Ruchira Kamboj: भारत की पहली महिला UN डिप्लोमेट, जिनकी आक्रामकता की पूरी दुनिया में चर्चा
दिसंबर महीना भारत के लिए काफी ज्यादा महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत इस महीने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अध्यक्ष की भूमिका में है, लिहाजा रूचिरा की जिम्मेदारी और भी ज्यादा बढ़ जाती है।

Ruchira Kamboj Story: वह सीधी बात करती हैं और सुनिश्चित करती हैं, कि विश्व मंच पर ना तो कोई भारत को आंख दिखा सके और ना ही भारत को किसी भी मुद्दे पर कोई घेर सके। वो सुनिश्चित करती हैं, कि विश्व मंच पर भारत का स्वाभिमान बना रहे और यही वजह है, कि संयुक्त राष्ट्र में भारत की पहली महिला स्थायी प्रतिनिधि रुचिरा कंबोज, हमेशा सही कारणों से सुर्खियों में बनी रहती हैं। चाहे चीनो, अमेरिका हो, या पाकिस्तान हो या वो देश रूस ही क्यों ना हो, रूचिरा कंबोज सीधी बात करती हैं, देशहित की बात करती है और सुनिश्चित करती हैं, कि अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत का सिर झुकने ना पाए।

रूचिरा के कंधे पर है बड़ी जिम्मेदारी
दिसंबर महीना भारत के लिए काफी ज्यादा महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत इस महीने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अध्यक्ष की भूमिका में है और भारत का दो सालों का यूएनएससी का बतौर अस्थाई सदस्य का कार्यकाल खत्म हो रहा है। लिहाजा, भारत की कोशिश अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अपनी पहचान छोड़ने की है और उस काम को निभाने की जिम्मेदारी रूचिरा कंबोज पर है, जो संयुक्त राष्ट्र में भारत की स्थाई प्रतिनिधि हैं और भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर की टीम की एक मजबूत सदस्य हैं। विदेश मंत्री बनने के बाद एस. जयशंकर ने भारत की विदेश नीति को आक्रामकता के साथ दुनिया के सामने पेश किया है और चाहे वो यूक्रेन युद्ध हो, या फिर रूस से डिस्काउंट पर तेल खरीदने की बात हो या फिर पश्चिमी देशों की आलोचना हो, टीम जयशंकर ने मजबूती के साथ अपना पक्ष रखा है और भारत के गुटनिरपेक्ष रवैये को एक बार फिर से दुनिया को मानने के लिए मजबूर किया है। लिहाजा, संयुक्त राष्ट्र में जब भारत के पक्ष को रखने की बारी आती है, तो वो काम रूचिरा कंबोज करती हैं और जब भारत के पास अध्यक्षता आई है, तो उन्होंने अपने पहले ही प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपने इरादे जाहिर कर दिए।

सीधी बात... नो बकवास
प्रेस कॉन्फ्रेंस में आदतन रवैये की तरह ही पश्चिमी मीडिया की तरफ से एक बार फिर से भारतीय लोकतंत्र और प्रेस की आजादी पर सवाल उठाने की कोशिश की गई, लेकिन इस बार जवाब रूचिरा को देना था और उन्होंने जो जवाब दिया, वो फिर अंतर्राष्ट्रीय अखबारों की प्रमुख सुर्खी बन गया। रूचिरा कंबोज ने साफ तौर पर कहा, कि 'हमें ये बताने की जरूरत नहीं है, कि लोकतंत्र पर हमें क्या करना है।' रूचिरा का ये रवैया पश्चिमी देशों की मीडिया के लिए चौंकाने वाला था, लेकिन अभी रूचिना ने अपनी बात खत्म नहीं किया था और उन्होंने आगे कहा, कि "भारत शायद दुनिया की सबसे प्राचीन सभ्यता है जैसा कि आप सभी जानते हैं। भारत में लोकतंत्र की जड़ें 2,500 साल पहले से थीं और हम हमेशा से एक लोकतंत्र रहे हैं।" रूचिना ने अपने जवाब से अमेरिका और ब्रिटेन के खुद को सबसे पुराने लोकतांत्रिक देश बताने के दंभ को भी तोड़। वहीं उन्होंने शाक्य वंश और लिच्छवी साम्राज्य के समय के बारे में बात करते हुए भारतीय लोकतंत्र की महानता से पश्चिमी देशों की पत्रकारों को अवगत करवाया।

'भारत को साइड नहीं कर सकते'
भारतीय डिप्लोमेट ने दुनिया को अहसास कराया, कि कैसे 140 करोड़ की आबादी वाले देश में हर पांच साल पर संविधान के मुताबिक चुनाव होते हैं, जिसे देश की सारी पार्टियां स्वीकार करती हैं और देश में काफी आराम से सत्ता का ट्रांसफर होता है। इतनी बड़ी आबादी वाले देश में इतनी आसानी से सत्ता का एक पार्टी से दूसरी पार्टी में ट्रांसफर होने किसी और देश के लिए सपने जैसा हो सकता है, क्योंकि अमेरिका में भी पिछली बार संसद पर कब्जा करने की कोशिश की गई थी। हालांकि, रूचिरा ने ये भी माना, कि इसके बाद भी हम कुछ कमियों में सुधार कर रहे हैं, हम परिवर्तन कर रहे हैं और हम प्रभावशाली अंदाज में आगे बढ़ रहे हैं। रूचिरा कंबोज ने पूरी दुनिया को संदेश देते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा, कि "भारत ऐसा देश नहीं है, जिसे इधर-उधर धकेला जाए। भारत एक बड़ा देश है, जो प्रतिस्पर्धी अंतरराष्ट्रीय ब्लॉकों के साथ अपने संबंधों के साथ "अपने दम पर खड़ा है और गर्व करता है"। और ये जवाब रूस को दिया गया था। क्योंकि, रूसी विदेश मंत्री ने आरोप लगाए थे, कि अमेरिका और पश्चिमी समूह भारत को नाटो में खींचने की कोशिश कर रहा है।

पाकिस्तान की कर दी खटिया खड़ी
वहीं, भारत पर हमेशा अनर्गल आरोप लगाने वाले पाकिस्तान की रूचिरा ने संयुक्त राष्ट्र में खटिया खड़ी कर दी और उन्होंने साफ कहा, कि पाकिस्तान को 'ओछी' और 'निरर्थक' बयानबाजी से बाज आना चाहिए। अक्टूबर में संयुक्त राष्ट्र महासभा के एक आपातकालीन सत्र में उन्होंने कश्मीर के मुद्दे को उठाने वाले पाकिस्तान को यह कहते हुए फटकार लगाई थी, कि "हमने अप्रत्याशित रूप से, फिर से एक प्रतिनिधिमंडल द्वारा इस मंच का दुरुपयोग करने और तुच्छ और व्यर्थ टिप्पणी करने का प्रयास देखा है, जो मेरे देश के खिलाफ है"। उन्होंने कहा कि, 'इस तरह के बयान की सामुहिक तौर पर निंदा की जाना चाहिए और ऐसे मानसिकता वाले देश के साथ सहानुभूति दिखानी चाहिए, जो बार बार झूठ बोलते हैं।' इसके साथ ही रूचिरा ने जोर देकर कहा, कि 'पाकिस्तान को "सीमा पार आतंकवाद" को रोकना चाहिए ताकि हमारे नागरिक अपने जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार का आनंद ले सकें।

बदलाव के लिए आवाज
इसके साथ ही रूचिरा कंबोज ने यूएनएससी में बदलाव के लिए जोर दिया है और उन्होंने वैश्विक मंच से यूनाइटेड नेशंस में तत्काल सुधार लाने का आग्रह किया है। उन्होंने अगस्त में कहा था, यूनाइटेड नेशंस से विश्व के सामने आने वाली चुनौतियों और वास्तविक खतरों की तरफ ध्यान दिलाने की कोशिश की थी। यूएनएससी के सदस्यों को संबोधित करते हुए रूचिरा ने कहा था कि, बैठक बहुपक्षवाद में सुधार के भारत के आह्वान के बारे में गंभीर चर्चा में शामिल होने का एक उपयुक्त मौका है, जिसके मूल में यूएनएससी में सुधार निहित है। उन्होंने कहा था, कि 'असल में हमें एक ऐसे यूएनएससी की जरूरत है, जो वास्तव में प्रतिनिधि बन सके, अन्यथा संयुक्त राष्ट्र को अलग अलग ध्रुव के द्वारा काफी आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है, इसीलिए यूएनएससी को अधिक पारदर्शी और लोकतांत्रिक बनाने की जरूरत है।

विदेश नीति बनाने में हैं माहिर
संयुक्त राष्ट्र में अपनी भूमिका से पहले 58 साल की हो चुकीं रूचिरा कंबोज ने विदेशी मामलों से निपटने में दशकों बिताए हैं। मॉडर्न डिप्लोमेसी को दिए गये अपने एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि, "मैंने अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की खोज और चर्चा का आनंद लिया है और वास्तव में इस जिम्मेदारी को निभाने के लिए मैं काफी उत्सुक थी। मुझे लगता है कि मैं भाग्यशाली थी और काफी धन्य हूं, कि मेरी यह आकांक्षा पूरी हुई।" यह पहली बार नहीं था, जब रूचिरा संयुक्त राष्ट्र में भारत का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। उन्होंने 2002 और 2005 के बीच संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन में एक काउंसलर के रूप में भी काम किया है।

रूचिरा का विदेश विभाग में कार्यकाल
1987 बैच की भारतीय विदेश सेवा (IFS) अधिकारी रूचिरा कंबोज भूटान में भारतीय राजदूत रह चुकी हैं और हिमालयी साम्राज्य की पहली महिला भारतीय दूत बनी। CNBC TV18 की रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने 2017 से 2019 के बीच दक्षिण अफ्रीका और लेसोथो साम्राज्य में भारतीय उच्चायुक्त के रूप में भी काम किया है और 2006-2009 तक दक्षिण अफ्रीका में भारत के महावाणिज्यदूत के रूप में काम किया है। वह मॉरीशस में भी अपनी सेना दे चुकी हैं, जहां उन्होंने 1996 से 1999 के बीच भारतीय उच्चायोग में प्रथम सचिव (आर्थिक और वाणिज्यिक) और चांसरी के प्रमुख के पदों पर काम किया। इससे पहले, उन्होंने विदेश मंत्रालय के यूरोप वेस्ट डिवीजन में काम किया था, जहां वो पांच सालों के लिए अवर सचिव की भूमिका में थीं। रिपोर्ट में कहा गया है कि, 1987 की सिविल सेवा और विदेश सेवा बैच में टॉप करने के बाद उन्होंने पेरिस में प्रतिनियुक्ति के साथ विदेशी मामलों में अपने करियर की शुरूआत की और उसके बाद कंबोज ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।












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