Turkey Election: तुर्की में अगले हफ्ते डाले जाएंगे वोट, राष्ट्रपति अर्दोआन या विपक्षी महागठबंधन... कौन जीतेगा?

तुर्की में छह विपक्षी दल, जिन्हें "टेबल ऑफ सिक्स" कहा जाता है, वो मई में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव से पहले राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन के खिलाफ एकजुट हैं। ये एक तरह का महागठबंधन की तरह ही है, जैसा भारत में होता है।

Turkey Election 2023

Turkey Election 2023: तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन अभी तक की सबसे कठिन राजनीतिक चुनौती का सामना करना कर रहे हैं और अगले हफ्ते जब देश की जनता मतदान करने के लिए अपने घरों से निकलेगी, तो उसके मन में अर्दोआन के 20 साल के कार्यकाल का हिसाब किताब जरूर होगा।

वहीं, विपक्ष ने राष्ट्रपति अर्दोआन को हराने के लिए 6 पार्टियों के साथ मिलकर महागठबंधन कर रखा है, जिसके पास अर्दोआन की सत्ता को समाप्त करने और सरकार बनाने का अच्छा मौका है।

तुर्की में 14 मई को राष्ट्रपति चुनाव होने हैं और देश की सभी राजनीतिक पार्टियों ने चुनाव में जीत हासिल करने के लिए अपनी ताकत झोंक दी है। पिछले 20 सालों से सत्ता के केन्द्र में बने राष्ट्रपति अर्दोआन अब निरंकुश हो चुके हैं, लेकिन क्या विपक्ष उनके किले को तोड़ पाएगा...इसका एक मुश्किल जवाब होने वाला है।

इसमें कोई शक नहीं, कि भारी महंगाई और करीब 50 हजार लोगों के लिए काल बने विनाशकारी भूकंप ने अर्दोआन की सत्ता को भी हिला दिया है, लेकिन अर्दोआन का मजहबी ढाल अभी भी उनके साथ है, लिहाजा जनता का मत कुछ भी हो सकता है।

तुर्की में चुनाव के दो तारीख रखे गये हैं। पहली तारीख 14 मई को, जब राष्ट्रपति और संसदीय चुनाव के लिए वोट डाले जाएंगे। यदि किसी भी उम्मीदवार को आधे से ज्यादा वोट मिल जाते हैं, तो वो विजेता माना जाएगा, लेकिन अगर ऐसा नहीं हो पाया, तो फिर 28 मई को दोबारा चुनाव किए जाएंगे।

Turkey Election 2023

अर्दोआन के हाथ में अचूक मजहबी कार्ड

अर्दोआन ने काफी हद तक धर्मनिरपेक्ष रहे तुर्की के लोगों में पिछले 20 सालों में काफी ज्यादा ध्रुवीकरण किया है और उन्होंने तुर्की को इस्लामिक खलीफा की तरह पेश किया है। उन्होंने अपने शासनकाल के दौरान सीधे तौर पर सऊदी अरब को चुनौती दी है, जिसका उन्हें पहले के चुनावों में काफी फायदा हुआ है।

मजहबी राजनीति करने के मामले में राष्ट्रपति अर्दोआन चैंपियन माने जाते हैं और उन्होंने नाटो देशों के साथ भी तुर्की के संबंध तनावपूर्ण किए हैं, जिससे तुर्की की जनता खुश भी हुई है। इसके साथ ही उन्होंने कम ब्याज दर पर घर के लिए लोन का मुहिम भी चलाया है, जो उनके पक्ष में जा सकता है।

हालांकि, दक्षिण-पूर्व तुर्की में आए भूकंप के तीन महीने बाद तुर्की में चुनाव हो रहा है, जिसमें 50,000 से अधिक लोग मारे गए थे। लिहाजा, अर्दोआन के खिलाफ लोगों में इस बात को लेकर गुस्सा है, कि सरकार बिल्डरों पर भूकंप रोधी घर बनाने को लेकर लापरवाह क्यों बनी रही।

चुनाव में राष्ट्रपति अर्दोआन को मुख्य चुनौती धर्मनिरपेक्ष रिपब्लिकन पीपुल्स पार्टी (सीएचपी) के नेता केमल किलिकडारोग्लू हैं, जिन्हें छह विपक्षी दलों के गठबंधन का समर्थन प्राप्त है। वहीं, पिछले कुछ ओपिनियन पोल में विपक्ष के नेता को राष्ट्रपति अर्दोआन पर बढ़त बनाते हुए देखा भी गया है।

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तुर्की के लिए क्या दांव पर लगा है...

मुस्तफा केमल अतातुर्क ने करीब सौ साल पहले एक आधुनिक और धर्मनिरपेक्ष तुर्की गणराज्य की स्थापना की थी, लेकिन अतातुर्क के बाद सबसे शक्तिशाली नेता बने राष्ट्रपति अर्दोआन और उनकी इस्लामिक एके पार्टी ने तुर्की को अतातुर्क के धर्मनिरपेक्ष ब्लूप्रिंट से काफी दूर कर दिया है।

इसके साथ ही राष्ट्रपति अर्दोआन ने अपने 1000 कमरों के राष्ट्रपति भवन को ही तुर्की की सरकार का सेंटर बना दिया है और उन्होंने राष्ट्रपति बनने के बाद प्रधानमंत्री के हाथों से सारी शक्तियां अपने हाथों में ली। इसके लिए उन्होंने संविधान में संशोधन कर दिए। राष्ट्रपति बनने से पहले अर्दोआन प्रधानमंत्री थे और उस वक्त तुर्की की सत्ता की चाबी प्रधानमंत्री के पास होती थी।

लेकिन, अब राष्ट्रपति के हाथ में ही देश की कार्यकारी शक्तिया हैं जो तुर्की के आर्थिक, सुरक्षा, घरेलू और विदेशी मामलों पर नीति निर्धारित करता है।

अर्दोआन के आलोचकों का कहना है, कि उनकी सरकार ने असंतोष का गला घोंट दिया है और मानवीय अधिकारों का हनन किया है, जिसने न्यायिक प्रणाली को भी अपने प्रभाव में ले लिया है। हालांकि, तुर्की के अधिकारी इन आरोपों का खंडन करते हैं और कहते हैं, कि सरकार ने देश के हित में कानून बनाए हैं और उसी का नतीजा है, कि 2016 में तख्तापलट की कोशिशों को नाकाम कर दिया गया।

दूसरी तरफ अर्दोआन जहां कम ब्याज दर पर होम लोन का ढिंढोरा पीट रहे हैं, तो अर्थशास्त्रियों का कहना है, कि इसने देश की अर्थव्यवस्था का बेड़ा गर्ग कर दिया है। इस स्कीम की वजह से देश में मुद्रास्फीति पिछले साल 85 प्रतिशत तक पहुंच गऊ, जो पिछले 24 सालों में सबसे ज्यादा है। वहीं, डॉलर के मुकाबले लीरा का वैल्यू अपने मूल्य के दसवें हिस्से तक गिर गया है।

अर्दोआन को चुनौती देने वाले केमल किलिकडारोग्लू कौन हैं?

केमल किलिकडारोग्लू को कभी भी विपक्ष का स्वाभाविक नेता नहीं माना गया था, लेकिन वह जीत हासिल करने में कामयाब रहे हैं और 14 मई को होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में छह दलों के विपक्षी गठबंधन का प्रतिनिधित्व करेंगे।

74 साल के केमल किलिकडारोग्लू एक पढ़े-लिखे पूर्व नौकरशाह हैं और उन्हें भ्रष्टाचारियों पर सख्त कार्रवाई करने के लिए जाना जाता रहा है। उनका एक उपनाम "डेमोक्रेटिक अंकल" भी है। वह 2007 से धर्मनिरपेक्ष रिपब्लिकन पीपुल्स पार्टी (सीएचपी) के अध्यक्ष हैं।

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    किलिकडारोग्लू और उनका छह दलों का विपक्षी गठबंधन, तुर्की को बदलने और इसे वापस "मजबूत संसदीय प्रणाली" में बदलने का वादा कर रहा है। वे अर्दोआन के कई संवैधानिक परिवर्तनों को फिर से पूर्ववत करना चाहते हैं, जिससे उनकी शक्ति में वृद्धि हुई है।

    6 दलों का विपक्षी गठबंधन तुर्की में फिर से संसदीय लोकतंत्र की स्थापना करने, कानून का शासन स्थापित करने, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मीडिया की स्वतंत्रता को बहाल करने के वादे के साथ चुनावी मैदान में है। इस गठबंधन का मकसद देश की संस्थाओं के अधिकारों को वापस करना है और ये शक्ति का विभाजन चाहता है।

    Turkey Election 2023

    किलिकडारोग्लू राष्ट्रपति बने तो क्या होगा?

    यदि किलिकडारोग्लू राष्ट्रपति चुने जाते हैं, को वो राष्ट्रपति के अपमान वाला कानून खत्म कर देंगे, जिसमें राष्ट्रपति का अपमान करना एक आपराधिक अपराध है। इस कानून के जरिए अर्दोआन अभी तक दर्जनों लोगों को जेल भेज चुके हैं। ये बात उन्होंने हालिया समय में DW को दिए गये इंटरव्यू में कहा है।

    किलिकडारोग्लू को इस्तांबुल के लोकप्रिय मेयर एक्रेम इमामोग्लू और उनके समान रूप से लोकप्रिय अंकारा के मेयर मंसूर यावस का भी समर्थन प्राप्त है। अगर किलिकडारोग्लू जीतते हैं, तो वो इमामोग्लू और यावस को उप राष्ट्रपति नामित करेंगे। वहीं, देश के कई प्रभावशाली कुर्द राजनेता उम्मीद करते हैं, कि तुर्की के कुर्द मतदाता, जिनकी तादाद करीब 15 से 20% के बीच हैं, वो 14 मई को होने वाले चुनाव में किलिकडारोग्लू का समर्थन करेंगे।

    अगर किलिकडारोग्लू राष्ट्रपति बनते हैं, तो तुर्की की राजनीति फिर से धर्मनिरपेक्षता की तरफ लौटना शुरू होगी, लेकिन इसके लिए 14 मई तक का इंतजार करना होगा।

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