श्रीलंका में मिलेगा तमिलों को न्याय, जल्द लागू होगा 13वां संशोधन, राष्ट्रपति ने प्रस्ताव पेश करने को कहा
श्रीलंका के राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे ने बुधवार को कहा कि वह केंद्र सरकार की कार्यप्रणाली पर अंकुश लगाने की शक्तियों को कम करके प्रांतीय परिषदों की प्रणाली को और अधिक सार्थक बनाने के लिए 13वें संशोधन को पूरी तरह से लागू करेंगे।
श्रीलंकाई राष्ट्रपति ने कहा कि संसद इस मामले में अंतिम निर्णय लेगी। उन्होंने कहा कि सभी राजनीतिक दलों से इस मुद्दे पर अपने प्रस्ताव प्रस्तुत करने को कहा गया है। आपको बता दें कि श्रीलंका में अल्पसंख्यक तमिल समुदाय लंबे समय से 13वें संशोधन को लागू करने की मांग कर रहा है।

इस बीच संसद में राष्ट्रपति विक्रमसिंघे ने बयान दिया कि कोई भी राजनीतिक दल इसके विरोध में नहीं है। उन्होंने कि वे इसलिए सभी दलों को 13ए के माध्यम से सत्ता हस्तांतरित करने के तरीकों का गहन अध्ययन करने के लिए आमंत्रित कर रहे हैं।
राष्ट्रपति ने कहा कि वे सांसदों को इस मसले पर अपने प्रस्ताव प्रस्तुत करने के लिए कह रहे हैं ताकि संसद इस पर अंतिम निर्णय लें। उन्होंने जोर देकर कहा कि प्रांतीय परिषदों की भविष्य की भूमिका पर निर्णय संसद को करना चाहिए।
राष्ट्रपति ने दोहराया कि वे प्रांतीय परिषदों की कार्यप्रणाली पर अंकुश लगाने की केंद्र सरकार की शक्तियों को कम करके उनकी प्रणाली को और अधिक सार्थक बनाने के लिए संशोधन लाएंगे। विक्रमसिंघे ने कहा कि रुके हुए प्रांतीय परिषद चुनाव उनकी शक्तियों पर संसद की सहमति के बाद हो सकते हैं।
बता दें कि चुनाव सुधारों के कदम के बाद 2018 से नौ प्रांतों के चुनाव रुके हुए हैं। अब मौजूदा आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के तहत चुनाव कराने के लिए संसदीय संशोधन की आवश्यकता है। विक्रमसिंघे ने कहा कि पुलिस शक्तियों के अलावा सभी शक्तियों पर समान आधार के लिए पार्टी का विचार-विमर्श तुरंत शुरू होना चाहिए।
बीते महीने राष्ट्रपति ने तमिल पार्टियों को आश्वासन दिया था कि विवादास्पद 13वां संशोधन प्रांतीय परिषदों में, पुलिस शक्तियों के बिना, पूरी तरह से लागू किया जाएगा। अपने संबोधन में, विक्रमसिंघे ने तमिलों के लिए तत्काल चिंता के मुद्दों पर भी प्रकाश डाला और उत्तरी क्षेत्र में हवाई और समुद्री कनेक्टिविटी में सुधार के महत्व पर जोर दिया।
क्या है 13वां संशोधन?
श्रीलंका में मुख्यतः दो समुदाय हैं। सिंघली और तमिल। सिंहली बौद्ध बहुसंख्यक हैं, वहीं तमिल अल्पसंख्यक हैं। दोनों के बीच लंबे समय से चल रहे संघर्ष को कम करने के लिए 1987 में श्रीलंका के संविधान में 13वें संशोधन किया गया था।
यह संशोधन 1987 में तत्कालीन भारतीय पीएम राजीव गांधी और तत्कालीन राष्ट्रपति जेआर जयवर्धने के बीच हुआ था। इस संसोधन के तहर तमिल अल्पसंख्यकों को सत्ता में भागीदारी दिए जाने का प्रावधान था। इतने साल बीत जाने के बाद ये अब तक संभव नहीं हो पाया है।
13 वें संशोधन में क्या है?
इसमें श्रीलंका के नौ प्रांतों में काउंसिल को सत्ता में साझीदार बनाने की बात कही गई है। इस संधोशन में शिक्षा, स्वास्थ्य, खेती, संपत्ति आदि से जुड़े फैसले लेने का अधिकार काउंसिल को देने की बात थी। लेकिन इनमें से कुछ चीजें श्रीलंका में पूरी तरह से लागू ही नहीं हो पाई हैं।
13 वें संशोधन का विरोध क्यों?
इस संशोधन का श्रीलंका में बहुसंख्यक सिंहली विरोध करते हैं। सिंघली समुदाय ने साफ कहा है कि अगर 13वें संशोधन को पूरी तरह लागू किया गया तो इसके परिणाम बहुत खतरनाक होंगे।
उनका मानना है कि प्रांतीय परिषदों को सशक्त बनाने से और उन्हें पूर्ण शक्तियां देने से उत्तर और पूर्व को द्वीप राष्ट्र से अलग करने का मार्ग प्रशस्त होगा। यही वजह है कि सिंघली राष्ट्रवादी दल जैसे जनता विमुक्ति पेरामुना, नेशनल फ्रीडम फ्रंट और जथिका हेला उरुमाया इस संशोधन को रद्द करने की मांग करते रहते हैं।
भारत का पक्ष
भारत हमेशा से श्रीलंका में 13वें संविधान संशोधन को लागू करने पर जोर देता रहा है। पिछले महीने श्रीलंका के राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे की भारत यात्रा के दौरान पीएम मोदी ने भी उनसे संविधान में 13वें संशोधन को लागू करने की आशा जताई थी। हालांकि श्रीलंका की सत्तारूढ़ पार्टी ने इसे ये कहते हुए खारिज कर दिया था कि राष्ट्रपति विक्रमसिंघे के पास 13वां संशोधन लागू करने का अधिकार नहीं है।












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