तब तालिबान के ड्रग स्मगलर भारत के कई राज्यों को बना देंगे ‘उड़ता पंजाब’
तब तालिबान के ड्रग स्मगलर भारत को बना देंगे ‘उड़ता पंजाब’
नई दिल्ली, 27 अगस्त: तालिबान आ गया है। आतंकवाद का सांप फिर फन काढ़ेगा। गली-गली अफीमची घूमेंगे। आतंकियों से लड़ो। तस्करों से लड़ो। क्या-क्या करेंगे ? अफगानिस्तान के पड़ोसी देश ताजिकिस्तान की फिलहाल यही सबसे बड़ी चिंता है। कोरोना संकट में देश को संभालना पहले से मुश्किल था। अब सुरक्षा के नाम खजाना और खाली होगा। इसलिए ताजिकिस्तान ने अफगानिस्तान में तालिबान के शासन को मान्यता नहीं देने का फैसला किया है। ये डर भारत को भी होना चाहिए।

भारत को क्यों डर होना चाहिए ?
उत्तर पश्चिमी कश्मीर में भारत और अफगानिस्तान के बीच 106 किलोमीटर लंबी सीमा रेखा है। चूंकि यह पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से जुड़ी है इसलिए विवादित है। अगर अफगानिस्तान में सक्रिय आतंकी और अफीम तस्कर भारत आएंगे तो यह पाकिस्तान की मिली भगत से मुमकिन होगा। पाकिस्तान तो भारत को हर तरह से तबाह करना ही चाहता है। वह यह मौका भला क्यों चूकेगा। पाकिस्तान की अफगानिस्तान के साथ करीब ढाई हजार किलोमीटर लंबी सीमा रेखा है। पाकिस्तानी ड्रग स्मगलरों ने अभी तक केवल पंजाब को नशे की गिरफ्त में लिया है। तालिबानी एजेंट ज्यादा खतरनाक हैं। अगर वे सक्रिय हुए तो भारत के अधिकतर राज्य उड़ता पंजाब बन जाएंगे। तालिबान तो नशे का सौदागर ही हैं। उसकी कुल कमाई का 60 फीसदी हिस्सा अफीम और होरोइन से प्राप्त होता है। अगर कोई सरकार ड्रग स्मगर बन जाए तो उसकी भयावहता का अंदाजा लगाया जा सकता है।

ताजिकिस्तान की चिंता
ताजिकिस्तान अफगानिस्तान के उत्तर पूर्व में अवस्थित है। ताजिकिस्तान पहले सोवियत संघ का एक गणराज्य था। यह एक मुस्लिम बहुल देश है। सोवियत संघ में साम्यवादी ढांचा ढहने के बाद यह 1991 में आजाद हुआ। 1979 में जब सोवियत संघ ने अफगानिस्तान में सैनिक हस्तक्षेप किया था तब ताजिकिस्तान ने इसका समर्थन किया था। जाहिर वह अपनी संघीय सरकार का समर्थन ही करता। लेकिन अफगानिस्तान और ताजिकिस्तान में जातीय और सांस्कृतिक समानता होने के कारण एक बहुत बड़ी समस्या शुरू हो गयी। ताजिक समुदाय को लोग ताजिकिस्तान में तो रहते ही हैं उनकी एक बड़ी आबादी अफगानिस्तान में भी बसती है। अफगानिस्तान की कुल आबादी की 27 फीसदी जनसंख्या ताजिक लोगों की है। पख्तूनों के बाद ताजिक समुदाय अफगानिस्तान का दूसरा सबसे बड़ा जातीय समूह है।

आतंकवाद झेल चुका है ताजिकिस्तान
जब तालिबान ने सोवियत समर्थक अफगान सरकार के खिलाफ जंग शुरू की तो इसमें ताजिकिस्तान के भी कुछ कट्टरपंथी शमिल हो गये। वे अफगानिस्तान के अपने ताजिक भाइयों का समर्थन करना चाहते थे। वे भी इस्लाम के समर्थक थे। तब ताजिकिस्तान में साम्यवादी सरकार थी। कुछ ताजिक कट्टरपंथी अपने देश में इस्लामी शासन की स्थापना करना चाहते थे। तलिबान ने इनको बढ़ावा दिया। 1991 में जब ताजिकिस्तान आजाद हुआ तो यहां गृह युद्ध शुरू हो गया। 1989 में सोवियत सेना जब अफगानिस्तान से लौट गया तो तालिबान की तरफ से लड़ने वाले ताजिक लड़ाके भी अपने वतन लौट आये। इसके बाद तालिबान समर्थक ताजिक, ताजिकिस्तान में इस्लामी शासन स्थापित करने के लिए संघर्ष करने लगे। 1991 से 1997 तक ताजिकिस्तान आतंकवाद और हिंसा का शिकार रहा। 1999 में जब ताजिक सरकार और इस्लामी कट्टरपंथियों में शांति समझौता हुआ तब जा कर स्थिति सामान्य हुई।

ताजिकिस्तान का दर्द
अब जब तालिबान अफगानिस्तान में फिर काबिज हो गया है तब ताजिकिस्तान का पुराना दर्द फिर अभर आया है। इसलिए ताजिकिस्तान ने अफगानिसतन की नयी सरकर को मान्यता देने के लिए शर्त रख दी है। उसका कहना है कि नयी सरकार में सभी जातीय समूहों, खास कर ताजिक समुदाय को शामिल किया जाय तभी वह तालिबान सरकर को मान्यता देगा। ताजिकिस्तान आतंकवाद के अलावा देश में नशे की बढ़ती लत से भी परेशान है। अफगानिस्तान के अफीम और हेरोइन तस्कर ईरान और ताजिकिस्तान की सीमा में घुसपैठ कर तुर्की और फिर तुर्की से यूरोप पहुंचते हैं। उनकी वजह से ताजिकिस्तान में एक मजबूत ड्रग सिंडिकेट बन गया है जो कानून-व्यवस्था के लिए खतरा है। तालिबान पिछले 20 साल से सत्ता में नहीं था इसलिए ये ड्रग माफिया लुक- छिप कर काम करते थे। लेकिन अब ये तालिबान सरकार के इशारे पर किसी देश में अव्य़वस्था फैला सकते हैं। दुनिया में कुल अफीम उत्पादन का 80 फीसदी हिस्सा अफगानिस्तान से आता है। अफीम की खेती पर तालिबान का कब्जा है। एक अनुमान के मुताबिक तालिबान को अफीम के कारोबार से करीब 2800 करोड़ रुपये की सालाना आमदनी होती है। एक रिपोर्ट के मुताबिक जब तालिबान शासन में नहीं भी था तब भी उसने 2017 में अफीम से करीब 10 हजार करोड़ रुपये की कमाई की थी। जाहिर सरकार बनने के बाद तालिबान इस कारोबार को और बढ़ाएगा।

तो भारत के कई राज्य बन जाएंगे 'उड़ता पंजाब'
अफगानी और पाकिस्तानी ड्रग तस्करों के कारण भारत का पंजाब प्रांत नशीले पदार्थों का गढ़ बन चुका है। इस विषय पर उड़ता पंजाब के नाम से एक चर्चित फिल्म भी बन चुकी है। अफगानिस्तान से अफीम, अफीम की भूसी और हेरोइन पाकिस्तान पहुंचती है। फिर पंजाब से लगे पाकिस्तान बॉर्डर के जरिये इसे भारत में पहुंचाया जाता है। पांच साल पहले एक रिपोर्ट में कहा गया था कि पंजाब में हर साल करीब 7500 करोड़ रुपये की अफगानी अफीम खरीदी जाती है। पंजाब की पाकिस्तान से लगी 500 किलोमीटर लंबी सीमा रेखा अफीम तस्करों के लिए गोल्डेन रूट है। अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे के बाद स्थिति और बिगड़ सकती है। पांच दिन पहले की बात है। 21 अगस्त को अमृतसर- पाकिस्तान के बोर्डर पर बीएसएफ ने 40 किलो होरोइन और अफीम बरामद की थी। बीएसएफ की पाकिस्तानी- अफगानी तस्करों के साथ भयंकर गोलीबारी हुई थी। जब बीएसएफ के जवान भारी पड़ने लगे तो तस्कर होरोइन की खेप छोड़ कर पाकिस्तान की सीमा में भाग गये। खुफिया एजेंसियों ने अलर्ट किया है कि अफगानिस्तान में तालिबानी शासन आने के बाद जम्मू-कश्मीर और पंजाब में नशे की तस्करी बढ़ सकती है। अगर ये खतर बढ़ा तो भारत के कई राज्य 'उड़ता पंजाब' बन जाएंगे।












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