प्रेग्नेंसी से बचने के लिए ये तरीक़े ख़ूब पसंद आ रहे

गर्भनिरोधक
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अनचाहे गर्भ से बचने के लिए गर्भनिरोधक गोलियों और कॉन्डम का इस्तेमाल किया जाता रहा है. हालांकि अब महिलाएं गर्भनिरोध के इन पुराने तरीक़ों को छोड़ नए तरीक़ों की ओर बढ़ रही हैं.

इंग्लैंड की नेशनल हेल्थ सर्विस के मुताबिक़ ज़्यादातर महिलाएं गर्भनिरोध के नए विकल्पों को आजमा रही हैं. 2007 में जहां ऐसी महिलाओं की संख्या 21% थी, वहीं 2017 में ये बढ़कर 39% हो गई.

महिलाएं अब रोज़-रोज़ गोलियां लेने और कॉन्डम के इस्तेमाल से बचना चाहती हैं. वो लंबे वक़्त तक टिकने वाले गर्भनिरोधक तरीक़े आजमा रही हैं.

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गर्भनिरोध के नए तरीक़े

लंबे समय तक टिकने वाले इन गर्भनिरोधक विकल्पों को 'लॉन्ग एक्टिंग रिवरसिबल कांट्रसेप्शन' कहा जाता है.

इन्हें गोलियों की तरह रोज़ाना लेने की ज़रूरत नहीं होती. एक बार लगवा लेने से ये लंबे समय तक असर करता है.

ये कई तरीक़े के होते हैं:

  • कॉपर कॉइल या इंट्रायूटरिन डिवाइस (आईयूडी) - ये प्लास्टिक और तांबे का उपकरण होता है जिसे महिलाओं के गर्भाशय में लगा दिया जाता है.
  • हार्मोनल कॉइल या इंट्रायूटरिन सिस्टम (आईयूएस) - ये T आकार का छोटा सा उपकरण होता है, जो एक तरह का हार्मोन छोड़ता है. इसे भी गर्भाशय में लगाया जाता है.
  • इम्प्लांट - ये भी एक तरह का मेडिकल उपकरण है जिसे महिला के हाथ में फिट किया जाता है.
  • इंजेक्शन

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गोलियां
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हालांकि 44% महिलाएं आज भी गर्भनिरोधक गोलियों का इस्तेमाल करती हैं. लेकिन ये आंकड़ा बीते दस साल में काफ़ी गिरा है.

तो क्या वजह है कि महिलाएं नए विकल्पों का रुख़ कर रही हैं?

आज गर्भनिरोध के कई विकल्प मौजूद हैं और महिलाएं लंबे समय तक टिकने वाले और हार्मोन रहित विकल्प आजमाना चाहती हैं.

डॉक्टर बताते हैं, "महिलाओं को एक दूसरे से इन विकल्पों की जानकारी मिल रही हैं. जिन महिलाओं का अनुभव अच्छा रहता है वो अपनी सहेलियों को भी ये विकल्प सुझाती हैं."

रोज़ 25 साल की हैं और स्पेन में रहती हैं. वो गोलियों के बजाय कॉइल का इस्तेमाल करने लगीं हैं. वो कहती हैं, "मैं गर्भनिरोध का एक स्थायी विकल्प चाहती थी, जिसके बारे में मुझे बार-बार न सोचना पड़े."

वहीं 27 साल की सारा कहती हैं, "गोलियों के साथ ड्रामा रहता है. कभी गोली लेना भूल जाओ तो गर्भ रहने का ख़तरा रहता है."

गर्भनिरोधक के ये नए तरीक़े लोकप्रिय होते जा रहे हैं. डॉक्टर इन्हें ज़्यादा असरदार भी मान रहे हैं.

लेकिन यौन संक्रमण से बचने का कॉन्डम ही एकमात्र विकल्प है.

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नए तरीक़े कितने असरदार?

पर्ल इंडेक्स ने गर्भनिरोध के अलग-अलग तरीक़ों के असर का पता लगाया. अगर कोई ग़लत तरीक़े से इनका इस्तेमाल करता है तो गर्भधारण की संभावना बढ़ जाती है. पर्ल इंडेक्स के मुताबिक -

  • इम्प्लांट - 2,000 में से एक के गर्भधारण की संभावना
  • आईयूएस - 500 में से एक
  • आईयूडी - 100 में से एक
  • जबकि गोलियां लेने वाली 10 औरतों में से एक के गर्भवती होने की संभावना होती है.

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गोलियों से डिप्रेशन का डर

गोलियां को लेकर सारा की एक और चिंता थी. उन्हें लगता था कि लगातार गोलियां लेने की वजह से उनके मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है.

"मुझे लगा कि गोलियों की वजह से ये सब हो रहा है. मैंने अपने डॉक्टर से पूछा तो उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं हो सकता."

बीते सालों में गोलियों से अवसाद होने के है.

2016 में एक अध्ययन किया गया था. इस अध्ययन में गोलियां लेने वाली महिलाओं और ना लेने वाली महिलाओं ने हिस्सा लिया. गोलियां लेने वाली ज़्यादातर महिलाओं में अवसाद की समस्या पाई गई. हालांकि रिसर्चरों के मुताबिक़ इसके कोई सबूत नहीं मिलते.

डॉक्टर मेनन के मुताबिक़ कई महिलाएं आईयूडी अपना रही हैं. वो अपने मानसिक स्वास्थ्य को लेकर चिंतित हैं और हार्मोन फ्री विकल्प चाहती हैं.

हालांकि फैमिली प्लानिंग असोसिएशन की मुख्य कार्यकारी अधिकारी नटिका हलिल कहती हैं कि गर्भनिरोधक को लेकर कई ग़लतफ़हमियां हैं.

वो कहती हैं, "पिछले 20-30 सालों में गर्भनिरोध के तरीक़े बेहतर हुए हैं, इसलिए इन्हें लेकर लोगों को डरने की ज़रूरत नहीं है."

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डॉक्टर हलिल कहती हैं, "गोलियां महिलाओं के लिए फ़ायदेमंद हो सकती हैं. उनकी स्किन और मूड पर इसका बुरा असर नहीं पड़ता. वहीं लॉन्ग एक्टिंग कांट्रसेप्शन हर किसी के लिए सही विकल्प नहीं है."

26 वर्षीय अलिसिया लंबे समय तक गोलियां लेती रही हैं. गोलियों के साथ उनका अनुभव भी अच्छा रहा है, लेकिन 10 साल बाद उन्होंने कम हार्मोन वाले विकल्प तलाशने शुरू किए. हालांकि हार्मोनल कॉइल उनके गर्भाशय में सही नहीं बैठी. अब वो इस कॉइल को निकलवाना चाहती हैं.

डॉक्टरों को ये सलाह दी जाती है कि वो मरीज़ों को सारे विकल्प बताए.

डॉक्टरों के मुताबिक़ गोलियों के लिए परामर्श लेने आई महिलाएं विकल्प जानने के बाद नए तरीक़ों को अपनाना पसंद करती हैं.

20 साल पहले महिलाएं डॉक्टरों से सिर्फ़ गोलियों की मांग करती थीं, लेकिन अब वो लंबे समय तक टिकने वाले नए विकल्प चुन रही हैं. ये एक बड़ा बदलाव है.

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