Russia India Trade: अगर भारत रूस से तेल खरीदना बंद कर दे तो रूस को कितना नुकसान होगा? जानें पूरा हिसाब-किताब
Russia India Trade: भारत ने हाल के सालों में रूस से बड़े पैमाने पर कच्चे तेल का आयात किया है, जो उसकी ऊर्जा सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है। इस पृष्ठभूमि में, अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों पर शुल्क लगाने और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस दावे से कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस से तेल खरीद बंद करने का संकेत दिया है, भारत की विदेश और ऊर्जा नीति को लेकर एक संवेदनशील स्थिति उत्पन्न हो गई है।
भारत और रूस का रुख
रूसी राजदूत डेनिस अलीपोव ने इस खरीद को भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए फायदेमंद बताया, जबकि भारत सरकार ने ऊर्जा बाजार की अस्थिरता के बीच ग्राहकों के हितों की रक्षा करने की बात कही। भारतीय विदेश मंत्रालय ने ट्रंप के बयान से दूरी बनाई, जिससे भारत-अमेरिका संबंधों और भारत-रूस संबंधों के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती सामने आई है।

भारत की जरूरतें
भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है, जिसने पिछले साल रूस से 52.7 अरब डॉलर का कच्चा तेल खरीदा, जो कुल आयात का 37% था। यह आयात भारत की ऊर्जा जरूरतों के लिए महत्वपूर्ण है, हालांकि यह इराक, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, नाइजीरिया और अमेरिका जैसे अन्य देशों से भी तेल खरीदता है।
रूस से पहले कौन थे भारत किससे लेता था तेल?
रूस से तेल आयात में वृद्धि से पहले, भारत के शीर्ष 10 आपूर्तिकर्ताओं में रूस शामिल नहीं था। 2021-22 में रूस, इराक, सऊदी अरब, यूएई, अमेरिका, ब्राजील, कुवैत, मेक्सिको, नाइजीरिया और ओमान जैसे देश प्रमुख आपूर्तिकर्ता थे।
भारत सिर्फ रूस पर निर्भर नहीं है
कई लोगों का मानना है कि भारत केवल रूस पर निर्भर है, लेकिन यह सच नहीं है। भारत अमेरिका से भी बड़ी मात्रा में तेल खरीदता है; 2024 में उसने 7.7 अरब डॉलर के पेट्रोलियम उत्पाद खरीदे, जिसमें लगभग 4.8 अरब डॉलर का कच्चा तेल शामिल था। इसके बावजूद, ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) के आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका के साथ भारत का पेट्रोलियम व्यापार घाटा 3.2 अरब डॉलर रहा।
ईरान और वेनेजुएला पर अमेरिकी प्रतिबंध
भारत के तेल आयात पैटर्न में पहला बड़ा बदलाव 2018-19 से 2021-22 के बीच आया, जब ईरान और वेनेजुएला से होने वाला लगभग 17% तेल आयात (लगभग 4.1 करोड़ टन) अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण लगभग समाप्त हो गया। इनकी जगह इराक, सऊदी अरब और यूएई जैसे पारंपरिक आपूर्तिकर्ताओं ने ले ली।
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद
दूसरा बड़ा बदलाव रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद हुआ। 2021-22 में रूस से 40 लाख टन का आयात 2024-25 में बढ़कर 8.7 करोड़ टन से अधिक हो गया। वेस्ट द्वारा बैन लगाने के बाद रूस द्वारा दी गई छूट ने भारतीय रिफाइनरियों को आकर्षित किया।
रियायती दरों पर रूसी तेल और भारत की बचत
2021-22 के बाद, भारत को रूसी तेल पर 2022-23 में औसतन 14.1% और 2023-24 में 10.4% की छूट मिली, जिससे सालाना लगभग 5 अरब डॉलर की बचत हुई। इस बीच, खाड़ी के तीन देशों-इराक, सऊदी अरब और यूएई-की हिस्सेदारी 11% तक घट गई, जबकि अमेरिका, ब्राजील, कुवैत, मेक्सिको, नाइजीरिया और ओमान जैसे देशों से आयात आधा हो गया।
रूस के उभार की कीमत बाकी देशों को चुकानी पड़ी
सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च से जुड़े पार्थ मुखोपाध्याय के अनुसार, रूस से बढ़े आयात की कीमत अन्य देशों को चुकानी पड़ी, क्योंकि भारत ने कई स्रोतों से अपना आयात घटाया। यानी भारत के लिए एक तेल आपूर्तिकर्ता के रूप में रूस का उभार बाकी सबके नुकसान की कीमत पर हुआ।
सिर्फ 1% बचत, लेकिन प्रभाव बहुत बड़ा
हालांकि रूसी तेल से बचत भारत के कुल 900 अरब डॉलर के आयात बिल का सिर्फ 1% है, यह फिर भी लगभग 9 अरब डॉलर का एक महत्वपूर्ण आंकड़ा है। मुखोपाध्याय कहते हैं, "अगर भारत रूस से तेल खरीदना बंद कर दे, तो वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतें बढ़ेंगी, जिससे न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया को झटका लगेगा।"
रूसी तेल से स्थिरता और कीमतों में गिरावट
रियायती दरों पर रूसी कच्चा तेल खरीदने से भारत को अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में मदद मिली है, साथ ही अप्रत्यक्ष रूप से वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतें भी स्थिर रही हैं। इस साल अंतरराष्ट्रीय तेल की कीमतें 27% गिरकर 78 डॉलर प्रति बैरल से 59 डॉलर प्रति बैरल तक आ चुकी हैं।
भारतीय रिफाइनरियों के लिए कैसा है रूसी तेल?
पूर्व वाणिज्य अधिकारी और जीटीआरआई के प्रमुख अजय श्रीवास्तव के मुताबिक, रूसी तेल भारत के लिए "स्थिर कीमत और रिफाइनरी के अनुकूल" है। भारत की अधिकांश तेल रिफाइनरियां रूस के 'यूराल ब्लेंड' जैसे भारी कच्चे तेल के लिए डिजाइन की गई हैं, जिसे बिना बड़े बदलावों के प्रभावी ढंग से प्रोसेस किया जा सकता है।
भारत के सामने मुश्किल विकल्प
श्रीवास्तव कहते हैं, "भारत के सामने स्पष्ट विकल्प हैं-सस्ता रूसी तेल लेकर अमेरिका की नाराजगी झेलना, या मध्य-पूर्व और अमेरिका से महंगा तेल खरीदने का विकल्प चुनकर घरेलू स्तर पर कीमतें बढ़ने का जोखिम उठाना।" जैसे-जैसे अमेरिका भारत पर दबाव बढ़ा रहा है, भारत के लिए दुविधा बढ़ती जा रही है।
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