिकने वाली अमेरिकी सामानों पर उच्च टैरिफ पर अपनी निराशा व्यक्त की है, जो हार्ले-डेविडसन जैसी अमेरिकी कंपनियों को प्रभावित करता है। हार्ले-डेविडसन ने जब भारतीय बाजार में अपना बोरिया बिस्तर बांधा, तो ट्रंप गुस्सा भी हुए।

पिछले महीने एक रैली में, उन्होंने चीन, ब्राजील और भारत की आलोचना की और भारत को "टैरिफ किंग" और "व्यापार का दुरुपयोग करने वाला" देश कहा। और मौजूदा स्थिति ये है, कि भारत में औसत टैरिफ 2014 में तो 13% ही था, लेकिन अब ये बढ़कर 2022 में 18.1% हो गया, जिसके परिणामस्वरूप वियतनाम, थाईलैंड और मैक्सिको जैसे देशों की तुलना में भारतीय उद्योगों में प्रतिस्पर्धा की कमी आई। भारत ने पिछले केंद्रीय बजट में कई इनपुट वस्तुओं पर टैरिफ में कटौती की है।

भारतीय नीति निर्माताओं का तर्क है, कि अधिकांश देशों ने विकास के शुरुआती चरणों में घरेलू उद्योग की रक्षा के लिए उच्च टैरिफ दीवारें खड़ी कीं, और भारत मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के मामले में अलग नहीं है।

भारत सरकार ने 14 प्राथमिकता वाले क्षेत्रों के लिए उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI) योजनाएं शुरू की हैं, और स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए टैरिफ का उपयोग करती है। कई स्वच्छ ऊर्जा विनिर्माण क्षेत्रों को चीनी उत्पादों से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। बाइडेन के शासन में भी अमेरिकी संरक्षणवाद बढ़ा। अनुचित व्यापार प्रथाओं का हवाला देते हुए, अमेरिका ने इस साल की शुरुआत में चीनी इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) पर टैरिफ 25% से बढ़ाकर 100% कर दिया है। कुछ स्टील और एल्युमीनियम उत्पादों पर टैरिफ 0-7.5% से बढ़कर 25% हो गया। इन बढ़ोतरी का भारत पर सीधा असर नहीं पड़ा, लेकिन टैरिफ लागू होने से पहले अमेरिका में चीनी शिपमेंट की बढ़ोतरी के कारण कंटेनर की कमी हो गई।

ट्रंप की वापसी से बढ़ेगी महंगाई?

शोध संगठन पीटरसन इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल इकोनॉमिक्स ने पिछले महीने भविष्यवाणी की थी, कि ट्रंप की नीतियां - निर्वासन, आयात कर, और फेडरल रिजर्व की स्वतंत्रता को कम करने के प्रयास - उपभोक्ता कीमतों को काफी हद तक बढ़ा देंगे।

पीटरसन विश्लेषण के अनुसार, मुद्रास्फीति, जिसके साल 2026 में 1.9 प्रतिशत के आसपास रहने की संभावना है, ट्रंप की वापसी से वो 6% से 9.3% के बीच बढ़ सकती है।

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