समुद्र में डूब सकते हैं विश्व के कई बड़े शहर, WMO ने भारत के इस शहर पर बताया बड़ा खतरा
विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने समुद्र तल में वृद्धि को लेकर बहुत ही गंभीर चेतावनी दी है। हम इतने देर हो चुके हैं कि ग्रीनहाउस उत्सर्जन को सीमित रखने और ग्लोबल वार्मिंग को नियंत्रित करने का भी वक्त अब हाथ से निकल चुका है।

जलवायु संकट की वजह से समुद्र के स्तर बढने की स्थिति दशकों पहले से पैदा हुई है। लेकिन, विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने जो नई बात बताई है, वह बहुत ही गंभीर है। इसने कहा है कि अगर हम ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम भी कर लें, ग्लोबल वॉर्मिंग के स्तर को भी सीमित रख लें तो भी हालात इतने विपरीत हो चुके हैं कि समुद्र तल का बढ़ना नहीं रोका जा सकता है। WMO की ओर से दी गई इस जानकारी पर संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी चिंता जताई है और उन्होंने भारत की प्रमुख नदियों को लेकर बड़े संकट की चेतावनी दी है।

WMO ने समुद्र तल बढ़ने को लेकर दी गंभीर चेतावनी
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने मंगलवार को बताया है कि 2013 से 2022 के बीच समुद्र तल (sea level) 4.5 मिलीमीटर प्रति वर्ष की रफ्तार से बढ़ा है। जलवायु परिवर्तन से समुद्र के स्तर में हो रही इस बढ़ोतरी की वजह से एक बार फिर से भारत, चीन, बांग्लादेश और नीदरलैंड जैसे देशों पर मंडरा रहा गंभीर खतरा उजागर हुआ है। यह स्थित मौजूदा पूरी शताब्दी तक बनी रह सकती है। ऐसा होने पर 1995 से 2014 के स्तर की तुलना में 2100 तक आते-आते समुद्र तल में कुल बढोतरी 0. 6 मीटर तक की हो सकती है। सबसे बड़ी बात ये है कि WMO के मुताबिक इस स्थिति की आशंका तब भी रहेगी, जब ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम होगा।

भारत में मुंबई को लेकर जताई आशंका
परिणाम गंभीर होना निश्चित है। यह स्थिति ना सिर्फ छोटे द्वीप वाले राष्ट्रों के लिए खतरनाक है, बल्कि समुद्र तट पर स्थित बड़े शहरों के लिए भी बहुत गंभीर चुनौती पैदा होने की आशंका हो चुकी है। वैश्विक समुद्र स्तर में वृद्धि पर अपनी फैक्ट-शीट में WMO ने कहा है, 'सभी महादेशों के कई बड़े शहरों पर खतरा है। जैसे कि शंघाई, ढाका, बैंकॉक, जकार्ता, मुंबई, मापुटो, लागोस, कायरो, लंदन, कोपनहेगन, न्यूयॉर्क, लॉस एंजिल्स, ब्यूनस आयर्स और सेंटियागो। यह बहुत बड़ी आर्थिक, सामाजिक और मानवीय चुनौती है।'

पिछली शताब्दी से बिगड़ने लगे हैं हालात
विश्व मौसम विज्ञान संगठन का कहना है कि 1971 के बाद से इस स्थिति के लिए मानवीय गतिविधियां मुख्य तौर पर जिम्मेदार रही हैं। क्योंकि, इसकी तुलना में 1901 से 1971 के बीच सिर्फ 1. 3 मिलीमीटर प्रति वर्ष ही बढ़ोतरी दर्ज हो रही थी। तापमान में बढ़ोतरी की वजह से ध्रुवीय बर्फ और ग्लेशियर पिघलने के बारे में बताते हुए इसने कहा है, 'कम से कम पिछले 3,000 सालों में किसी भी पिछली शताब्दियों की तुलना में वर्ष 1900 के बाद से औसत समुद्र-स्तर तेजी से बढ़ा है।'

वैश्विक तापमान कंट्रोल करने पर भी हालात रहेंगे बेकाबू- WMO
WMO के मुताबिक सबसे गंभीर खतरा साल 2100 तक उन 90 करोड़ लोगों पर मंडराएगा, जो तटीय क्षेत्रों के निचले इलाकों में रहेंगे। यह नहीं, इसकी वजह से 14,20,000 करोड़ डॉलर की संपत्ति पर भी संकट के बादल मंडराएंगे, जो तटीय इलाकों में जल भराव की वहह से प्रभावित हो सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र के महासिव एंटोनियो गुटेरेस ने विश्व मौसम विज्ञान संगठन की पड़ताल पर प्रतिक्रिया दी है कि 'समुद्र तल का बढ़ना एक थ्रेट मल्टीप्लायर है।' क्योंकि, विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने यहां तक कहा है कि अगर दुनिया 2100 तक वैश्विक तापमान में बढ़त को 1. 5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रख भी ले तो भी समुद्र तल में उल्लेखनीय वृद्धि तय है।
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भारतीय नदियों को लेकर संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने दी चेतावनी
नासा की इस पड़ताल पर कि अंटार्कटिका सालाना औसतन 15,000 करोड़ टन बर्फ गंवा रहा है और ग्रीनलैंड से हर वर्ष 27,000 करोड़ टन बर्फ पानी बन रहा है, गुटेरेस बोले, 'वक्त के साथ सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियां सिकुड़ती जाएंगी। और समुद्र के स्तर बढ़ने के साथ-साथ खारे पानी के कारण उनके विशाल डेल्टा के बड़े हिस्से को निर्जन बना देगीं।'












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