समुद्री तापमान बढ़ने से पिछले 10 साल में खत्म हुए 14 प्रतिशत कोरल रीफ
चक्रवातों की बढ़ती तीव्रता, अनियमित वर्षा और सूखते जलाशयों के रूप में हम जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को पहले ही देखते आ रहे हैं, दरअसल जलवायु में हो रहे व्यापक परिवर्तनों का असर न केवल जमीन पर पड़ रहा है, बल्कि समुद्री जीवन भी खतरे में है। बात अगर बीते दस वर्षों की करें तो समुद्र का सतही तापमान बढ़ने के कारण कोरल रीफ यानि मूँगा चट्टान करीब 14 प्रतिशत तक खत्म हो गई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि कोरल रीफ को सबसे ज्यादा नुकसान पूर्वी एशिया के समुद्रों में पड़ा है।
दरअसल मंगलवार को संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के तहत जलवायु परिवर्तन के समुद्री जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों पर एक रिपोर्ट जारी की गई। इस रिपोर्ट को ग्लोबल कोरल रीफ मॉनिटरिंग नेटवर्क (जीसीआरएमएन) ने तैयार किया है, जिसमें समुद्र के अंदर मौजूद कोरल पर मंडरा रहे खतरों के बारे में आगाह किया गया।
संस्थान की ओर से जारी की गई रिपोर्ट का यह छठा संस्करण है, जिसमें संपूर्ण पृथ्वी के अध्ययन का सार प्रस्तुत किया गया है। इस रिपोर्ट को तैयार करने के लिए दुनिया के 73 देशों के 12 हजार क्षेत्रों का अध्ययन 300 से अधिक वैज्ञानिकों ने किया। कोरल रीफ से जुड़ा यह डाटा इस क्षेत्र में एकत्र किया गया सबसे बड़ा डाटा है।

GCRMN की रिपोर्ट के प्रमुख अंश:
- समुद्र के तापमान में वृद्धि और जल में प्रदूषण के कारण कोरल का रंग सफेद हो जाता है। पूरे विश्व में वृहद स्तर पर कोरल सफेद पड़ते जा रहे हैं।
- 1998 में ही दुनिया के 8 प्रतिशत कोरल रीफ खत्म हो गए थे। जिनकी तादाद 6500 वर्ग किलोमीटर में फैले कोरल रीफ के बराबर थी।
- कोरल के सफेद पड़ने की घटना सबसे ज्यादा भारतीय महासागर, जापान और कैरेबियाई इलाकों में पायी गई। जबकि सबसे कम असर लाल समुद्र, खाड़ी, उत्तरी प्रशांत, हवाई व कैरोलाइन द्वीप क्षेत्र और दक्षिणी प्रशांत सागर में समोआ और न्यू केलेडोनिया में देखा गया।
- 2009 से 2018 के बीच पृथ्वी पर करीब 14 प्रशित कोरल रीफ खत्म हो गए, जिनकी तादाद 11,700 वर्ग किलोमीटर में फैले कोरल रीफ के बराबर होगी, मतलब इतना बड़ा क्षेत्रफल जितने में कतर जैसे देश बसे हैं।
- कोरल रीफ एलगी, जिनकी संख्या में वृद्धि हुई है, वो बीते एक दशक में करीब 20 प्रतिशत तक बढ़ गये हैं।
- पूरे विश्व में सबसे ज्यादा कोरल रीफ पूर्वी एशिया के समुद्री त्रिकोण में पाये जाते हैं। खास बात यह है कि यहां पर बहुत ज्यादा प्रभाव अभी तक नहीं पड़ा है। लेकिन हां समुद्र के सतही तापमान में बढ़ने के कारण बहुत अधिक ठोस चट्टानों में कमी जरूर आयी है।

क्या कहते हैं वैज्ञानिक
ऑस्ट्रेलियन इंस्टिट्यूट ऑफ मरीन साइंस के सीईओ ने इस रिपोर्ट पर अपना बयान जारी करते हुए कहा कि कोरल रीफ पर की गई यह अब तक की सबसे बड़ी स्टडी है। इस रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है कि किस तरह समुद्र के अंदर बनने वाली कोरल चट्टानें समाप्त होती जा रही हैं। जिस तरह से पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है, उसे देखते हुए यह साफ है कि आने वाले समय में यह जारी रहेगा। इस रिपोर्ट में यह स्पष्ट कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन कोरल रीफ के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
उन्होंने आगे कहा कि अगर हम पृथ्वी के बढ़ते तापमान को नियंत्रित करने के लिए कार्बन फुटप्रिंट को कम करने और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने में कामयाब हो जायें तो हो सकता है, कि ये चट्टानें फिर से बनने लगें। इसका एक बड़ा कारण जरूरत से ज्यादा मछली पकड़ना भी है। समस्या इस बात की है कि दुनिया भर में सैंकड़ों करोड़ों लोगों की जीविका मछलीपालन पर निर्भर है और कई देशों की अर्थव्यवस्था में समुद्री फूड इंडस्ट्री का बड़ा योगदान है। ऐसे में बीच का रास्ता खोजना बेहद कठिन है।
यूएनईपी के कार्यकारी निदेशक इंगर एंडरसन का कहना है कि 2009 के बाद से हमने कोरल रीफ में सबसे ज्यादा नुकसान देखा है। हम इस क्षति को वापस ला सकते हैं, लेकिन इसके लिए अभी से जरूरी कदम उठाने होंगे। ग्लासगो में होने वाले जलवायु सम्मेलन में कोरल रीफ को बचाने की दिशा में ठोस कदम उठाये जा सकते हैं। हमें अपनी आने वाली पीढ़ी को बिना कोरल की पृथ्वी नहीं देनी है।












Click it and Unblock the Notifications