बिना विदेशी मदद तालिबान ने तैयार किया अफगानिस्तान का बजट, जानिए कहां से आएगा 'अथाह' पैसा?
पिछले 40 सालों से अफगानिस्तान लगातार अस्थिर है और देश की अर्थव्यवस्था कभी मजबूत नहीं रही। खासकर पिछले 20 सालों में अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था में थोड़ा बहुत सुधार जरूर दर्ज किया गया था, लेकिन, स्थिति फिर खराब है।
काबुल, दिसंबर 18: भीषण आर्थिक तंगहाली से जूझ रहे अफगानिस्तान के लिए तालिबान ने बिना विदेशी मदद के बजट तैयार किया है। तालिबान सरकार के तहत अफगानिस्तान के वित्त मंत्रालय ने एक मसौदा राष्ट्रीय बजट तैयार किया है, जो दो दशकों में पहली बार विदेशी सहायता के बिना बनाया गया है। तालिबान ने बजट का मसौदा तैयार किया है, इसकी पुष्टि तालिबान के ही एक वरिष्ठ नेता ने की है।

अफगानिस्तान का बजट तैयार
तालिबान ने अफगानिस्तान का बजट उस वक्त तैयार किया है, जब देश आर्थिक संकट में बुरी तरह से फंसा हुआ है और और पूरे देश में लाखों लोग गंभीर मानवीय तबाही का सामना कर रहे हैं। लाखों लोगों के पास खाने के लिए ना तो अनाज हैं और ना ही जिंदगी चलाने के लिए पैसे। अफगानिस्तान की वर्तमान स्थिति को यूनाइटेड नेशंस 'हिमस्खलन' कह चुका है। एक तरह अमेरिका ने अफगानिस्तान का करीब 10 अरब डॉलर फ्रीज कर रखा है, तो दूसरी तरफ दुनिया के सभी देशों ने तालिबान शासन के तहत अफगानिस्तान को दी जाने वाली मदद रोक दी है, तो दूसरी तरह अफगानिस्तान वित्त मंत्रालय ने बजट तैयार कर लिया है। हालांकि, तालिबान के वित्त मंत्रालय के प्रवक्ता अहमद वली हकमल ने मसौदा बजट के आकार का खुलासा नहीं किया है, जो दिसंबर 2022 तक के लिए बनाया गया है। लेकिन, समचार एजेंसी एएफपी ने दावा किया है कि, कैबिनेट की मंजूरी के बाद तालिबान की तरफ से बजट कॉपी को प्रकाशित किया जाएगा।

घरेलू राजस्व से बनाया गया है बजट
तालिबान वित्त मंत्रालय के प्रवक्ता अहमद वली हकमल ने ट्वीटर पर शेयर किए गये अपने एक इंटरव्यू क्लिप में कहा है कि, ''हमने देश के बजट को घरेलू राजस्व पर आधारित रखकर तैयार करने की कोशिश की है और हमें विश्वास है कि हम अपने लक्ष्य को पा सकते हैं''। आपको बता दें कि, तालिबान शासन स्थापित होने के बाद से एक तरफ जहां अफगानिस्तान को विदेशी मदद मिलना पूरी तरह से बंद हो चुका है, वहीं देश में राजस्व संकलन भी बुरी तरह से प्रभावित हुआ है। ज्यादातर विदेशी कंपनियों ने अफगानिस्तान से अपना कारोबार समेट लिया है, वहीं, अब देश में राजस्व जुटाने का सबसे बड़ा जरिया ड्रग्स की तस्करी ही बचा है और पिछले हफ्ते जारी रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल अफगानिस्तान में रिकॉर्ड मात्रा में अफीम का उत्पादन किया गया है।

अफगानिस्तान में आर्थिक संकट
जब तालिबान ने 15 अगस्त को अफगानिस्तान की सत्ता पर कब्जा कर लिया और पश्चिमी शक्तियों ने विदेशों में रखी अरबों डॉलर की संपत्ति तक तालिबान की पहुंच को रोक दिया, तो वैश्विक दानदाताओं ने भी वित्तीय सहायता को सस्पेंड कर दिया। आईएमएफ गाइडेंस के तहत अफगानिस्तान की पिछली सरकार ने साल 2021 का जो बजट तैयार किया था, उसमें 219 अरब अफगान रुपये, यानि करीब 2.7 अरब अमेरिकी डॉलर के घाटे का अनुमान लगाया गया था। वहीं, बजट में 217 अरब अफगान रुपये घरेलू राजस्व से प्राप्त होने की संभावना जताई गई थी, लेकिन, तालिबान शासन स्थापित होने के बाद घरेलू राजस्व के बुरी तरह से प्रभावित होने की संभावना जताई गई है।

डॉलर के मुकाबले गिरा अफगान रुपया
अफगानिस्तान की पिछली सरकार के वक्त एक अमेरिकन डॉलर के मुकाबले अफगान रुपये की कीमत 80 थी, लेकिन तालिबान शासन की स्थापना के बाद डॉलर के मुकाबले अफगान रुपये की कीमत बुरी तरह से गिर गई और पिछले हफ्ते जारी रिपोर्ट के मुताबिक, एक अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अफगान रुपया गिरकर 130 तक पहुंच चुका है। तालिबान विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता हकमल ने स्वीकार किया कि, सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों को पिछले कई महीनों से सैलरी नहीं दी गई है। हालांकि, उन्होंने कहा कि, "हम अपनी पूरी कोशिश कर रहे हैं कि साल के अंत तक सभी कर्मचारियों को बकाया वेतन पूरा तक दें।'' इसके साथ ही तालिबानी वित्त मंत्रालय के प्रवक्ता में देश में नया वेतनमान भी जल्द लागू करने की बात कही है।

अफगानिस्तान में टैक्स कलेक्शन
अफगानिस्तान की नई तालिबान सरकार के राजस्व विभाग ने पिछले महीने कहा था कि, उसने पिछले ढाई महीनों में 26 अरब अफगानिय रुपये बतौर राजस्व इकट्ठा किया है, जिसमें 13 अरब सीमा शुल्क शामिल हैं। इसके साथ ही तालिबान की तरफ से देश में एक नया इस्लामिक टैक्स भी लगाया गया है, जिसको लेकर तालिबान ने कहा कि, इन पैसों से गरीबों की मदद की जाएगी।

100 अरब अफगान रुपये का बजट?
वहीं, अफगानिस्तान के एक अर्थशास्त्री ने नाम नहीं छापने की शर्त पर समाचार एजेंसी एएफपी को बताया कि, शुक्रवार को तालिबान ने जो नया बडजट तैयार किया है, वो पिछले बजट के मुकाबले एक चौथाई रह जाएगा। नाम नहीं छापने की शर्त पर अर्थशास्त्री ने एएफपी को बताया कि, "तालिबान कह रहे हैं कि उनके पास सीमा शुल्क प्राप्त करने के का काफी पारदर्शी तरीका है, जिसका मतलब ये हुआ कि, पहले की तुलना में कम टैक्स जमा हो रहा है''। उन्होंने कहा कि, अगर ये सच भी हो, फिर भी तालिबान जिस बजट को पेश करेगा, वो ज्यादा से ज्यादा 100 अरब अफगान रुपये से ज्यादा नहीं होगा।

खोखली है अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था
पिछले 40 सालों से अफगानिस्तान लगातार अस्थिर है और देश की अर्थव्यवस्था कभी मजबूत नहीं रही। खासकर पिछले 20 सालों में अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था में थोड़ा बहुत सुधार जरूर दर्ज किया गया था, लेकिन वो एक बार फिर से रसातल में समाने के लिए निकल चुकी है। अफगानिस्तान में तमाम राज काज बंद हैं। तालिबान ने सरकार जरूर बनाई हुई है, लेकिन शासन नाम की कोई चीज नहीं है। सरकारी कर्मचारियों को कई महीनों से सैलरी नहीं मिल रही है और वो घर का कीमती सामान बेच रहे हैं और बैंक में अफगानिस्तान सरकार का जमा 9.5 अरब डॉलर के फंड को अमेरिका रोक चुका है। इसके साथ ही आएमएफ ने भी अफगानिस्तान में राहत और बचाव फंड पर रोक लगा दी है। यानि, अफगानिस्तान के पास अब इनकम का एक भी साधन नहीं बचा है।

पहले कैसे बनता था अफगानिस्तान का बजट?
लगातार युद्धग्रस्त देश बने रहने की वजह से अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था में कभी सुधार नहीं आया है। बात अर्थव्यवस्था की करें तो अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था (जीडीपी) तालिबान के शासन से पहले करीब 19.8 अरब डॉलर थी। विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था में 75 प्रतिशत बजट अंतर्राष्ट्रीय दान-दाताओं से ही मिलता था और अब जबकि तालिबान ने देश पर कब्जा कर लिया है तो अंतर्राष्ट्रीय दान मिलना बंद हो चुका है। और अमेरिका पहले ही 9.5 अरब डॉलर की संपत्ति को सीज कर चुका है, यानि अफगानिस्तान भयानक आर्थिक संकट में फंसा हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि तालिबान के लिए सरकार चलाना नामुमकिन हो होने वाला है।

तालिबान के पास पैसे कमाने का तरीका
वहीं, बात अगर तालिबान की आर्थिक स्थिति की करें तो तालिबान हमेशा से एक पैसों वाला संगठन रहा है, लेकिन तालिबान के पास इतने भी पैसे नहीं हैं कि वो देश चला सके। जून 2021 में यूनाइटेड नेशंस की रिपोर्ट में कहा गया कि, तालिबान को हर साल 1.6 अरब डॉलर की आमदनी होती है, जिसका मुख्य स्रोत ड्रग्स तस्करी, अफीम की खेती, अपहरण, एक्सटॉर्शन, खनिजों का अवैध दोहन के अलावा अपने कब्जे वाले इलाकों में रहने वाले लोगों और कारोबारियों से फिरौती वसूलना था। इसके अलावा दुनिया के कई देशों से तालिबान को हवाला के जरिए चंदा भी मिलता रहा है, जिससे तालिबान को अच्छी खासी कमाई होती रही है, लेकिन संगठन चलाना और देश चलाने में काफी अंतर होता है। लिहाजा माना जा रहा है कि तालिबान सबसे पहला काम टैक्स दर बढ़ाने के साथ साथ काफी सख्ती के साथ टैक्स वसूली पर ध्यान देगा।












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