Special Report: अफगानिस्तान में भारत की बड़ी डिप्लोमेटिक जीत लेकिन रूस से टूट गया रिश्ता?
अफगानिस्तान पीस ग्रुप में शामिल होना भारत की बड़ी डिप्लोमेटिक जीत है लेकिन क्या रूस अब भारत विरोदी खेमे में शामिल हो गया है?
नई दिल्ली/वाशिंगटन/काबुल: अफगानिस्तान में शांति चाहने वाला भारत आखिरकार अफगानिस्तान शांति समिति में शामिल हो गया है। भारत की ये बड़ी डिप्लोमेटिक जीत मानी जा रही है लेकिन आश्चर्य की बात ये है कि भारत का सबसे पुराना दोस्त रूस ही भारत का विरोधी बन गया। रूस ने अफगानिस्तान में शांति के लिए तैयार किए जा रहे रोडमैप पर फैसला लेने वाले 6 देशों की सूची में भारत के शामिल होने का रूस ने विरोध किया था। ऐसे में सवाल ये उठ रहे हैं कि क्या डिप्लोमेटिक जीत होने के बाद भी क्या भारत ने अपना सबसे पुराना दोस्त खो दिया है? क्या रूस अब भारत विरोधी खेमे में शामिल हो गया है?

दोस्त रूस बन गया विरोधी
इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के मुताबिक अफगानिस्तान में शांति की कोशिश करने वाले देशों के ग्रुप में शामिल होने के लिए भारत लगातार 6 महीने से कोशिश कर रहा था। भारत चाहता था कि अफगानिस्तान के मसले पर उसे भी फैसला लेने का अधिकार मिले क्योंकि भारत सरकार के कई अरबों रुपये के कई प्रोजेक्ट अफगानिस्तान में चल रहे हैं साथ ही अफगानिस्तान सरकार और भारत सरकार के बीच काफी अच्छे संबंध हैं। जबकि पाकिस्तान अफगानिस्तान के मसले पर भारत के ग्रुप में शामिल होने का विरोध कर रहा था और ऐसा पहली बार हुआ है जब पाकिस्तान के साथ भारत का पुराना दोस्त रूस चला गया हो और भारत का विरोध किया हो। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका ने जो मैकेनिज्म सुझाया था उसमें भारत शामिल था जबकि रूस के मैकेनिज्म से भारत को बाहर रखा गया था।
सूत्रों के हवाले से इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है कि रूस और चीन की बढ़ती नजदीकी के बीच रूस ने जो मैकेनिज्म सुझाया था उसमें रूस, चीन, अमेरिका, पाकिस्तान और ईरान को अफगानिस्तान में शांति के लिए बातचीत के मेज पर एक साथ आने की बात कही गई थी। एक अधिकारी ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि रूस ने ऐसा पाकिस्तान के कहने पर किया था। पाकिस्तान नहीं चाहता था कि बातचीत के मेज पर भारत का भी स्थान हो। लेकिन, भारत इसपर लंबे वक्त से काम कर रहा था और भारत ने इसके लिए अफगानिस्तान और उससे बाहर सभी अहम किरदारों से लगातार संपर्क बनाए रखा ताकि बातचीत की इस टेबल पर भारत का भी हिस्सा रहे। और आखिरकार भारत भी अमेरिका की मदद से इस ग्रुप में शामिल हो गया है। अफगानिस्तान मुद्दे पर भारत की ये एक बड़ी डिप्लोमेटिक जीत है। इंडियन एक्सप्रेस को एक उच्च अधिकारी ने बताया है कि 'भारत के हित सुरक्षित होने चाहिए इस पर आने वाले महीनों में बात होगी'
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अफगानिस्तान और भारत हैं दोस्त
अफगानिस्तान पीस प्रोसेस का हिस्सा बनने के बाद भारत को उम्मीद है कि वो खास तौर पर टेरेरिज्म, महिलाओं के अधिकार, अफगानिस्तान में होने वाली हिंसा, लोकतांत्रिक मूल्यों को लेकर नियम तय करने में अहम भूमिका निभाएगा। भारत हमेशा से एक अफगानिस्तान नेतृत्व वाली, अफगानिस्तान सरकार द्वारा नियंत्रित और अफगानिस्तान सरकार द्वारा स्वामित्व प्रणाली का साथ देता रहा है। जबकि. अफगानिस्तान की जमीनी हकीकत हमेशा से अलग रही है। वहां, अलकायदा और तालिबान जैसे खतरनाक आतंकी संगठन हैं जिन्हें पाकिस्तान परोक्ष तौर पर मदद करता आया है।
अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी पाकिस्तान की कई बार सार्वजनिक तौर पर आलोचना कर चुके हैं। पिछले हफ्ते भी अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने पाकिस्तान को अफगानिस्तान के लोकतांत्रिक मूल्यों और संप्रभुता का सम्मान करने की नसीहत दी थी। इसके अलावा उन्होंने पिछले महीने बिना पाकिस्तान का नाम लिए कहा था कि उनका पड़ोसी देश लगातार आतंकियों को मदद दे रहा है और अफगानिस्तान में अशांति को जन्म दे रहा है। अफगानिस्तान के राष्ट्रपति ने भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से अफगानिस्तान की शांति में भूमिका निभाने का अनुरोध किया था। भारत सरकार ने अफगानिस्तान में संसद का निर्माण कराया था, साथ ही भारत सरकार के अरबों रुपये के प्रोजेक्ट अफगानिस्तान में चल रहे हैं। साथ ही भारत सरकार हमेशा अफगानिस्तान सरकार के समर्थन में रही है और भारत ने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस फैसले का विरोध किया था जिसमें उन्होंने कतर की राजधानी दोहा में तालिबान आतंकियों के साथ शांति पर बातचीत की थी।

भारत की कूटनीतिक जीत
टोलो न्यूज में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने पिछले हफ्ते अफगानिस्तान में शांति बहाल करने के उपायों पर कोशिश करना शुरू कर दिया। उन्होंने पिछले हफ्ते अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी के साथ हाई काउंसिल फोर नेशनल रिकंसिलिएशन के अध्यक्ष अब्दुल्ला अब्दुल्ला को एक चिट्ठी लिखी थी। जिसके तहत यूनाइटेड नेशंस के चार्टर्ड के तहत एक रिजनल कॉन्फ्रेंस के गठन का प्रस्ताव दिया था। जिसके तहत अमेरिका, भारत, रूस, चीन, पाकिस्तान और ईरान के विदेश मंत्री एक साथ मिलकर अफगानिस्तान में शांति के साथ लोकतंत्र की बहाली का रास्ता निकालने की कोशिश करेंगे। इंडियन एक्सप्रेस ने सूत्रों के हवाले से लिखा है कि भारत की तरफ से एस. जयशंकर बातचीत में हिस्सा ले सकते हैं।
इंडियन एक्सप्रेस से एक सूत्र ने कहा है कि भारत का उस ग्रुप में शामिल होना लंबे वक्त से चल रहे डिप्लोमेटिक गतिविधियों का नतीजा है। पिछले साल अफगानिस्तान के पूर्व उपराष्ट्रपति अब्दुल रशीद रूस्तम ने भारत की यात्रा की थी। जिसमें इस ग्रुप और इस मुद्दे पर बातचीत की गई थी। जिसके बाद अफगानिस्तान के पूर्व सीईओ अब्दुल्ला अब्दुल्ला और अफगानिस्तान के नेता अता मोहम्मद के साथ पिछले साल ही भारत ने अक्टूबर महीने में बातचीत की थी।
वहीं, इसी साल जनवरी में भारत के नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर अजीत डोवाल ने अफगानिस्तान की गुप्त यात्रा की थी जिसमें उन्होंने काबुल में अफगानिस्तान के कई नेताओं से बातचीत की थी। सूत्रों ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया है कि ईरान के साथ भारत के साथ बेहतर रिश्ते और चाबहार पोर्ट को अफगानिस्तान तक जोड़ने की रणनीति भी इस ग्रुप में शामिल होने के पीछे की अहम वजह थी।

अफगानिस्तान से निकल रही है ‘शांति सेना’
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के शासनकाल में अमेरिका- अफगानिस्तान और तालिबान के बीच शांति समझौता कतर में हुआ था। जिसके तहत अमेरिका अपनी फौज को अफगानिस्तान से निकाल रहा है। 13000 अमेरिकी फौज में अब अफगानिस्तान में सिर्फ 2500 सैनिक बचे हैं, जिन्हें वापस बुलाने पर अमेरिका में माथापच्ची जारी है। दरअसल, अमेरिकी फौज के कम होते ही तालिबान ने फिर से अफगानिस्तान में दहशत फैलाना शुरू कर दिया। पिछले एक महीने के दौरान अफगानिस्तान में कई बम ब्लास्ट हो चुके हैं, लिहाजा अमेरिका का सेना बुलाने का दांव उल्टा पड़ता जा रहा है।
अब अमेरिका के सामने सबसे बड़ा डर ये है कि अगर अफगानिस्तान में फिर से आतंकी संगठन फलते-फूलते हैं तो उनका पहला टार्गेट अमेरिका ही होगा। इस्ट इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर मार्विन वीनबम का मानना है कि 'अफगानिस्तान-तालिबान-अमेरिका शांति समझौता में तालिबान सिर्फ इतना मान रहा है कि उसने अमेरिकी फौज को निशाना बनाना बंद कर दिया है, इससे ज्यादा तालिबान कुछ नहीं मान रहा है'। दरअसल, अमेरिका ने अब मानना शुरू कर दिया है कि ताबिलान से एग्रीमेंट कर वो फंस गया है और जैसे जैसे अमेरिकी फौज को वापस बुलाने की तारीख नजदीक आ जा रही है अमेरिका के लिए स्थिति और खराब होती जा रही है, ऐसे में सवाल बस यही बचता है, कि आखिर अब जो बाइडेन प्रशासन अपनी सेना को क्या ऑर्डर देगा?
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