Nuclear Plant On Moon: चंद्रमा पर न्यूक्लियर पावर प्लांट बनाएगा रूस, प्रोजेक्ट में शामिल हो सकता है भारत-चीन
Russia Nuclear Power Plant on Moon: चंद्रयान-3 की सफलता से उत्साहित भारत, अब रूस के मून न्यूक्लियर पावर प्लांट प्रोजेक्ट पर नजर गड़ाए हुए है। रोसाटॉम के नेतृत्व में इस पहल का उद्देश्य चीन के साथ मिलकर चंद्रमा पर एक बेस स्थापित करना है। लेकिन, क्या भारत इस प्रोजेक्ट में शामिल होगा?
रूस में चंद्रमा पर न्यूक्लियर पावर प्लांट बनाने के लिए जिस डिजाइन का प्रस्ताव तैयार किया है, उससे करीब आधा मेगावाट ऊर्जा उत्पन्न किया जा सकता है। रूसी अंतरिक्ष एजेंसी रोसाटॉम के प्रमुख एलेक्सी लिखाचेव ने पूर्वी आर्थिक मंच पर कहा है, कि मॉस्को और नई दिल्ली दोनों इस परियोजना पर सहयोग करने के लिए उत्सुक हैं।

उन्होंने कहा, "हमें जिस नए समाधान को लागू करने के लिए कहा गया है, वह आधा मेगावाट तक की ऊर्जा क्षमता वाले चंद्र परमाणु ऊर्जा संयंत्र का विकल्प है।"
भारत की बढ़ती अंतरिक्ष महत्वाकांक्षाएं
इस परियोजना में भारत की दिलचस्पी उसके चंद्रयान-3 मिशन की सफलता के बाद काफी बढ़ गई है, जिसने उसे चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला पहला देश बना दिया है। भारत की योजना 2035 तक अपना पहला अंतरिक्ष स्टेशन, भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (BAS) स्थापित करने की है और 2040 तक चंद्रमा पर मनुष्य को भेजने का लक्ष्य है।
2023 में भारत ने आर्टेमिस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, जिससे अंतरिक्ष अन्वेषण के प्रति भारत की प्रतिबद्धता और मजबूत हो गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसरो (ISRO) से 2040 तक चंद्रमा पर अंतरिक्ष यात्रियों को भेजने सहित "नए और महत्वाकांक्षी लक्ष्यों" को आगे बढ़ाने का आग्रह किया है।

चंद्रमा पर क्यों चाहिए परमाणु ऊर्जा क्यों?
चंद्रमा पर सौर ऊर्जा की एक निश्चित सीमा है, जिसके कारण लगातार चंद्रमा की सतह पर नये खोजों के लिए परमाणु ऊर्जा को आवश्यक माना जा रहा है। नासा ने चंद्र ठिकानों के लिए परमाणु रिएक्टरों का उपयोग करने पर विचार किया है, क्योंकि सौर ऊर्जा प्रणालियां चंद्रमा की 14-दिन की रातों के दौरान निरंतर ऊर्जा प्रदान नहीं कर सकती हैं।
नासा ने जो कंसेप्ट तैयार किया है, उसके मुताबिक "जबकि चंद्रमा पर सौर ऊर्जा प्रणालियों की सीमाएं हैं, लेकिन एक परमाणु रिएक्टर को स्थायी रूप से छाया वाले क्षेत्रों (जहां पानी या बर्फ हो सकती है) में रखा जा सकता है या चंद्रमा पर जिस दौरान रातें होती हैं, उस दौरान न्यूक्लियर पावर प्लांट से लगातार बिजली पैदा की जा सकती है।"
विशेषज्ञों का मानना है, कि चुनौतियों के बावजूद सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता बनी हुई है। उन्हें भरोसा है कि चंद्रमा पर परमाणु ईंधन पहुंचाना सुरक्षित है और अगर कोई समस्या आती है, तो रिएक्टर अपने आप बंद हो सकते हैं।
न्यूक्लियर रिएक्टर बनाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग
रूस और चीन ने 2021 में अंतर्राष्ट्रीय चंद्र अनुसंधान स्टेशन (ILRS) नामक एक संयुक्त चंद्र आधार बनाने की योजना की घोषणा की थी। यह आधार 2035 और 2045 के बीच कुछ चरणों में चालू हो जाएगा। रोस्कोस्मोस ने मई में खुलासा किया था, कि परमाणु ऊर्जा संयंत्र पर काम पहले ही शुरू हो चुका है, जिसे 2036 तक पूरा करने का लक्ष्य है।
यह सहयोग सिर्फ रूस और चीन तक ही सीमित नहीं है। लिखाचेव ने कहा, कि भारत समेत अंतरराष्ट्रीय साझेदार इन परियोजनाओं में भाग लेने में बहुत दिलचस्पी रखते हैं। उन्होंने कहा, "हम कई अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष परियोजनाओं की नींव रखने की कोशिश कर रहे हैं।"
भारत की कूटनीतिक कोशिशों में गगनयान मिशन से शुभांशु शुक्ला को नासा के ह्यूस्टन केंद्र में भेजना भी शामिल है। शुक्ला, इसरो और नासा के बीच सहयोग से चलाए जा रहे एक्सिओम-4 मिशन के तहत अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) जाएंगे।
अगर न्यूक्लियर पावर प्लांट बनाने में कामयाबी मिलती है, तो परमाणु ऊर्जा चंद्रमा पर दीर्घकालिक उपस्थिति स्थापित करने के लिए आवश्यक ऊर्जा का एक विश्वसनीय स्रोत प्रदान करती है। यहां से लगातार ऊर्जा हासिल की जा सकती है और यह भविष्य के चंद्र मिशनों के लिए महत्वपूर्ण विभिन्न गतिविधियों और अनुसंधान पहलों का समर्थन कर सकती है।
भारत अंतरिक्ष अन्वेषण में अपने सफर को लगातार बढ़ा रहा है, ऐसे में रूस की चंद्र परमाणु ऊर्जा परियोजना में शामिल होना एक और महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकता है। यह सहयोग न सिर्फ अंतरराष्ट्रीय संबंधों को मजबूत करता है बल्कि अंतरिक्ष में भारत की महत्वाकांक्षाओं को भी आगे बढ़ाता है।












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