चीन से बचने के लिए भारत से नजदीकी बढ़ा रहा है ये देश, क्या मोदी सरकार को करनी चाहिए मदद?

जब चीन ने श्रीलंका को कर्ज में किसी भी तरह की रियायत देने से इनकार कर दिया, उसके बाद श्रीलंका एक बार फिर से भारत के करीब आने की कोशिश में लग गया है।

कोलंबो, फरवरी 20: भारत का पड़ोसी देश श्रीलंका भारी आर्थिक संकट से गुजर रहा है और जब श्रीलंका दिवालिया होने के कगार पर पहुंच चुका है, उस वक्त उसे भारत के निस्वार्थ मदद की याद आ रही है और अब श्रीलंका चीन के 'कर्ज जाल' से बचने के लिए भारत के करीब आने की कोशिश कर रहा है। लेकिन, सवाल ये है, कि क्या एक वक्त भारत के खिलाफ कड़वी कड़वी बातें बोलने वाले श्रीलंका के प्रधानमंत्री महिन्द्रा राजपक्षे की मदद भारत की मोदी सरकार को करनी चाहिए?

कर्ज जाल में फंसा है श्रीलंका

कर्ज जाल में फंसा है श्रीलंका

चीन को करीब 4.5 अरब अमेरिकी डॉलर चुकाने में नाकाम रहने के बाद श्रीलंका की आर्थिक स्थिति काफी ज्यादा खराब हो चुकी है और आशंका इस बात की है, कि इस साल के अंत तक श्रीलंका दिवालिया हो जाएगा। वहीं, एक वक्त चीन की गोदी में खेलने को तैयार रहने वाले श्रीलंका ने जब शी जिनपिंग से कर्ज जाल में छूट देने की मांग की, तो किसी भी तरह की छूट देने से चीन ने साफ इनकार कर दिया, जिसके बाद अब भारत के करीब आते हुए श्रीलंका चीन से दूर जा रहा है।
नए फंड प्राप्त करने में देरी के कारण फिच रेटिंग्स और मूडीज इन्वेस्टर्स सर्विस ने श्रीलंका की क्रेडिट रेटिंग को डाउनग्रेड कर दिया है, जो ऋण प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए आवश्यक हैं। ऐसे हालात में श्रीलका डूबने की कगार पर पहुंच गया है।

चीन ने माफी देने से किया इनकार

चीन ने माफी देने से किया इनकार

17 जनवरी को श्रीलंका के राष्ट्रपति गोतबाया राजपक्षे ने चीनी विदेश मंत्री वांग यी से अनुरोध किया था, कि "यह श्रीलंका के लिए एक बड़ी राहत की बात होगी, अगर चीन श्रीलंका को कर्ज स्ट्रक्टर में थोड़ी रियायत देते हुए कर्ज स्ट्रक्चर का पुनर्गठन कर दे।'' श्रीलंका ने कोविड 19 की वजह से देश की खराब आर्थिक स्थिति का भी हवाला दिया था, लेकिन, चीन ने श्रीलंकन राष्ट्रपति के अनुरोध को खारिज कर दिया। वहीं, श्रीलंका पिछले कुछ हफ्तों से अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहा है और ईंधन आयात बिलों का भुगतान करने के लिए भी संघर्ष कर रहा है।

भारत के नजदीक आने की कोशिश

भारत के नजदीक आने की कोशिश

जब चीन ने श्रीलंका को कर्ज में किसी भी तरह की रियायत देने से इनकार कर दिया, उसके बाद श्रीलंका एक बार फिर से भारत के करीब आने की कोशिश में लग गया है। हाल ही में, श्रीलंका के विदेश मंत्री जीएल पेइरिस की 6 से 8 फरवरी तक भारत के दो दिवसीय आधिकारिक दौरे पर आए थे, जिसमें भारत ने श्रीलंका को 2.4 अरब अमरीकी डालर की वित्तीय सहायता प्रदान की है। जिसके बाद श्रीलंका के विदेश मंत्री जीएल पेइरिस ने कहा कि, कोलंबो नई दिल्ली के साथ विशेष संबंध बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। इसके साथ ही पिछले हफ्ते मंगलवार को श्रीलंका में भारतीय उच्चायुक्त ने इंडियन ऑयल कॉर्प लिमिटेड द्वारा श्रीलंका के ऊर्जा मंत्री, उदय गम्मनपिला को 40,000 मीट्रिक टन ईंधन की खेप भी सौंपी है। पिछले साल भी भारत ने चीन के साथ जैविक उर्वरक विवाद में फंसे श्रीलंका की मदद की थी, जिसके बाद अब श्रीलंका में भारत के गुण गाए जा रहे हैं।

चीन के खिलाफ श्रीलंका में गुस्सा

चीन के खिलाफ श्रीलंका में गुस्सा

दरअसल, श्रीलंका की सत्ता पर कई सालों से सवार राजपक्षे भाईयों ने देश का मूड चीन के रंग में इस कदर रंग डाला था, कि ड्रैगन के खिलाफ कम ही आवाज श्रीलंका में सुनाई देती थी। लेकिन अब जब श्रीलंका दिवालिएपन के कगार पर खड़ा है, तब श्रीलंकन नेताओं को असली दोस्त और दुश्मन का पता चल रहा है। पिछले महीने श्रीलंका के वरिष्ठ सांसद डॉ. विजेदास राजपक्षे ने चीन पर श्रीलंका पर लगातार
आर्थिक हमले करने, देश में भ्रष्टाचार बढ़ाने और श्रीलंका को कर्ज के जाल में फंसाने का आरोप लगाया था। डॉ. विजेदास राजपक्षे श्रीलंका के प्रमुख नेताओं में से एक हैं और उनका चीन के खिलाफ बोलना, श्रीलंका में चीन के खिलाफ फूटते गुस्से का प्रतीक है।

भारत से ही मदद की उम्मीद

भारत से ही मदद की उम्मीद

सिर्फ इतना ही नहीं, भारत में श्रीलंका के हाईकमीशन मिलिंडा मोरागोडा ने कहा है कि, ''सबसे अहम बात ये है कि, हमारी नई अर्थव्यवस्था की चाबी भारत है और भारत हमें इस स्थिति से निकालने में मदद कर रहा है और दोनों देश लगातार जरूरी क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा सकते हैं।'' उन्होंने कहा कि, ''पर्यटन क्षेत्र श्रीलंका की जीडीपी का बड़ा हिस्सा रहा है और श्रीलंकाई पर्यटन उद्योग के लिए भारत सबसे बड़ा बाजार रहा है''। आपको बता दें कि, भारत को हमेशा से श्रीलंका में चल रही चीनी परियोजनाओं को लेकर चिंता रही है। पिछले साल ही श्रीलंका ने भारत और जापान की मदद से बनने वाले कोलंबो बंदरगाह के ईस्ट कंटेनर टर्मिनल विकसित करने का करार रद्द कर दिया था, जबकि चीन की परियोजनाएं काफी तेजी से चल रही हैं। लेकिन, सवाल ये है, कि क्या अब भी श्रीलंका के नेताओं को अकल आएगी?

श्रीलंका में आसमान छूती महंगाई

श्रीलंका में आसमान छूती महंगाई

भारी कर्ज के बोझ तले दबे श्रीलंका में महंगाई चरम पर पहुंच गई है। यहां सब्जियों और मिल्क प्रोडक्ट्स के दाम में भारी बढ़ोतरी हुई है। वहीं यहां मिल्क प्रोडक्ट्स की भारी कमी हो रही है। यहां मिल्क पाउडर की कीमत में 12.5 फीसदी की तेजी आई है। यहां मिर्च की कीमत 710 रुपए प्रति किलोग्राम पर पहुंच गया। जबकि बैंगन की कीमत में 51 फीसदी की तेजी आ चुकी है। वहीं प्याज की कीमत में 40 फीसदी की तेजी आई है। यहां आलू 200 रुपए प्रति किलो बिक रहा है। करेला 160 रुपए, गाजर 200 रुपए प्रति किलो, टमाटर 200 रुपए किलो बिक रहा है। आपको बता दें कि चीन का श्रीलंका पर करीब 5 अरब डॉलर का कर्ज है।

अब कम खाने लगे हैं श्रीलंकन

अब कम खाने लगे हैं श्रीलंकन

ब्रिटिश अखबार 'द गार्डियन' की रिपोर्ट में श्रीलंका की बदहाल स्थिति के बारे में बताया गया है और कहा गया है कि, श्रीलंका में लोगों ने खाना कम कर दिया है और अब लोग तीन के बजाए सिर्फ 2 वक्त ही खाना खाते हैं। वहीं, खाद्यान्न संकट के बीच राजपक्षे सरकार पहले ही देश में आपातकाल लगा चुकी है और पिछले महीने एक अरब डॉलर का राहत पैकेज दिया गया है, बावजूद इसका कोई असर नहीं दिख रहा है। श्रीलंका में खाने-पीने का सामान लोगों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी सेना को दी गई है, ताकि कालाबाजारी को रोका जाए। वहीं, श्रीलंका का विदेशी मुद्रा भंडार करीब करीब खाली हो चुका है, जिसने देश की स्थिति को काफी ज्यादा खराब कर रखा है। विश्व बैंक के मुताबिक, दिसंबर में खाने पीने की चीजों में महंगाई दर में 22.1 फीसदी का इजाफा हुआ है, जो एक खतरनाक स्तर है।

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