रूस-यूक्रेन तनाव: भारत पर भी पड़ सकता है असर, इन चीजों की कीमतों में आ सकता है उछाल
नई दिल्ली, 15 फरवरी: जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में यूक्रेन संकट पर वोटिंग की नौबत आई तो भारत ने उससे खुद को अलग रखकर किसी भी पक्ष के साथ नहीं रहने की अपनी नीति जाहिर की। दरअसल, भारत के लिए यह चुनाव आसान भी नहीं था। एक तरफ अमेरिका है और दूसरी तरफ रूस। भारत ऐसे मुद्दे पर किसी भी खेमे के साथ नहीं दिख सकता, क्योंकि हमारी अपनी स्वतंत्र विदेश नीति है; जिसमें राष्ट्रहित सर्वोपरि है। लेकिन, जब अब रूस की ओर से यूक्रेन पर हमले की आशंका लगभग सच होने वाली है, तब यह जानना जरूरी है कि यह हमें किस तरह से प्रभावित कर सकता है।

रूस-यूक्रेन संकट का वैश्विक बाजार पर असर पड़ने की आशंका
यूक्रेन और रूस जंग के मुहाने पर खड़ा है। यह सिर्फ दोनों देशों की बात नहीं है। यह एक तरह से तीसरे विश्व युद्ध की आहट की तरह है। क्योंकि, यूक्रेन के पीछे एक तरफ अमेरिका और पश्चिमी देशों की गोलबंदी है तो दूसरी तरफ रूस के साथ विस्तारवादी मंसूबे वाला चीन शामिल हो गया है। लेकिन, नहीं चाहते हुए भी इस युद्ध की आग में भारत के भी हाथ झुलसने का खतरा बढ़ गया है। क्योंकि, इस तनाव का जियो-पॉलिटिकल प्रभाव निश्चित है और सिर्फ राजनयिक रूप से ही नहीं, आर्थिक रूप से भी यह तनाव हमारे लिए परेशानी का सबब पैदा कर सकता है। इस संकट की वजह से दूनिया भर के शेयर बाजार दबाव में हैं। इसके चलते सोमवार को सोने और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आनी शुरू हो गई। क्योंकि, यूक्रेन संकट के जियो-पॉलिटिकल प्रभाव का असर वैश्विक बाजार पर पड़ने की आशंका है।

कच्चे तेल की कीमतों में सात वर्षों में सबसे ज्यादा उछाल
ब्रेंट इंडेक्स में कच्चे तेल की कीमतें 96 डॉलर प्रति बैरेल की सीमा को पार कर गई है, जो सात वर्षों में सबसे ज्यादा है। अगर छोटी सी बात को समझ लें तो इस संकट का प्रभाव कितना दूरगामी हो सकता है, यह समझने में मुश्किल नहीं होगी। रूस कच्चे तेल और सोने का दुनिया के सबसे बड़े उत्पादकों में है और भारत के लिए एक बड़ा निर्यातक भी है। अगर रूस ने यूक्रेन पर आक्रमण किया, जिसकी आशंका अमेरिका जोर-जोर से जता रहा है तो पश्चिमी देश उसके खिलाफ सख्त पाबंदी लगाएंगे, जैसा कि वो पहले से ही ऐलान कर रहे हैं। नतीजा ये होगा कि इन दोनों चीजों की वैश्विक सप्लाई पर असर पड़ेगा।
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तेल का बिल और व्यापार घाटा बढ़ने का खतरा
कच्चे तेल की कीमतों से तो भारत की अर्थव्यस्था बहुत ज्यादा प्रभावित होती है। क्योंकि, जैसे ही तेल की कीमतें बढ़ेंगी, देश में मुद्रास्फीति बढ़ेगी तो पहले से ही महंगाई झेल रही जनता पर और भी दबाव बढ़ेगा। यही नहीं कच्चे तेल के लिए ज्यादा डॉलर खर्च करने का नतीजा ये होगा कि देश का व्यापार घाटा और बढ़ेगा। क्योंकि भारत कच्चे तेल का बहुत बड़ा आयातक है।

आपसी व्यापार पर भी गहरा सकता है संकट
भारत का यूक्रेन के साथ भी अच्छा व्यापारिक रिश्ता है। दिल्ली स्थित यूक्रेन की एंबेसी के आंकड़ों के अनुसार साल 2020 में दोनों देशों के बीच 2.69 अरब डॉलर का कारोबार हुआ था। इसमें भारत का निर्यात में हिस्सा 72.154 करोड़ डॉलर का था तो यूक्रेन ने भारत को 269 करोड़ डॉलर का माल निर्यात किया था। भारत यूक्रेन से खाद्य तेल, परमाणु रियेक्टर और बॉयलर जैसी चीजें खरीदता है तो उसको दवाइयां और इलेक्ट्रिकल उपकरण सप्लाई करता है। गौरतलब है कि 2014 में जब क्रीमिया को लेकर रूस और यूक्रेन में टेंशन बढ़ा था, तब भी भारत के साथ उसका व्यापार कम हुआ था और अभी भी वह पुराने स्तर को नहीं छू पाया है।

कूटनीतिक स्तर पर भी भारत की बढ़ेगी परेशानी
राजनयिक तौर पर भारत पर इस संकट का कितना गहरा असर है, यह इसी से पता चलता है कि इसने अपने स्टैंड को न्यूट्रल रखने की कोशिश की है और वह किसी एक पक्ष का साथ देने की स्थिति में नहीं है। एक तरफ यूक्रेन के पीछे अमेरिका है तो दूसरी तरफ रूस, जो चीन और पाकिस्तान जैसे दुश्मनों के करीब जाता नजर आ रहा है। भारत की यह परेशानी सुरक्षा परिषद में वोटिंग के तौर अपनाई गई रणनीति से भी जाहिर होती है। यही नहीं यूक्रेन में बड़ी तादाद में भारतीय स्टूडेंट मेडिकल की पढ़ाई करते हैं और यदि रूस ने हमला किया तो उनकी सुरक्षा भी भारत की चिंता बढ़ाएगा।












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